Monday, March 25, 2013

होली के रंग ,मेरे जीवन के संग

 होली के रंग , मेरे जीवन के संग 



जैसे जैसे होली नजदीक आ रही है मन में उत्साह का संचार होने लगा  है 
,बचपन से लेकर अब तक की कितनी ही होलियाँ चलचित्र की भांति घूमती  जा रही है आँखों के सामने । गाँव की होली ,जिसमे दादाजी का अपना तर्क रहता था यह ब्राह्मणों का त्यौहार नहीं है! और कभी घर के बाहर नहीं निकलने दिया जाता ,बस उपर की  खिड़की में से  लोगों को देखते रहते ।  गुलाल ,रंग और कोई कोई गोबर भी छीट देते शरारत में भरकर, तब  मन को अच्छा ही लगता की दादाजी सच कहते है । थोड़े बड़े  हुए छोटे शहर में  आये तो भी बाहर निकलने   की पिताजी की ओर  से सख्त मनाई लडकियाँ होने की वजह से ।हाँ पिताजी और चाचाजी जरुर पकोड़े खाक र निकल जाते होली खेलने जल्दी ही ,ताकि लोग घर में बुलाने न आजाये । हम भी कहाँ मानने वाले हम सब बहने चचेरी बुआ ये ,फुफेरी बहने तो रात को ही आ जाती क्योकि होली के दिन सबको बहर निकलने की सख्त मनाई होती । बस फिर क्या ?कुए पर बाल्टियो से पानी खीचकर एक दूसरे  पर बेतहाशा डालना और मस्ती करना । कालेज में आये तो कालेज में  बाम की डिब्बियों में गुलाल भरना उसके उपर छेद करना और होली के बाद पाँच दिनों की मस्ती (म. प्र. में रंग पंचमी तक होली मानते है  ।  )शादी के बाद मुंबई में होली आई तो बस सब पूरनपोली खाकर बिना गुलाल ,रंग के होली मनाते|  अगली होली पर हमने ठान लिया था  , सबको बाहर निकालकर रहेँगे  कालोनी में सब मुझसे उम्र बे बड़े थे, और बच्चे थे सब ७ या ८  साल के| 
 उनको इकठा किया , गुलाल हाथ में लिया और सबके घरो में  जाकर सबको गुलाल लगाया प्रणाम किया ।सब इस डर  में की कही शोभा भाभी घर में ही रंग न बिखेर  दे  इस डर से, या उन्हें अच्छा लगा इस तरह होली मनाना? सब बाहर निकल आये । फिर   तो कई सालो तक यह सिलसिला चलता रहा उसमे नये लोग जुड़ते गये | नये रंग, नये पकवान, नए खेलो के साथ होली मनती रही ।उसमे गुब्ब्बरो की होली सबको ज्यादा भाने लगी ।  

फिर जब राजस्थान और  मध्य प्रदेश की  बार्डर पर रहने आये तो फिर क्या था होली बहुत रंगमय हो गई | सीमेंट फेक्ट्री की टाउनशिप की होली जिसमे सभी रंग होते स्नेह  मिलन   ,
दही बड़े ,कांजी बड़े , ठंडाई के साथ  ही रंग गुलाल और हाँ अब तक" रंग बरसे भीगे चुनर वाली "यह गाना भी होली पर गाना अनिवार्य सा हो गया था  । इन रंगों में कोई वार्निश ,मिला देता या बहुत ही काले रंग लगा देता तो दादाजी की कही बात फिर से याद आ जाती ।हाँ राजस्थान में रंग तेरस को भी खूब होली मनती और सखियो. के संग खूब  बासोड़ा खाते। 
 फिर इंदौर की होली असल होली, भयंकर होली रंगों की, पानी की,  गेर की गेर निकलती गाने गाते बजाते ,बहु बेटे के साथ और कालोनी के सभी लोगो के साथ खूब जमकर होली खेली जाती ,होली खेलने के पहले ही हम सब अड़ोसी पड़ोसी एक एक खाने की चीजे बना लेते और होली खेलने ,अन्ताक्षरी खेलने के बाद नहाने धोने के बाद दोपहर में सहभोज होता । बहुत ही संक्षिप्त में होली को समेट  लिया है | 
होली हो और राधा  किशन का नाम न हो ?होली का त्यौहार और राधाकिशन एक  दुसरे के पर्याय हो गये है मथुरा व्रन्दावन में तो एक माह पहले से ही फाग शुरू होजाता है संयोग से कुछ साल पहले माघ की पूर्णिमा को द्वारकाधीश मंदिर में होली शुरुआत देखने का अवसर मिला था ,मन प्रफ्फुलित हो गया था वह की शोभा देखकर | हमेशा मन में प्रश्न उठता है सीता राम की होली का कही कोई वर्णन नहीं है ?
शिवजी की होली ,भंग घोटा अबीर  गुलाल से हमेशा शिवजी प्रसन्न रहते है । 
ओंकारेश्वर में नर्मदा नदी केतट  पर एक निमाड़ी होली लोक गीत प्रसिद्द है "निमाड़ी होली लोक गीत "
'


