आपने जो लिखा है, वो सच में दिल छू जाता है। मैं हर बार माँ और बच्चे के रिश्ते पर कुछ पढ़ता हूँ, तो मन अपने-आप नरम हो जाता है। मैं महसूस करता हूँ कि माँ की साँसें सच में बच्चे से ही अपना अर्थ पाती हैं। उम्र कोई भी हो, माँ का दिल हमेशा वही रहता है पूरी तरह अपने बच्चे से जुड़ा हुआ।
वेदना तो हूँ पर संवेदना नहीं,
सह तो हूँ पर अनुभूति नहीं,
मौजूद तो हूँ पर एहसास नहीं,
ज़िन्दगी तो हूँ पर जिंदादिल नहीं,
मनुष्य तो हूँ पर मनुष्यता नहीं ,
विचार तो हूँ पर अभिव्यक्ति नहीं|
1 टिप्पणियाँ:
आपने जो लिखा है, वो सच में दिल छू जाता है। मैं हर बार माँ और बच्चे के रिश्ते पर कुछ पढ़ता हूँ, तो मन अपने-आप नरम हो जाता है। मैं महसूस करता हूँ कि माँ की साँसें सच में बच्चे से ही अपना अर्थ पाती हैं। उम्र कोई भी हो, माँ का दिल हमेशा वही रहता है पूरी तरह अपने बच्चे से जुड़ा हुआ।
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