Sunday, January 24, 2010

क्या आवश्यक है ?

"गणतंत्र दिवस की अनेक शुभकामनाये "

कई बार अनियमितता के चलते या फिर दो दिन कोई मेहमान आ जाय तो घर अस्त व्यस्त हो जाता है |अभी पिछले साल जब घर कि पुताई(वैसे लोग पेंटिग करवाना कहना ज्यादा पसंद करते है ) करवाई और छत पर भी कुछ सामान रखा था रात में अचानक बेमौसम बारिश ग्लोबल वार्मिंग के कारण आने से जैसे तैसे सामान लाकर कमरों में पटक दिया |सुबह सुबह सब तो अपने काम से चले गये रह गई मै और बेतरतीब फैला सामान ,कहाँ से शुरू करू काम? कुछ समझ ही नहीं आ रहा था |ठीक वैसे ही पिछले दो चार दिन से हो रहा है इतने विषय दिमाग में घूम रहे है ,न चाहते हुए भी बार बार महंगाई के बारे में बात करना ,आपसी रिश्तो का दरकना ,मोबाईल पर झूठ पे झूठ बोलते हुए लोगो को सामने खड़े हुए सिर्फ देखना ,टेलीविजन पर ज्योतिषियों तर्कशास्त्रीयों कि बहस के द्वारा अपनी चैनल कि टी.आर .पी .बढ़ाना और टेलीविजन के धारावाहिकों में बेलगाम हिंसा का अत्यंत विकृत रूप परिवारों में दिखाना |
किसे विस्तार दू ?
इसी बीच रिलायंस फ्रेश में सोचा सब्जी ठीक मिल जाएगी? चलो आज वहीं से ले लेते है १२०० वर्ग्फूट कि जगह में रेक्स पर ठसाठस सामान भरा हुआ सा दीखता हुआ |एक बार में एक ही ट्राली और एक आदमी निकल सकता है उसमे भी उनके कर्मचारी ही सामान संजोने में लगे रहते है |एक बार में अगर दस आदमी आते है तो लगता है बहुत भीड़ है उस पर लगातार माइक पर ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए इस्कीमे दोहराते रहना कृत्रिम व्यस्तता दिखाने का ही एक उपाय लग रहा था |
सुबह ११ बजे के समय में ज्यादातर अवकाश प्राप्त लोग या गृहिणियां ही दिखाई देती है जो छांट छांट कर
सब्जी लेते है या पैक चीजो के भाव पढ़ पढ़कर सामान लेने में ही विश्वास करते है |पर आज कुछ नन्हे नन्हे ग्राहक भी दिखाई दिए जिन्हें उनकी शिक्षिकाये खरीददारी सिखाने के लिए लाई थी,प्यारे प्यारे छोटे छोटे नर्सरी के महज तीन साल के बच्चे |उन्हें सब्जियों के, फलों के अंग्रेजी नाम सीखना था? कैसे ट्राली लेकर आना? कैसे सामान लेना ?और कैसे बिल बनवाना |बच्चे बार बार कतार से अलग हो जाते उन्हें मिस डांट देती फिर ललचाई नजरो से चाकलेट कि तरफ देख लेते
और कतार में खड़े हो जाते |इस बीच मैडम ने अपने घर के लिए किराना खरीद लिया और करीब १५ मिनट में बच्चे वापस कतार में ही जाने लगे |और वही के एक कर्मचारी द्वारा उन्हें एक - एक चाकलेट दी जाने लगी |तभी एक बच्चे ने मचलकर कहा -मुझे दो चाकलेट चाहिए अपनी मम्मी के लिए भी ?पर सबको एक एक ही चाकलेट मिलनी थी |बच्चो का
शापिग पीरियड समाप्त हो गया था वो चले गये मै उनको देखने में ,उनकी नन्ही आँखों के अनेको प्रश्न पढने का प्रयत्न कर रही थी |और कुछ अपने से किये ?प्रश्नों के उत्तर भी खोज रही थी कि क्या ?बच्चो को अभी से खरीदारी करना सिखाना आवश्यक है ?और जितने अंग्रेजी नाम उन्हें सिखाये गये रोजमर्रा कि चीजो के वो भी अभी जरुरी है ?क्या वो याद रख पायेगे ?घर जाने तक ?यही सोचते सोचते मैंने भी सब्जी ली और घर आ गई|
घर आते ही मैंने देखा सामान रखने वाले काउन्टर से अपना सामान लाना भूल गई, सोचा शाम को ले कि टोकन तो है ही |शाम को गई तो देखा सुबह के बच्चो वाला ग्राहक बच्चा अपनी मम्मी का आचल पकड़कर जिद कर रहा था चाकलेट के लिए और कह रहा था अंकल ने सुबह तो दी थी अभी क्यों नहीं देते ?मम्मी ने बहुत समझाया सुबह कि बात अलग थी पर बच्चा कहाँ मानने वाला था ?उसकी मम्मी को चाकलेट खरीदनी पड़ी और वो भी पूरे परिवार के लिए ||
और मै सोचने लगी क्या बच्चे ने खरीददारी सीख ली? और बाजार ने बिक्री ????????