निमाड़ी-     नर्बदा रंग सी भरी होळ इ खेलो श्री ओंकार 
हिंदी -नर्मदा रंग से भरी है होली खेल लो श्री ओंकार 
निमाड़ी -काय का तो रंग  बनाया तो काय न की  पिचकारी नर्बदा ........
हिंदी -किस चीज से  रंग बनाये है और किससे पिचकारी 
निमाड़ी -अर्ण बरन का रंग बनाया न कंचन की पिचकारी नर्बदा ........
हिंदी -(अर्ण ,बर्न एक जंगली जड़ी )का  रंग बनाया  और सोने  की पिचकारी
निमाड़ी -भरी पिचकारी अंग पर डारी ,तो भींज गई पारबती नर्बदा .........
 हिंदी -पिचकारी भरकर पारबती जी के अंग पर शिवजी ने डाली तो पार्वतीजी पूरी तरह से भीग गई |

बंसी वाले की जय 
मुरली वाले की जय  राधे रानी की जय महारानी की जय 


बोलो कीर्ति कुमारी की जय जय 




                                           
ओंकारेश्वर   का विहंगम द्रश्य


                                   


पूजन सामग्री से सजी दुकाने 
ममलेश्वर में पूजा 
श्वेता क्षितिज  बहू  बेटा 
इतना गुलाल लगाओ की कभी न छूटे
विक्रम सीमेंट परिवार के साथ होली  
इंदौर की मदमस्त होली 
होली के बाद बाल  गोपाल का भोजन 
मुंबई की सखियों के साथ होली (अब क्या करे )

                 




  होली सबके जीवन में खूब खूब रंग भर दे ।






Saturday, March 23, 2013

"शब्दों की होली "

होली का उत्साह चारो और दिखाई देने लगा है भारतीय त्योहारों का आकर्षण ही तन मन को विभोर कर देता फ़िर होली तो  है ही रंगीला उमंगो से भरा त्यौहार ,किंतु आजकल पानी की कमी के कारण पानी को बचाने के उदेश्य से सिर्फ़ गुलाल से होली खेलने की जरुरत महसूस की जा रही है और हम सब का कर्तव्य है की होली भी खेले और और इस त्यौहार की गरिमा को भी बनाये रखे |

तो आओ कुछ इस तरह होली खेले |

"शब्दों की होली"

महुआ 


'महुआ 'नही है तो क्या ?

मै हूँ ,हम है ,आप है |
पलाश 
'पलाश नही है तो क्या ?
पिचकारी है, लड़कपन है ,शरारत है|

रंग  ,रंग   रंग 
रंग नही है तो क्या ?
रात की रानी है ,
गुलाब की  बहार है |

पानी

"पानी" नही है तो क्या?
पास है अपने सभी तो
 निराशा की क्या बात है ?
तो आओ
लड़कपन की, पिचकारी की शरारत को
याद करके ,
रात की रानी ,गुलाब की महक से
,सारा जहा अपना बना ले |
आप हम और मै
अबके बरस इस होली में |


