आप एक शाम के भीतर पूरी ज़िंदगी की हलचल दिखा देते हैं। रात का उतरना और बातों का सुलगना मुझे बहुत सच्चा लगा। सपनों का हवा हो जाना और चादर का छोटी लगना रोज़मर्रा की थकान से जुड़ जाता है।
वेदना तो हूँ पर संवेदना नहीं,
सह तो हूँ पर अनुभूति नहीं,
मौजूद तो हूँ पर एहसास नहीं,
ज़िन्दगी तो हूँ पर जिंदादिल नहीं,
मनुष्य तो हूँ पर मनुष्यता नहीं ,
विचार तो हूँ पर अभिव्यक्ति नहीं|
1 टिप्पणियाँ:
आप एक शाम के भीतर पूरी ज़िंदगी की हलचल दिखा देते हैं। रात का उतरना और बातों का सुलगना मुझे बहुत सच्चा लगा। सपनों का हवा हो जाना और चादर का छोटी लगना रोज़मर्रा की थकान से जुड़ जाता है।
Post a Comment