Wednesday, January 20, 2010

बसंत











शीत
की बंद कोठरी के द्वार से
अंधेरो को उजाले में लाया है बसंत

महकती कलियों के लिए भोरो का ,
प्रेम संदेश लाया है बसंत .

पीले से मुख पर बसंती आभा
बिखेरता हुआ आया है बसंत .

किसानो के लिए फसलो की सोगात
लेकर आया है बसंत .

जीवन को जीवन देने ,
फ़िर से आया है बसंत .

और पढ़ते हुए बच्चो के लिए ,
देवी माँ सरस्वती का वरदान
लेकर आया है बसंत

Wednesday, January 13, 2010

कैसा दान ?

अभी १५ दिन पहले चन्द्र ग्रहण था बस दूसरे दिन सुबह -सुबह ही दान लेने के लिए महिला स्वीपर( अंग्रेजी लिए क्षमा करे ) का बेल पर बेल बजाना शुरू और दरवाजा खोलते ही जोर जोर से बोलना जारी था :दान दे दो ग्रहण छूटने का ?
मैंने कहा - अभी तो उठे है जरा पहले कचरा ले लो बाहार कि सफाई कर दो फिर लेजाना |
आज हम कचरा नहीं उठायेगे और न ही झाड़ू लगायेगे |उसने तपाक से कहा -
अब मै अपने क्रोध को नहीं दबा सकती थी मैंने भी कह दिया फिर हम भी आज दान नहीं देगे ,कल ले जाना |
मन में तो मेरे ये आ रहा था कि आज क्या ? कल क्या? कभी भी इसको दान नहीं दू ?
दान मांगने से थोड़ी मिलता है? ये तो सरासर भीख मांगना ही हुआ |
वह दोनों हाथ कमर पर रखकर आंखे मटकाकर बोली -जड़ी से ५१ रूपये दे दो |
मैंने कहा - दान में तो कपडा अनाज देते है, रुपया तो तो नहीं देते ?
हम कपड़ा अनाज, वजन उठाकर नहीं ले जा सकते ?
मै सकते ?में थी क्या करू ?देती हूँ तो मेरी हार होगी ?नहीं दूँगी तो तो मुझे अपने बचपन के वो सारे टोटके याद गये जब भी बोर्ड कि परीक्षा देने जाते दादी कहती बेटा मेहतरानी अगर सुबह सुबह दिख जाये तो अच्छा शगुन होता है |अब सुबह सडको कि तो सफाई होनी ही होती है ? तो तो मेहतरानी तो दिखेगी ही ?साथमें दादी कुछ रेजगारी भी दे देती और कहती
अगर दिख जाये तो उसे दे देना तब परचा अच्छा जाने कि उम्मीद में बड़ी श्रद्धा से उसे दे देते |(ये बात और है कि जब ढंग से पढाई ही नहीं कि तो मेहतरानी भी क्या करती ?)आज उस श्रद्धा कि जगह विद्रोह ने ले ली थी |इसके पीछे इन लोगो का लालच, इनकी ढिठाई , इनकी अकर्मण्यता मुझे पीछे खींच रही थी |सरकार से तनखा ये पाते है ,फिर भी हर घर से १०० रुपया महीना लेते है खुद काम नहीं करते अपनी जगह दुसरो को मजदूरी पर रखते है सबके इलाके बंटे होते है |रविवार के आलावा हफ्ते में और दो दिन इनका जन्म सिद्ध अधिकार है |और फिर हरेक त्यौहार पर छुट्टी ,इनाम |
मै कुछ और उसे कहती इसके पहले ही हमारे पड़ोसी ने उसे बुलाकर फटाफट ५१ रूपये दिए और दरवाजा बंद कर लिया
वो फिर मेरे सामने खड़ी हो गई मै खीज कर अन्दर गई २१ रूपये निकलकर उसे दे दिए 1उसने मुझे बड़ी ही हिकारत कि नज़र से देखा और अपने छोटे से पर्स में नोट ठूंसकर रखती हुई चली गई |
कल फिर संक्रांति है मै आज से चिंता में हूँ १०० रूपये किलो तिल ,५० रूपये किलो गुड ,100 रूपये किलो कि दाल और ५० रूपये किलो के चांवल कितनी खिचड़ी मंदिर में दू ? कितनी ब्राहमण को ?कितनी स्वीपर को और कितनी संघ के लोगो को |
एक जमाना था जब गाँवो में अनाज खेत से घरो में आता था ,नया गुड बनता था दाले घर कि होती थी भरपूर धान होता था भरपूर टोकनियाँ भरकर श्रद्धा से दान दे दिया जाता था |ब्राहमण का आसरा भी यही होता था क्योकि वह घर घर पूजा पाठ करवाकर अपने परिवार का पेट भरता था उसकी जीविका का अन्य कोई साधन नहीं था |आज जब पंडित अन्य कई माध्यम से जीविका अर्जन करता है मन्दिरों से उन्हें उचित तनखाह मिलती है |फिर दान का क्या ओचित्य ?
उसके बाद फिर से १५ दिन में सूर्य ग्रहण
मुझे सामना करना है फिर से चिंता में हूँ ?कि मुझे सामना करना है स्वीपर का ,ढोल वाले का,बेन्ड बजे वाले का ,
हिजडो का ,घर में काम करने वाली सहयोगियों का ?
और इन सबके बीच मेरी जोर शोर से " हल्दी कुमकुम"का आयोजन का बजट में कटोती कि भेंट चढ़ जाता और चाहकर भी सिर्फ छोटे छोटे दीपक ही स्वेच्छा से दे पाती और तिल गुड खाओ और मीठा मीठा बोलो सिर्फ यही कह पाती ....