Wednesday, March 20, 2013

स्पन्दन

बहुत पहले लिखी थी ये पोस्ट आज फिर दे रही हूँ
राधा का अर्थ है ...मोक्ष की प्राप्ति
'रा' का अर्थ है 'मोक्ष' और 'ध' का अर्थ है 'प्राप्ति'
कृष्ण जब वृन्दावन से मथुरा गए,तब से उनके जीवन में एक पल भी विश्राम नही था|
उन्होंने आतताइयों से प्रजा की रक्षा की, राजाओं को उनके लुटे हुए राज्य वापिस दिलवाये और सोलह हज़ार स्त्रियों को उनके स्त्रीत्व की गरिमा प्रदान ki
उन्होंने अन्य कईं जन हित कार्यों में अपने जीवन का उत्सर्ग किया उन्होंने कोई चमत्कार करके लड़ाइयाँ नही जीती,अपनी बुद्धि योग और ज्ञान के आधार पर जीवन को सार्थक किया मनुष्य का जन्म लेकर , मानवता की...उसके अधिकारों की सदैव रक्षा की
वे जीवन भर चलते रहे , कभी भी स्थिर नही रहेजहाँ उनकी पुकार हुई,वे सहायता जुटाते रहे|

इधर जब से कृष्ण वृन्दावन से गए, गोपियान्न और राधा तो मानो अपना अस्तित्व ही को चुकी थी
राधा ने कृष्ण के वियोग में अपनी सुधबुध ही खो दी,मानो उनके प्राण ही न हो केवल काया मात्र रह गई थी
राधा को वियोगिनी देख कर ,कितने ही महान कवियों ने ,लेखको ने राधा के पक्ष में कान्हा को निर्मोही आदि संज्ञाओं की उपाधि दी
दे भी क्यूँ न????
राधा का प्रेम ही ऐसा अलौकिक था...उसकी साक्षी थी यमुना जी की लहरें , वृन्दावन की वे कुंजन गलियां , वो कदम्ब का पेड़, वो गोधुली बेला जब श्याम गायें चरा कर वापिस आते थे , वो मुरली की स्वर लहरी जो सदैव वह की हवाओं में विद्यमान रहती हैराधा जो वनों में भटकती ,कृष्ण कृष्ण पुकारती,अपने प्रेम को अमर बनाती,उसकी पुकार सुन कर भी ,कृष्ण ने एक बार भी पलट कर पीछे नही देखा ...तो क्यूँ न वो निर्मोही एवं कठोर हृदय कहलाये ,किन्तु कृष्ण के हृदय का स्पंदन किसी ने नही सुना स्वयं कृष्ण को कहाँ , कभी समय मिला कि वो अपने हृदये की बात..मन की बात सुन सके या फिर यह उनका अभिनय था!


जब अपने ही कुटुंब से व्यथित हो कर प्रभास -क्षेत्र में लेट कर चिंतन कर रहे थे तो 'जरा' के छोडे तीर की चुभन महसूस हुई तभी उन्होंने देहोत्सर्ग करते हुए ,'राधा' शब्द का उच्चारण किया,जिसे 'जरा' ने सुना और 'उद्धव' को जो उसी समय वहां पहुंचे ..उन्हें उनकी आंखों से आंसू लगातार बहते जा रहे हैं ,सभी लोगों ,अर्जुन ,मथुरा आदि लोगो को कृष्ण का संदेश देने के बाद ,जब उद्धव ,राधा के पास पहुंचे ,तो वे केवल इतना कह सके ---
" राधा, कान्हा तो सारे संसार के थे ...
किन्तु राधा तो केवल कृष्ण के हृदय में थी"


साथ ही एक दैनिक प्रार्थना जो मुझे हर पल आनन्द से जीने का संबल देती है |
प्रार्थना
सांवरे घन श्याम तुम तो ,प्रेम के अवतार हो ,
फंस रहा हूँ झंझटो में ,तुम ही खेवनहार हो ,
चल रही आँधी भयानक ,भंवर में नैया पड़ी ,
थाम लो पतवार हे ! गिरधर तो बेडा पर हो ,
नगन पद गज के रुदन पर, दौड़ने वाले प्रभु ,
देखना निष्फल न मेरे , आंसुओ की धार हो ,
आपका दर्शन मुझे इस छवि में बारम्बार हो ,
हाथ में मुरली मुकुट सिर पर गले बन माल हो ,
है यही अंतिम विनय तुमसे, मेरी ए नन्दलाल ,
मै तुम्हारा दास हूँ और तुम, मेरे महाराज हो ,
मै तुम्हारा दास हूँ और तुम, मेरे महाराज हो..........................
इसे यहाँ मेरी आवाज में भी सुन सकते है |


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Monday, March 18, 2013

आवाज

 आवाज 

इन पन्नो पर लिखते रहें
अफसाने
सुबह शाम के हम , 
 एक दिन जरुर पढ़े जायेगें हम ...

