Saturday, December 12, 2009

शिक्षा की लय

कमरे में टी.वि पर t-20 क्रिकेट का बढ़ता हुआ शोर .घर के बाहर बच्चो का चिल्लाना ,अपनी माँ का आंचल पकड़कर जिद करते हुए रोना और मन में उठते अनेक द्वंदों के बीच बरसो से नियमित करती हुई आरती कि लय का टूट जाना मुझे विचलित कर गया |क्या मुझ्मे इतना भी धैर्य नहीं कि ,या मेरी समस्त पूजा मुझे इतना भी नहीं सिखा सकी कि मै अपने आप को कुछ देर तक शांत रख पाऊ |फिर मेरा मनन शुरू हो गया आखिर किस बात ने मुझे विचलित किया ,टी. वि ने बच्चो के शोर ने ?पर ये तो रोज ही होता है |दिन भर कि दिनचर्या पर नज़र डाली तो सोचने लगी आज फोन पर किस्से बात कि ?किसने अपनी बहू के बारे क्या कहा ?किसने अपने घर के किये कामो को गिनाया ?इसी पर पर मुझे ध्यान आया अभी अभी जो नई काम करने वाली बाई लगी थी पता नहीं ये १०वि थी या ग्यारवी बाई अब तो बाई लगते छूटते ऐसा लगने लगा है कि हममे कितनी कमिया है कि कोई बाई टिकती ही नहीं जैसे आजकल शादिया नहीं टिकती कोई ठोस कारण नहीं होते शादी न टिकने के पर फिर भी नहीं टिकती शादी ,वैसे ही बाई छूटने के कोई ठोस कारण नहीं होते |
हाँ तो नई बाई को दो दिन हुए थे काम करतेहुए इस बार मैंने सोच लिया था उसके दुःख दर्द नहीं पूछूंगी उसके दुःख दर्द कब मेरे हो जाते है और वो मुझे ऐसे ही छोड़कर दूसरो को अपना दुःख सुनाने चली जाति है मेरी जैसी मम्मीजी को ?
पर अपनी आदत से लाचार उसके रहन सहन को देखकर मेरी जिज्ञासा का कटोरा भर चुका था|
पिनअप कि हुई बढ़िया साडी ,ब्यूटी पार्लर से कटाए हुए बाल ,आइब्रो करीने से सवरे हुए जब वो सुबह आती तो एक बार मै उसे देख अपने आप को देखने लगती औए मन ही मन तुलना करने लगती और खीज हो आती अपनी बढती उम्र पर |
आखिर मैंने पूछ ही लिया इसके पहले कहाँ काम करती थी? वहां क्यों छोड़ा ?
कितने ही बार टी।वि पर समाचारों में देखा था कि घरेलू नोकर रखने के के पहले अच्छे तरह से जाँच पड़ताल कर ले पुलिस में भी सूचना दे दे |अब पुलिस में सूचना करना तो अपने बस कि बात नहीं? पर कम से कम बातो से ठोंक बजा तो ले बस इसी के चलते मै अपनी डयूटी पूरी कर रही थी |

मेरे प्रश्नों के उत्तर उसने बड़ी तत्परता से दिए -कहने लगी मैंने अभी तक कही कोई काम नहीं किया है पहला ही काम है |
मैंने पुछा ?तो अब तक कैसे घर चलाती थी |
वो कहने लगी -अभी तक मै साँस ससुर के साथ रहती थी अब उनसे अलग हो गई हूँ ,घर का किराया दो हजार रूपये है १००० आपके यहाँ से मिल जावेगे १००० का एक घर और है |
और बाकि घर का खर्चा कैसा चलेगा ?
वो तो मेरे पति अच्छा कमाते है वो चला लेगे |
तुम तो पढ़ी लिखी लग रही हो /
हा मै बी. ऐ .पढ़ी हूँ |
तो कोई स्कूल में क्यों नहीं पढ़ा लेती ?आजकल तो गली गली में स्कूल है |
उपदेश देने की आदत से मजबूर होकर मैंने पुछा ?
हाँ पढ़ाती थी न ? कुर्सी के नीचे पोछा लगाते हुए वो बोली -पर वहां सुबह ७ बजे से जाना होता है और दोपहर दो बजे वापसी होती थी और सिर्फ ९०० रूपये मिलते थे बच्चे भी दादा दादी के पास रह लेते थे |अब जब अलग हो गई हूँ तो इन्हें कौन संभाले ?
पर तुम अलग क्यों हुई ?मैंने फिर कुरेदा |
मुझसे नहीं होता रोज सुबह शाम साँस ससुर का खाना बनाना , उनके कपड़े धोना उनकी बंदिशे मानना|
जब से अलग हूँ अच्छा है कोई रोक टोक नहीं है अभी तो मुझे आपके सामने वाले घर में भी खाना बनाने को बुला रहे है १५०० का काम है |
इतना कहते कहते उसका पोछा पूरा हो गया, फटाफट हाथ धोये और वो बोली -अच्छा मम्मीजी आज मुझे ५०० रूपये अडवांस दे दो मुझे गैस कि टंकी लेनी है |
मै कुछ बोल भी नहीं पाई बस दिमाग में घूम रहा था १२वि बाई कहाँ धुन्धुगी ?
५०० का नोट निकलकर उसे दे दिया |
तब से ही शायद विचार उमड़ घुमड़ रहे थे .अपने बचपन के सारे गुरु याद आ गये |
और शिक्षा कि लय बिगडती देखकर मेरी आरती गाने कि लय भी टूट चुकी थी ????/,

19 टिप्पणियाँ:

sangeeta said...