Tuesday, January 12, 2010

"शांति "स्वामी विवेकानंद द्वारा रचित कविता

आज स्वामी विवेकानंद जी कि जयंती है जिसे" राष्ट्रीय युवा दिवस" के रूप में मनाया जाता है |आज के संचार माध्यमो में स्वामीजी के विचारो को लेकर जागरूकता नहीं है ,और नहीं उनका ध्यान इस और है, पर स्वामीजी के विचार आज भी उतने ही प्रासंगिक है |स्वामी विवेकांनद ने देश विदेशो में जो व्याख्यान दिए थे उन्ही में से उनके कुछ उदगार है ---
हम प्रत्येक आत्मा को आव्हान करें -"उत्तिष्ठत ,जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत ,-उठो जागो और जब तक लक्ष्य प्राप्त न कर लो कहीं मत ठहरो |"
उठो!जागो !दौर्बल्य के मोहजाल से निकलो ,कोई वास्तव में दुर्बल नहीं है |आत्मा अनंत ,सर्वशक्तिमान एवं सर्वव्यापी है खड़े हो स्वयम को झकझोरो ,अपने अन्दर व्याप्त ईश्वर का आव्हान करो |
उसकी सत्ता को अस्वीकार मत करो|हमारी जाति पर बहुत अधिक निष्क्रियता ,बहुत अधिक दुर्बलता और बहुत अधिक मोहजाल छाया रहा है और अब भी है |
सच्चा मनुष्य वह है ,जो मूर्तिमंत पौरुष के समान सामर्थ्यशाली हो किन्तु साथ ही नारी के जैसे कोमल अंत करण से युक्त हो तुममे अपने चारों ओर रहने वाले लक्षावधि प्राणियों के प्रति सहानुभूति तो हो किन्तु उनके साथ ही तुम दृढ एवं कर्तव्य- कठोर भी बनो |तुममे आज्ञाकारिता भी अवश्य रहे |भले ही ये बाते तुम्हे परस्पर विरोधी लगे -किन्तु ऊपर से दिखने वाले इन गुणों को अपनाना ही होगा |

स्वामी विवेकानंद जी के भाषण तो जग प्रसिद्द है उनके द्वारा रचित कुछ अंग्रेजी कविताओ का अनुवाद कवितावली पुस्तक में है इसमें सन १८९९ में न्यूयार्क के रिजले मनर में लिखित "peace "नमक कविता का अनुवाद निम्नलिखित है |

" शांति "

देखो ,जो बलात आती है ,
वह शक्ति ,शक्ति नहीं है !
वह प्रकाश ,प्रकाश नहीं है
जो अधेरे के भीतर है ,
और न वह छाया ,छाया ही है
जो चकाचोंध करने वाले
प्रकाश के साथ है |

वह आनन्द है ,
जो कभी व्यक्त नहीं हुआ ,
और अन्भोगा ,गहन दुःख है
अमर जीवन जो जिया नहीं गया
और अनन्त मृत्यु ,जिस पर
किसी को शोक नहीं हुआ |

न दुःख है न सुख ,
सत्य वह है
जो इन्हें मिलाता है |
न रात है ,न प्रात ,
सत्य वह है
जो इन्हें जोड़ता है |

वह संगीत में मधुर विराम ,
पावन छंद के मध्य यति है ,
मुखरता के मध्य मौन ,
वासनाओ के विस्फोट के बीच
वह ह्रदय कि शांति है |


सुन्दरता वह है ,जो देखि न जा सके
प्रेम वह है ,जो अकेला रहे
गीत वह है जो ,जिए ,बिना गाये,
ज्ञान वह है जो कभी जाना न जाय |

जो दो प्राणियों के बीच मृत्यु है ,
और दो तूफानों के बीच एक स्तब्धता है ,
वह शून्य ,जहाँ से स्रष्टि आती है
और जहाँ वह लौट जाती है |

वहीं अश्रुबिंदु का अवसान होता है ,
प्रसन्न रूप को प्रस्फुटित करने को
वही जीवन का चरम लक्ष्य है ,
और शांति ही एकमात्र शरण है |


ॐ शांति शांति शांतिः |




Saturday, January 09, 2010

खोज

शुरू में जब ब्लॉग लिखना शुरू किया था तब उस समय जो विचार आये थे उन्हें कविता का रूप दे दिया था और शीर्षक पाठको पर छोड़ दिया था तब एकमात्र टिप्पणी आई थी और शीर्षक था" खोज "चूँकि अब टिप्पणियों का थोडा लालच आ गया है तो फिर से अपने ब्लॉग कि दूसरी पोस्ट "पोस्ट "कर रही हूँ जस कि तस |

एक
राहगीर अमराई में, आम ढूंड रहा था
एक शिक्षक कक्षा में, खास ढूंड रहा था
आम तो दलालों ने पकने रख दिए ,
और खास तो मोबाइल में व्यस्त हो गए|