इन कानो से सुनते रहें 
चहचहाना पंछियों का 
सुबह शाम  हम 
एक दिन उनसे 
संवाद कर जायेगे हम .......

विचारो से 
उनकी हस्ती न मिटाये 
तो ही अपनी 
हस्ती बना पायेंगें  हम .......




Saturday, March 09, 2013

भोले बाबा के संग

हर साल शिवरात्रि पर जागरण में ,हरतालिका तीज जागरण में यह भजन बड़ी तन्मयता से हम सब सखिया मिलकर गाया करती थी और "भोले बाबा  "सचमुच प्रकट हो जाते थे ऐसा लगता था ।महाशिवरात्रि की पूर्व संध्या पर कई जानकारी परख आलेख पढ़े ब्लॉग पर फेस बुक पर तो ह्रदय में यह गीत गूंजने लगा आप सबके साथ फिर गुनगुना लूँ ।आखिर की दो पंक्तिया याद  नहीं आ रही है अगर आप लोग जानते है तो कृपया भजन पूराकरने की कृपा करे . ।

यह विशाल शिवजी की मूर्ति जबलपुर में है 



  •  

  •  
  •  उतरांचल यात्रा के समय अल्मोड़ा के पास एक मन्दिर में




अल्मोड़ा के पास एक प्राचीन शिव मंदिर 

 
 




एक भगत शिव का चला शिव को मनाने के लिए
हाथ में दो फूल ,लोटा ,जल चढ़ाने के लिए
एक भगत शिव का ........,
जल चढाया ,फूल चढ़ाया ,दीप जलाकर रख दिया
हाथ जब उपर उठाया घंटा बजाने के लिए
एक भगत शिव का .......
देखकर सोने का घंटा, पाप मन में आ गया ,
क्यूँ न इसको घर ले जाऊ गहने बनाने के लिए
एक भगत शिव का .........
इधर देखा ,उधर देखा, शिवजी के ऊपर चढ़ गया
 दोनों हाथ उपर उठाये घंटा ले जाने के लिए
एक भगत शिव का .........
.कोई चढ़ावे  फूल, फल और कोई चढ़ावे बेल पत्र
उसने तो खुद को चढाया ,शिव को मनाने के लिए
एक भगत शिव का
देखकर भोले की भक्ति ,शिवजी प्रकट होही  गये
बोले बच्चा आ गया मै ,तुझको  ले जाने के लिए
एक भगत शिव का ........



Thursday, March 07, 2013

कुछ यू ही ....

कविवर रविंद्रनाथ टैगोर की कविता की पंक्तिया है
"त्राण कर ये प्रार्थना नहीं , मेरी तैरने की शक्ति बनी रहे "।
हमेशा मेरी प्रार्थनाओ की आधार रही है ये पंक्तिया ।उन्ही का स्मरण करते हुए कुछ भाव आये है मन में ।
अपनों पर, अपनों का दंभ,
सहने की शक्ति बनी रहे ।
आहत न हो मेरी वाणी से

 अपने
मेरी वाणी की मर्यादा बनी रहे|








Saturday, March 02, 2013

"गरीबी और मै "

गरीब कहाँ है ?
शायद यहाँ है 
कवि  की कविताओ में ,
नेताओं के भाषण में ,
स्वयम सेवी संस्थाओं के कागजो में ,
सरकारी रिपोर्टों में
या कि
आन्दोलन कर्ताओं की प्रसिद्धि में ,
और ऐसे कितने ही आयामों
में  गरीब बसता है ,
या बसाया जाता है
या कि
जैसे
सत्ता उस सर्वशक्तिमान की
तरह
हमने एक काल्पनिक
खांका बनाया है
पूजने के लिए 
गरीबी  का ?