शोभना जी,

बहुत सटीक रचना लिखी है.. आपकी इस कहानी पर एक घटना याद आ गयी... मेरे पति सरकारी नौकरी में थे.
वहाँ हमें माली मिला हुआ था .चार घरों में एक माली काम करता था...वो M.A. (English ) कर रहा था. मैंने एक दिन उससे कहा कि तुम स्कूल में teaching job कर लो. तो बोला कि जी वहाँ क्या मिलेगा? यहाँ तो सरकारी माली हूँ .6000/ तनख्वाह है..और बस सुबह आ कर दोपहर तक घर चला जाता हूँ फिर घर में tutions पढाता हूँ...

आपकी
ये
कहानी ज़िन्दगी के सत्य पर आधारित है....बहुत अच्छी लगी....बधाई

Apanatva said...

aapakee kahanee laga har ghar se judee hai. aaj har tabake ka insaan adjustment me kum vishvas rakhata hai aur apana jeevan apanee marjee se hee jeena chahta hai .vo hee jhalak kahanee me milee .
bahut acchee lagee kahanee...... badhai .

मनोज कुमार said...

बहुत ही मर्मस्पर्शी रचना। संवेदनशील।

वाणी गीत said...

सामाजिक वातावरण में इस तरह के उदहारण बिखरे पड़े हैं ....
मुझसे नहीं होता रोज सुबह शाम साँस ससुर का खाना बनाना , उनके कपड़े धोना उनकी बंदिशे मानना|...
मुझे लगता है सारी नैतकिता मध्यमवर्गियों तक ही सिमट कर रह गयी है ...उच्च वर्ग और निम्न वर्ग अपनी आजादी का भरपूर लाभ उठा रहे हैं ...

गौतम राजरिशी said...

हम सब के आस-पास का एक क्रूर सत्य। अपनी दोनों बहनों को ऐसी ही परिस्थितियों से रोज दो-चार होते देखता हूँ।

अजय कुमार said...

प्रथमिकतायें बदल गयी हैं , जीवन की लय बिगड़ रही है

Devendra said...

सीधी सच्ची सरल
अभिव्यक्ति

दिगम्बर नासवा said...

बहुत ही यथार्थ का चित्रण किया है आपने ......... आज जिस तेज़ी से नैतिक मूल्यों का पतन हो रहा है लगता है जल्दी इंसान और जानवर का फ़र्क मिट जाएगा .............

अल्पना वर्मा said...

यह कहानी एक कड़वा सच है .
अध्यापन जैसे नोबेल व्यवसाय में तनखावाह बहुत कम है यह सिर्फ़ भारत में ही नहीं यहाँ भी aisa है.
वास्तव में भारत में शिक्षा प्रणाली में बदलाव की अभी और आवश्यकता है.जिससे से सिर्फ़ degreeyan लेना uddeshy ना हो बल्कि रोज़गार दे सकें ऐसी शिक्षा लेने पर ज़ोर दे aisee शिक्षा की vyvstha होनी चाहीए.

KAVITA RAWAT said...

तब से ही शायद विचार उमड़ घुमड़ रहे थे .अपने बचपन के सारे गुरु याद आ गये |
और शिक्षा कि लय बिगडती देखकर मेरी आरती गाने कि लय भी टूट चुकी थी ????/,
Jamini sachahi ko baya karti aapki kahani bahut achhilagi. Aajkal private schools mein yahi haal hai....

अमिताभ श्रीवास्तव said...

jeevan ka sach utara he..har ghar me dikhta he..bahut sahi mudde ko sahi shbdo aour vicharo se baandh kar likha gayaa he

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

लघुकथा अच्छी लगी. सबकी अपनी-अपनी प्राथमिकताएं हैं.

psingh said...

बहुत बेहतरीन
बहुत -२ आभार

ज्योति सिंह said...

bahut hi aham aur zabardast rachna ,aesa laga padte huye ki haal mil tumahara apne haal se ,mere vichar inse kabhi mel nahi khaye ,aur isi vajah se humari kai baar jhadap ho gayi ,abhi haal me inke bhav aur jo tevar dekhe ki trast aakar apne mitr se boli lagta hai ab in par hi likhna padega ,ye silsala na khatm hone wala hai ,isliye bahut hi umda kah kar rokti hoon ,ghar ghar ka sach .

योगेन्द्र मौदगिल said...

Har shaakh pe ullu baitha hai,
anjamegulistan kya kahiye....

vidambnamay stithi..

रचना दीक्षित said...

सभी परिभाषाएं हर द्रष्टि से खरी उतरती हैं
हर शब्द अपनी दास्ताँ बयां कर रहा है आगे कुछ कहने की गुंजाईश ही कहाँ है बधाई स्वीकारें

Anonymous said...
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Anonymous said...
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sushant kumar agartala said...

aap kee abhivyakti/ kalapana se ucha,sagar se gahra,aap ke lekhi rachan mai chipa such ko jeevan me utar nae ka prayash karuga