एक मचुअरा तालाब में मछली ढूंड रहा था
एक पंडित मन्दिर में मूर्ति ढूंड रहा था,
तालाब की मछली ठेकेदार ले गए
और मन्दिर की मूर्ति विढेशी ले गए |

एक धार्मिक सत्संग में धर्म खोज रहा था
एक भूखा लंगर में रोटी ढूंढ़ रहा था
धर्म तो प्रवचन और कथाओं में गुम हो गया
रोटी तो चलते चलते दिल्ली पहुँच गई |

एक साधू जंगल में शान्ति ढूंढ़ रहा था
और मै टीवी समाचार में , समाचार खोज रही थी,
साधू की शान्ति तो पर्यटक ले गए
और मैं समाचार सुनकर मुर्छित हो गई||

आस्था ने बहुत सुंदर शीर्षक भेजा है
तो कविता का शीर्षक है ,
"खोज "
धन्यवाद आस्था

Wednesday, January 06, 2010

कुछ यूँ भी .......

वक्त कि जुराबों में ,अनफिट रहे हम
पत्थरों के शहर में ,शीशा हुए हम|

खुदा कि खुदाई ,सहते रहे हम
पत्थरों को भगवान मान ,पूजते रहे हम|

उन सूनी और अँधेरी गलियों, कि क्या कहें
जब भीड़ भरी सडको पर , तनहा रहे हम|

अहसासों के आँगन में ,आवाज कि खामोशिया
चंदा कि चांदनी, में ढूंढते रहे हम|

सरपट दौडती जिदगी के , चोराहे पर
वक्त ही कहाँ नजरे मिलाने चुराने को दे पाए हम |

Wednesday, December 30, 2009

"खुशियों कि राम राम "

सूरज रोज अपने नियत समय पर होता उदय होता है वो कभी नये साल का या केलेंडर का इंतजार नहीं करता अनवरत उसे तो चमकना ही है
तो हम भी क्यों इस एक दिन ही शुभकामनाये दे और ले ?
हर रोज के उगते सूरज के साथ ही नियमित शुभकामना इस सारे संसार को |

लो फिर नया साल गया
बीती बाते
बीते साल कि,
जो आदत बन गई
जैसे कि
दाल का कम खाना

बिन मौसम बरसात का आना

चाहते हुए भी
पड़ोसी के बेटे कि शादी के रिसेप्शन के
गिद्ध भोजन को निहारकर
११ बजे रात तक भी दूल्हा दुल्हन के
स्टेज पर आने तक
लिफाफे को पकडे रह जाना |

टेलीविजन के रियलिटी शो के
नकलीपन को देखकर
जानकर भी उसे रियल मान लेना |

शादियों में डी.जे.के शोर का
विरोध करते करते
खुद उस नाच में
झूमकर शामिल हो जाना|

अपने को देश के कर्णधार
समझने वाले नेताओ का
देश के ज्वलंत मुद्दों
से परे हटकर
अपने ही रास रंग में खो जाना |

हाँ
इन सबसे अलग
ये बात खास
ये बात खास महत्वपूर्ण
ब्लॉग के जरिये
नये पर अपने से लगते
अपनों से जुड़ जाना