Wednesday, February 27, 2013

जातक अपने शरीर पर तिल देखकर जाने कैसा होगा भविष्य

जातक अपने शरीर पर तिल देखकर जाने कैसा होगा भविष्य
तिल मात्र सौंदर्य बोधक ही नहीं होते हैं, ये व्यक्ति के भविष्य में घटित होने वाली घटनाओं का संकेत भी देते हैं। शरीर के विभिन्न अंगों पर तिल की स्थिति, उनके रंग और आकृति आदि के अध्ययन से जातक के भविष्य का अनुमान लगाया जा सकता है। पुरुष के शरीर पर दाहिनी ओर तिल होना शुभ एवं लाभकारी माना गया है जबकि महिलाओं के बायीं तरफ वाले तिल शुभ एवं लाभकारी माना जाता हैं। यदि किसी के हृदय पर तिल हो तो वह सौभाग्यवती होती है। किसी भी व्यक्तिके शरीर पर बारह से ज्यादा तिल होना अच्छा नहीं माना जाता। बारह से कम तिलों का होना शुभ फलदायक है।

भले ही व्यक्ति के चेहरे का रंग गोरा अथवा सांवला हो। तिल चेहरे की सुंदरता में चार चांद लगा देते हैं। ऐसी मान्यता भी है कि व्यक्ति के चेहरे पर काले तिल उसे लोगों की बुरी नजर से बचाते हैं। इसलिए आजकल युवतियां अपने चेहरे को सुंदर बनाने के लिए कृतिम तिल भी बनवा लेती हैं। शरीर के विभिन्न अंगों पर पाए जाने वाले तिलों के बारे में हम आपको बताते हैं|

ललाट पर तिल- ललाट के मध्य भाग में तिल निर्मल प्रेम की निशानी है। ललाट के दाहिने तरफ का तिल किसी विषय विशेष में निपुणता, किंतु बायीं तरफ का तिल फिजूलखर्ची का प्रतीक होता है। ललाट या माथे के तिल के संबंध में एक मत यह भी है कि दायीं ओर का तिल धन वृद्धिकारक और बायीं तरफ का तिल घोर निराशापूर्ण जीवन का सूचक होता है।

भौंहों पर तिल - यदि दोनों भौहों पर तिल हो तो जातक अकसर यात्रा करता रहता है। दाहिनी पर तिल सुखमय और बायीं पर तिल दुखमय दांपत्य जीवन का संकेत देता है।

आंख की पुतली पर तिल - दायीं पुतली पर तिल हो तो व्यक्ति के विचार उच्च होते हैं। बायीं पुतली पर तिल वालों के विचार कुत्सित होते हैं। पुतली पर तिल वाले लोग सामान्यत: भावुक होते हैं।

पलकों पर तिल - आंख की पलकों पर तिल हो तो जातक संवेदनशील होता है। दायीं पलक पर तिल वाले बायीं वालों की अपेक्षा अधिक संवेदनशील होते हैं।

आंख पर तिल - दायीं आंख पर तिल स्त्री से मेल होने का एवं बायीं आंख पर तिल स्त्री से अनबन होने का आभास देता है।

कान पर तिल - कान पर तिल व्यक्ति के अल्पायु होने का संकेत देता है।

नाक पर तिल - नाक पर तिल हो तो व्यक्ति प्रतिभासंपन्न और सुखी होता है। महिलाओं की नाक पर तिल उनके सौभाग्यशाली होने का सूचक है।

होंठ पर तिल - होंठ पर तिल वाले व्यक्ति बहुत प्रेमी हृदय होते हैं। यदि तिल होंठ के नीचे हो तो गरीबी छाई रहती है।

मुंह पर तिल - मुखमंडल के आसपास का तिल स्त्री तथा पुरुष दोनों के सुखी संपन्न एवं सज्जन होने के सूचक होते हैं। मुंह पर तिल व्यक्ति को भाग्य का धनी बनाता है। उसका जीवनसाथी सज्जन होता है।

गाल पर तिल - गाल पर लाल तिल शुभ फल देता है। बाएं गाल पर कृष्ण वर्ण तिल व्यक्ति को निर्धन, किंतु दाएं गाल पर धनी बनाता है।

जबड़े पर तिल - जबड़े पर तिल हो तो स्वास्थ्य की अनुकूलता और प्रतिकूलता निरंतर बनी रहती है।

ठोड़ी पर तिल - जिस स्त्री की ठोड़ी पर तिल होता है, उसमें मिलनसारिता की कमी होती है।

