Monday, October 23, 2017

#यादोंकी पोटली -3

"दीपावलीआप सबके जीवन मे अनन्त खुशियां लाये
अनेकानेक शुभकामनाये।"

अंतिम किश्त

खूब आड़ी तिरछी रांगोली बनाते ।मौसम में हल्की सी ठंडक आ चुकी होती फिर गाँव मे तो ज्यादा ही लगती
पानी ठंडा लगता तो  मुहँ हाथ धोने में ,तो दादा प्रभात फेरी आने के पहले ही आँगन में बने चुल्हे  को जला उस पर गर्म पानी रख देते चूल्हा जलाने की सामग्री।
तुवर की लकड़ी (तोर काठी निमाड़ी में)जिससे जलने में आसानी होती थी लकड़ी को ,सब सुकलाल मामा रात को ही रख जाता था ।
हम सब बच्चे गर्म पानी लेकर ही काला दन्त मंजन करते और वहीं चुल्हे के आज बाजू दूध चाय का इंतजार करते हाथों को तापते हुए।
दादा की कचहरी के पास एक छोटा सा कमरा हुआ करता था जिसे हम कोठरी कहते उसमें लोहे की बड़ी सी तिजोरी , लकडी ,और लोहे पेटियां जिनमे सबके नए कपड़े रहते ।तिजोरी में गहने ,खाता बही, और सारे जरूरी कागजात रहते।
साथ ही एक छोटी सी खटिया होती जहाँ ज्यादातर माँ दिन में कभी कभार सुस्ता लेती।
कोठरी का दरवाजा खुलने पर  गोशाला  होती उसके बाजू में बड़ा सा कोठा (कमरा) होता जिसमें पशुओं का दाना चारा रहता।
गोशाला के पास ही बड़ा सा अनार का पेड़ जिसमे कच्चे तोड़कर खाने पर हमेशा डांट पड़ती!!
अनार के पेड़ से लगा हुआ गहरा कुँआ जो पक्का बंधा हुआ और कुएं पर ही कपड़े धोने की जगह, पुरुषों के लिए स्नान  की जगह और बड़े बड़े तांबे के चरवे (हंडे)जिसमे पानी भरा होता और ये पानी भरने का काम भी मामा करता।
गाँव जलने, घर जलने के बाद ये पक्के और पत्थर के बने घाट ही पुराने घर को जीवंत  और "खंडहर बताते है कि इमारत बुलन्द" थी का अहसास करवाते है।
कुएं के बाजू में ही बड़ा सा आँगन उसमे मधुमालती
और पीले कनेर का पेड़ आज भी स्मृतियों में जैसा का तैसा है।
आँगन के पास गलियारे से शुरू होकर जो (बड़ी एक ढाल ई )बरामदा था उसमें हाथ की चक्की  ,मूसल ओखली और धान्य तैयार करने में जो सामान काम आता वो रहता था ।
हम  बच्चे तो रांगोली बनाने और जिजियों के साथ गलियों में खेलने में रहते।
माँ बाई और दादी दिवाली के पकवानों की तैयारी में लगी रहती ,घर की पुताई लिपाई, साथ साथ चलती!
हम कचहरी की फ़ोटो की फ्रेम को तेल पानी से चमकाते बस इतना ही सहयोग करते बाकी पकवानों पर निगाह रहती।
आँगन में बैठकर गुजिया सँजोरी(गुजिया का गोल शेप)
बनते हम गुजिये में भरावन की सामग्री की फांक मार ही लेते 😊सबके मना करते करते कि अभी भोग लगेगा।
अनरसे *रात में बनते ।
नमकीन सेव गांव के सुखदेव काका हलवाई के घर से बनकर आती।
और तिल पपड़ी बस इतनीही चीजें बनती
पर  मात्रा ब हुत सारी बनानी होती थी।
धन तेरस पर पूरणपोली, चौदस पर दाल बाटी, अमावस को पूरी सब्जी मीनू फिक्स।
पूरणपोली जिस दिन बनती देखा करते कब पूरन खाने को मिलेगा तब आसान नहीँ था पूर्ण पोली बनाना।
माँ और दादी का पूरा श्रम और स्नेह होता उसमे।
फटाके ,गांव के हॉट से लाया तमंचा, तिकड़ी की डिब्बी, सांप, फुलझड़ीऔर चकरी जो सब पिताजी शहर से लाते उन्हें धूप लगाकर फिर हमको बांटे जाते।
और हम  उन्हें ही बचा कर रख देते।लड़ियाँ सिर्फ काकाजी ही फोड़ते जो आज के एटमबम से भी महत्वपूर्ण थी उन दिनों हमारे लिए।
आँगन के बगल में रसोईघर की कोठरी उसके बाजू में
पक्का स्नानघर ,उसके आगे पनिहारा।
आँगन से चार सीढ़िया चढ़कर छान (कमरा)जिसमे पूजा घर बड़ा सा और सबसे महत्वपूर्ण दादी की वो लकड़ी की अलमारी जिसमे रसोई का कीमती सामान होता और उसमें हमेशा ताला लगा रहता जब हम बच्चे इधर उधर होते तभी वो ताला खोलकर जरूरत का सामान निकाला जाता।
आज मुझे सहसा बंगाली उपन्यास पढ़े हुए की गृहस्वामिनी याद आ गई जिनके पल्लू में हमेशा चाबी बंधी रहती।
दिन में गुजिये बनते रात को सबके खाना खत्म होने के बाद चुल्हे पर कढ़ाई रखी जाती तलने के बाद भोग के निकालकर हम सोते हुए बच्चों को जगाकर गरम गुजिये खिलाये जाते और गाय का गर्म दूध।
पूजा घर के पास ही एक और बड़ा कमरा होता
जहां अनाज का भंडारण होता एक बड़ा सा झूला
जिसमे बैठकर जोर जोर से गीत गाये जाते उन्मुक्त
कंठ से।
कमरों के बगल से एक गलियारा होता जहां से पीछे बने शौचालय के लिए पृथक रास्ता होता आज ये जिक्र करना जरूरी हो गया कि हमारे पूर्वजों की सोच कितनी आगे थी कि जिन व्यवस्थाओं को लेकर सरकारें अपनी उपलब्धि बता रही है वो आज के 100 साल पहले से ही घरों में व्यवस्था थी।
दिवाली के दिन शाम को रांगोली बनाना, दिए जलाना, घर के हरेक कोने में दीपक जलाना ।सफेद सोने(कपास)जो घर मे आया रहता खेत से !उसकी पूजा करना,कलम दवात की पूजा, लाल बही खाते की पूजा करना वो क्षण आज भी रोमांचित कर देते है।
पूजा के बाद सेठ दाजी के यहाँ जाना , सबको प्रणाम करना, जितने भी कुटुम्ब के घर होते सबको प्रणाम करने जाना आशीर्वाद पाना यही हमारा धन था।
उन आशीर्वादों से हम फले भी फुले भी और हमारा वो कालमुखी गाँव जो किसी आपदा से जलकर अपना वैभव खो चुका था वहां रहने वालों की जीवटता से आज फिर उसी वैभव, सुख समृद्धि से परिपूरित हो गया है।जिन्होंने वो विभीषिका देखी आज उनके बच्चे विद्याधन लेकर अपने गाँव को संवारने लगे है ।
तो ऐसी थी ""मेरी यादों की पोटली की दिवाली""
मेरे बचपन की दिवाली! आज की दिवाली में तो हर्षित होते ही है पर मन मे जो उन दीपों के साथ गाँव का सौंदर्य  बसा है ,वो अनिवर्चनीय सुख है!!!!

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