इस अपने इस परिवार को
नये साल कि
नई सुबह की
सूरज की नई
पहली किरन की

प्यारी सी
राम राम







|

Saturday, December 12, 2009

शिक्षा की लय

कमरे में टी.वि पर t-20 क्रिकेट का बढ़ता हुआ शोर .घर के बाहर बच्चो का चिल्लाना ,अपनी माँ का आंचल पकड़कर जिद करते हुए रोना और मन में उठते अनेक द्वंदों के बीच बरसो से नियमित करती हुई आरती कि लय का टूट जाना मुझे विचलित कर गया |क्या मुझ्मे इतना भी धैर्य नहीं कि ,या मेरी समस्त पूजा मुझे इतना भी नहीं सिखा सकी कि मै अपने आप को कुछ देर तक शांत रख पाऊ |फिर मेरा मनन शुरू हो गया आखिर किस बात ने मुझे विचलित किया ,टी. वि ने बच्चो के शोर ने ?पर ये तो रोज ही होता है |दिन भर कि दिनचर्या पर नज़र डाली तो सोचने लगी आज फोन पर किस्से बात कि ?किसने अपनी बहू के बारे क्या कहा ?किसने अपने घर के किये कामो को गिनाया ?इसी पर पर मुझे ध्यान आया अभी अभी जो नई काम करने वाली बाई लगी थी पता नहीं ये १०वि थी या ग्यारवी बाई अब तो बाई लगते छूटते ऐसा लगने लगा है कि हममे कितनी कमिया है कि कोई बाई टिकती ही नहीं जैसे आजकल शादिया नहीं टिकती कोई ठोस कारण नहीं होते शादी न टिकने के पर फिर भी नहीं टिकती शादी ,वैसे ही बाई छूटने के कोई ठोस कारण नहीं होते |
हाँ तो नई बाई को दो दिन हुए थे काम करतेहुए इस बार मैंने सोच लिया था उसके दुःख दर्द नहीं पूछूंगी उसके दुःख दर्द कब मेरे हो जाते है और वो मुझे ऐसे ही छोड़कर दूसरो को अपना दुःख सुनाने चली जाति है मेरी जैसी मम्मीजी को ?
पर अपनी आदत से लाचार उसके रहन सहन को देखकर मेरी जिज्ञासा का कटोरा भर चुका था|
पिनअप कि हुई बढ़िया साडी ,ब्यूटी पार्लर से कटाए हुए बाल ,आइब्रो करीने से सवरे हुए जब वो सुबह आती तो एक बार मै उसे देख अपने आप को देखने लगती औए मन ही मन तुलना करने लगती और खीज हो आती अपनी बढती उम्र पर |
आखिर मैंने पूछ ही लिया इसके पहले कहाँ काम करती थी? वहां क्यों छोड़ा ?