कंधों पर तिल - दाएं कंधे पर तिल का होना दृढ़ता तथा बाएं कंधे पर तिल का होना तुनकमिजाजी का सूचक होता है।

दाहिनी भुजा पर तिल - ऐसे तिल वाला जातक प्रतिष्ठित व बुद्धिमान होता है। लोग उसका आदर करते हैं।

बायीं भुजा पर तिल - बायीं भुजा पर तिल हो तो व्यक्ति झगड़ालू होता है। उसका सर्वत्र निरादर होता है। उसकी बुद्धि कुत्सित होती है।

कोहनी पर तिल - कोहनी पर तिल का पाया जाना विद्वता का सूचक है।

हाथों पर तिल - जिसके हाथों पर तिल होते हैं वह चालाक होता है। गुरु क्षेत्र में तिल हो तो सन्मार्गी होता है। दायीं हथेली पर तिल हो तो बलवान और दायीं हथेली के पृष्ठ भाग में हो तो धनवान होता है। बायीं हथेली पर तिल हो तो जातक खर्चीला तथा बायीं हथेली के पृष्ठ भाग पर तिल हो तो कंजूस होता है।

अंगूठे पर तिल - अंगूठे पर तिल हो तो व्यक्ति कार्यकुशल, व्यवहार कुशल तथा न्यायप्रिय होता है।

तर्जनी पर तिल - जिसकी तर्जनी पर तिल हो, वह विद्यावान, गुणवान और धनवान किंतु शत्रुओं से पीड़ित होता है।

मध्यमा पर तिल - मध्यमा पर तिल उत्तम फलदायी होता है। व्यक्ति सुखी होता है। उसका जीवन शांतिपूर्ण होता है।

अनामिका पर तिल - जिसकी अनामिका पर तिल हो तो वह ज्ञानी, यशस्वी, धनी और पराक्रमी होता है।

कनिष्ठा पर तिल - कनिष्ठा पर तिल हो तो वह व्यक्ति संपत्तिवान होता है, किंतु उसका जीवन दुखमय होता है।

गले पर तिल - गले पर तिल वाला जातक आरामतलब होता है। गले पर सामने की ओर तिल हो तो जातक के घर मित्रों का जमावड़ा लगा रहता है। मित्र सच्चे होते हैं। गले के पृष्ठ भाग पर तिल होने पर जातक कर्मठ होता है।

छाती पर तिल - छाती पर दाहिनी ओर तिल का होना शुभ होता है। ऐसी स्त्री पूर्ण अनुरागिनी होती है। पुरुष भाग्यशाली होते हैं। शिथिलता छाई रहती है। छाती पर बायीं ओर तिल रहने से भार्या पक्ष की ओर से असहयोग की संभावना बनी रहती है। छाती के मध्य का तिल सुखी जीवन दर्शाता है। यदि किसी स्त्री के हृदय पर तिल हो तो वह सौभाग्यवती होती है।

कमर पर तिल - यदि किसी व्यक्ति की कमर पर तिल होता है तो उस व्यक्ति की जिंदगी सदा परेशानियों से घिरी रहती है।

पीठ पर तिल - पीठ पर तिल हो तो जातक भौतिकवादी, महत्वाकांक्षी एवं रोमांटिक हो सकता है। वह भ्रमणशील भी हो सकता है। ऐसे लोग धनोपार्जन भी खूब करते हैं और खर्च भी खुलकर करते हैं। वायु तत्व के होने के कारण ये धन संचय नहीं कर पाते।

पेट पर तिल - पेट पर तिल हो तो व्यक्ति चटोरा होता है। ऐसा व्यक्ति भोजन का शौकीन व मिष्ठान्न प्रेमी होता है। उसे दूसरों को खिलाने की इच्छा कम रहती है।

घुटनों पर तिल - दाहिने घुटने पर तिल होने से गृहस्थ जीवन सुखमय और बायें पर होने से दांपत्य जीवन दुखमय होता है।

पैरों पर तिल - पैरों पर तिल हो तो जीवन में भटकाव रहता है। ऐसा व्यक्ति यात्राओं का शौकीन होता है। दाएं पैर पर तिल हो तो यात्राएं सोद्देश्य और बाएं पर हो तो निरुद्देश्य होती हैं।