कितने ही बार टी।वि पर समाचारों में देखा था कि घरेलू नोकर रखने के के पहले अच्छे तरह से जाँच पड़ताल कर ले पुलिस में भी सूचना दे दे |अब पुलिस में सूचना करना तो अपने बस कि बात नहीं? पर कम से कम बातो से ठोंक बजा तो ले बस इसी के चलते मै अपनी डयूटी पूरी कर रही थी |

मेरे प्रश्नों के उत्तर उसने बड़ी तत्परता से दिए -कहने लगी मैंने अभी तक कही कोई काम नहीं किया है पहला ही काम है |
मैंने पुछा ?तो अब तक कैसे घर चलाती थी |
वो कहने लगी -अभी तक मै साँस ससुर के साथ रहती थी अब उनसे अलग हो गई हूँ ,घर का किराया दो हजार रूपये है १००० आपके यहाँ से मिल जावेगे १००० का एक घर और है |
और बाकि घर का खर्चा कैसा चलेगा ?
वो तो मेरे पति अच्छा कमाते है वो चला लेगे |
तुम तो पढ़ी लिखी लग रही हो /
हा मै बी. ऐ .पढ़ी हूँ |
तो कोई स्कूल में क्यों नहीं पढ़ा लेती ?आजकल तो गली गली में स्कूल है |
उपदेश देने की आदत से मजबूर होकर मैंने पुछा ?
हाँ पढ़ाती थी न ? कुर्सी के नीचे पोछा लगाते हुए वो बोली -पर वहां सुबह ७ बजे से जाना होता है और दोपहर दो बजे वापसी होती थी और सिर्फ ९०० रूपये मिलते थे बच्चे भी दादा दादी के पास रह लेते थे |अब जब अलग हो गई हूँ तो इन्हें कौन संभाले ?
पर तुम अलग क्यों हुई ?मैंने फिर कुरेदा |
मुझसे नहीं होता रोज सुबह शाम साँस ससुर का खाना बनाना , उनके कपड़े धोना उनकी बंदिशे मानना|
जब से अलग हूँ अच्छा है कोई रोक टोक नहीं है अभी तो मुझे आपके सामने वाले घर में भी खाना बनाने को बुला रहे है १५०० का काम है |
इतना कहते कहते उसका पोछा पूरा हो गया, फटाफट हाथ धोये और वो बोली -अच्छा मम्मीजी आज मुझे ५०० रूपये अडवांस दे दो मुझे गैस कि टंकी लेनी है |
मै कुछ बोल भी नहीं पाई बस दिमाग में घूम रहा था १२वि बाई कहाँ धुन्धुगी ?
५०० का नोट निकलकर उसे दे दिया |
तब से ही शायद विचार उमड़ घुमड़ रहे थे .अपने बचपन के सारे गुरु याद आ गये |
और शिक्षा कि लय बिगडती देखकर मेरी आरती गाने कि लय भी टूट चुकी थी ????/,

Tuesday, November 10, 2009

तो मै क्या करू?

मेरे पति देव कहते है की तुम्हारे सोचने से दुनिया थोडी न बदल जावेगी ?
पर क्या करू ?जब उनके साथ स्कूटर पर बैठ कर जाती हूँ ब्रेक ठीक करवाने रुकते है और एक सात या आठ साल का बच्चा आकर खुशी खुशी आकर ब्रेक ठीक कर देता है और हथेली पर रखे सिक्के को देखकर खुश होता है और में सोचने लगती हूँ ये बच्चा स्कूल जाता है कि नही?
मेरे पडोस में एक आठ साल की बच्ची दो साल के बच्चे को सुबह आठ बजे से लेकर पॉँच बजे तक बच्चे को खुशी खुशी सभालती है और खुशी खुशी ५०० का नोट महीने के आखिर में घर ले जाती है तो मै उसकी पढ़ाई के बारे में सोचने लगती हूँ |
पंकज सुबीर जी कि " बेजोड़ " कहानी" ईस्ट इंडिया" की तर्ज पर चायनीज सामान के बल पर चीन हमारे घर में पाव पसार रहा है और हम खुशी खुशी हमारे घर, त्योहारों पर रोशन कर रहे है तो मै सिर्फ़ सोचती हूँ कि ये रौशनी क्या हमारी सच्ची खुशी है?
अपनी छटवीसंतान को अपने गर्भ में (पॉँच बेटियों के बाद बेटा ही होगा इसी आस में )लिए मेरी (घमंड )कामवाली बाई महीने भर बर्तन मांजने के बाद २०० रूपये खुशी खुशी ले जाती है तब मै सोचती हूँ परिवार नियोजन कहाँ तक सफल हुआ है ?
नित नये नेताओ के द्वारा किए गये घोटाले ,विधान सभा में शपथ लेते और उनके माइक हटाते विधायको कि खबरों को दिखाने वाले टी .वि .चैनल शाम को मौज मस्ती करने वाले खोजी पत्रकार खुशी खुशी ऐशो आराम पा जाए ?तो मै सोचती हूँ क्या ?भागवत गीता सिर्फ़ उपहार देने के लिए ही छपती है |
८२ डिब्बो कि रेलगाडी वाला केक जब अडवानी जी के लिए बनाया जाता है , और अपने जन्मदिन पर जब ख़ुशी ख़ुशी केक काटते है और अपने संघ कि विचारधारा वाले लोगो को खिलाते है तो मै सोचने लगती हूँ कि घर घर हिदू धर्म का प्रचार करने वाली विचारधारा विदेशी परम्परा का मोह क्यो ? छोड़ नही पाती |
मुझे सोचता देखकर शायद आप भी कह सकते है !बहुत हो गया अब सोचना! कुछ करो भी ? अब आप ही बताये मै क्या करू?