पुरुषों के शरीर पर तिल का प्रभाव-

जिस पुरुष के सिर (मस्तक) पर तिल होता है, वह हर जगह इज्जत पाता है वहीँ अगर आँख पर तिल होता है तो वह उच्च पद पाता है।
जिस पुरुष के मुख पर तिल होता है बहुत दौलत वाला होता है, वहीँ जिसके गाल पर तिल हो तो उसे स्त्री सुख मिलता है। हाथ के पंजे पर तिल हो तो वह व्यक्ति दिलदार व दयालु रहता है।
छाती की दाहिनी तरफ तिल हो तो अच्छी स्त्री मिलती है वहीँ अगर ऊपर के होंठ पर तिल हो तो धन की प्राप्ति होती है इसके साथ ही चारों तरफ इज्जत मिलती है।नीचे के होंठ पर तिल हो तो वह व्यक्ति कंजूस होता है।
दाहिने कंधे पर तिल हो तो वह व्यक्ति कलाकार होता है। क्षेत्र कोई-सा भी हो सकता। अगर गर्दन पर तिल हो तो उस व्यक्ति की लंबी उम्र होती है|
कान पर तिल हो तो वह खूब पैसे वाला होता है। पाँव पर तिल हो तो उस व्यक्ति के विदेश यात्रा का योग बनता है।

स्त्री के शरीर पर तिल का प्रभाव-

जिस महिला के गाल पर तिल होता है, उसे अच्छा पति मिलता है वहीँ जिस स्त्री के गाल के बाँईं तरफ तिल हो तो ऐशो-आराम का सुख मिलता है
महिला के बाईं तरफ मस्तक पर तिल हो तो वह किसी राजा की रानी बनती है वहीँ अगर मस्तक पर तिल हो तो हर जगह इज्जत मिलती है।
नाक पर तिल हो तो वह महिला रूपवान होती है, पर बहुत ही घमंडी होती है वहीँ कान पर तिल हो तो आभूषण पहनने का सुख मिलता है।
आपको बता दें की आँख पर तिल हो तो पति की बहुत अधिक प्रिय होती है। छाती पर तिल हो तो पुत्र की प्राप्ति होती हैपाँव पर तिल हो तो विदेश यात्रा का योग रहता है
जाँघ पर तिल हो तो नौकर-चाकर का सुख मिलता है।
 
अधिक   विषयों की जानकारी के लिए निम्न लिंक पर जा सकते है । http://hchourey.blogspot.in/
 


आचार्य विजय कुमार [शनि उपासक,प्रचारक]

Friday, February 15, 2013

 बसंत पंचमी की हार्दिक शुभकामनाये ।

बसंत










शीत की बंद कोठरी के द्वार से
अंधेरो को उजाले में लाया है बसंत ।

महकती कलियों के लिए भोरो का ,
प्रेम संदेश लाया है बसंत .

पीले से मुख पर बसंती आभा
बिखेरता हुआ आया है बसंत .

किसानो के लिए फसलो की सोगात
लेकर आया है बसंत .

जीवन को जीवन देने ,
फ़िर से आया है बसंत .

और पढ़ते हुए बच्चो के लिए ,
देवी माँ सरस्वती का वरदान
लेकर आया है बसंत ।

एक कविता 




" भोजन मंत्र "

ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम्।
ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना॥



Wednesday, January 30, 2013

बस कुछ यूँ ही ....



दिन तो बीत  जाते है ,
रातें  रतजगा हो चली है ।
 नैन नीर  बहाते है ,
अपनों का सपना  बन जाने से ।
कब  हुआ ,कैसे हुआ ,क्यों हुआ ?
अब ये कहना  व्यर्थ  लगता है ,
क़ि
"बोया पेड़ बबूल  का आम कहाँ से पाओगे "
हमने तो
 लगाई थी अमराई
तुम्हारी" हरित क्रांति" ने
उसे" नीम का  वन" बना दिया ।
अब वन में वो साधू संत कहाँ ?
जो नीम की औषधि बना देते ,
हमे तो  नीम की छाँव भी तसल्ली देती है
क्या करे ?
वो भी योग के साथ साथ
बाजार में बंद डिब्बों में आ गई  है
इसीलिए तो ,
दिन तो बीत  जाते है
और
रातें  रतजगा हो गई है ।