Thursday, June 09, 2016

karmth mahila

कर्मठ महिलाओं की श्रंखला में आज  आई है मौसी
वैसे तो ये मेरी दादी लगती है पर माँ के मायके के गांव के पास ही इनका मायका भी है तो बचपन से हम इनको मौसी ही कहते है ,
कितने ही लोगो के जीवन में संघर्ष आये और उन्होंने अपनी जीवन यात्रा पूरी की पर मौसी ने अपने अपने जीवन के ५५  वर्ष बाद अपनी संघर्ष यात्रा शुरू की ,वैसे उसके पहले भी उनका जीवन कोई आसान नहीं था।
गांव में ब्याही फिर पति की नौकरी शहर में कचहरी में लगी तो परिवार के सरे बच्चों की पढ़ाई की जिम्मेदारी उनपर थी अपनी सिमित आय में अपनी कार्य कुशलता और मेहनत से सब कुछ निभाया सब बच्चे पढ़े और अच्छे पदों तक पहुंचे उनकी शादिया न हुई उनके होने दो बेटे दूसरे शहर में और इस इस मकान में  मंझला बेटा बहू ,कुछ दिन ठीक चलता रहा पर मौसी को लगने लगा की साथ निभने वाली नहीं है। तब उन्होंने अपनी गृहस्थी गाँव में बसा ली।
दादा की पेंशन बहुत थोड़ी पर उनका सिद्धांत की बेटो से एक पैसा नहीं लेंगी ,गाँव के उजड़ घर (क्योकि गांव में कुछ साल पहले आग लगी थी)को ठीक किया जो कुछ खेती थी उसमे अपने बल से मेहनत की काम करवाती खुद खेतों में भी जाती। पक्के घर से आकर कच्चे घर और गांव का जीवन एक चुनौती जिसे उन्होंने परिवार के सामने खुद ही रखी और खुद ही उसे पूरा किया। आज ३० साल हो गए गांव में रहते हुए ,गांव के घर को उसी रूप में रखकर मेंटेन किया है। खेतों में खूब फसल पक्ति है। गेहूं ,सब तरह की डाले , कपास उस क्षेत्र में उसे सफेद सोना  कहते है। राय मेथी मिर्ची धनिया मूंगफली टिल सब सारा अनाज मसले साफ करके अपने ३ बेटे एक बेटी को पैक करके भेजती है..
शहर जाने के पगले सरकारी योजना के तहत उन्होंने सिलाई डिप्लोमा लिया था तो घर का साडी सिलाई खुद ही करती ,और उस समय जब परिवार नियोजन करना गांव में आपरेशन करवाना टेडी खीर थी पैर जन्होंे कई महिलाओं को साथ लेकर इस योजना का लाभ लिया।
साथ ही गांव के बच्चों को स्कूल जाने के लिए प्रेरित करना ,उन्हें संस्कार सीखना महिलाओं को पूजा पाठ
सिखाना धार्मिक किताबें पढ़ना ,जबकि वो खुद सिर्फ कैशा  ५ तक पढ़ी थी।
गांव की बहुत सी रूढ़वादी बातो से , हटकर उनका वैज्ञानिक स्वरूप सामने लाना।
आज ८५ साल की अवस्था में भी उनकी दिचर्य में कोई फर्क नहीं
सुबह ५ बजे से लेकर रत ८ बजे तक काम करते रहना। घर में  पलने वाले जानवर गाय बैल की देख भल से लेकर अख़बार पढ़ना साफ सफाई ,खेती वाले घरों में अनेक काम होता है भले ही नौकर करटे हो उनके साथ बराबरी से काम करना।
हम अभी १५ दिन रहे तो हमे भी दोपहर में सोने नहीं देती कहती
हमारे गांव में दोपहर का सोना वर्जित है ,
कुछ फोटो दे रही हूँ ,
गाय का दूध निकलती मखन बनती घी बनती और आँखों के रोग में काम में लती जिसको भी जरुरत हो
इतनी उम्र में कोई चश्मा नहीं ,जितनी देर में मई कुर्सी से उठती वो कई फिट चली जाती।
मितव्ययता ,सादगी ,उनके जीवन का आधार है।
मौसी इसी तरह अपने कई बसंत देखे और हम उनका कुछ अंश सीखे।
उन्हें सादर प्रणाम।









Sunday, May 08, 2016

kramth mhilaye

बहुत तदिनों से मन में इच्छा थी की हमारे आसपास की उन कर्मठ और संघर्ष रत महिलाओं की च्रर्चा हो जिनका कभी कोई मिडिया ,या कही और चर्चा न हुआ हो हमारे आसपास की चाहे वो अपने ही परिवार की नानी ,दादी ,या पड़ोस की नानी , दादी ,बुआ ,मौसी ,चाची,, ताई ,मामी ,अपनी सास ननद हो ?जिन्होंने आम िंदगी से हटकर संघर्ष किया हो जीवन के लिए उन्हें हम सामने  लाये।
उसी श्रंखला में आज की एक कड़ी है
कर्मठ महिला
गुलाब माँ
मातृत्व दिवस के अवसर पर उन्हें नमन


आज वो जिन्दा होती तो करीब 120 साल की होती
13 बच्चों की माँ बनाकर छोड़ गया और न जाने कहाँ चला गया था उसका पति ?गाव में बीमारी फैली कुछ बच्चे उसी चपेट में आये कुछ ने पहले ही जन्म के कुछ घण्टो कुछ दिनों के बाद आखिरी साँस ले ली थी।
कुल 3 बचे थे दो बेटी और एक बेटा बड़ी बेटी की शादी कर दी बेटा कुछ पढ़कर रेलवे में नोकरी पा गया ,छोटी बेटी 12 साल की को लेकर शहर आ गई ।
13 वर्ष लगते उसकी भी शादी कर दी
गुजारे के लिए शहर के प्रतिष्ठित वकील के घर खाना बनाने का काम करने लगी और उन्होंने अपने बड़े से मकान में एक कमरा
दे दिया रहने को।
छोटी बेटी उसी शहर में ब्याही थी 6 महीने बीतते ही उसके पति की मृत्यु हो गई बाद में पता चला पहले से उसको कोई गंभीर बीमारी थी जिसका पता सबको था ।खूबसूरत विधवा बहू को अपने घर में कैसे रखे ?माँ के पास भेज दी गई ,जहाँ रहती वहां विधवा बेटी के साथ रहना असहय था
तब मेरे दादाजी जो कभी कभी गाँव से आते कचहरी के काम से उन्हें सजातीय लीगों से पता चला की अपने समाज में एक महिला की ऐसी स्थिति है तब हमारे बाड़े में उनको रहने को कमर दिया ।साथ ही विधवा बेटी की पढाई भी जरी रखी उन्हें टीचर ट्रेनिग करवाई उस जमाने में 7वि
कक्षा के बाद ही टेनिंग होती थी और फिर वो सरकारी स्कूल में शिक्षिका बन गई जब तक उनकी माँ उन वकील साहब के घर खाना बनाने का काम करती रही ।
आज वो बहनजी भी होती तो 84 साल के लगभग उनकी उम्र होती अपना कार्यकाल ईमानदारी से पूरा करके राष्ट्रपति द्वारा प्रदत्त श्रेष्ठ शिक्षिका का अवार्ड भी पाया ।
बाल विधवा बेटी के साथ और अगर बेटी बहुत ही सुंदर हो तो दोनों माँ बेटी का जीवन कितना कष्टमय रहा है वो मैंने देखा है।
उस समय तो मेरी उम्र बहुत कुछ नही समझ पति थी ,आज जब सोचती हूँ चलचित्र की भांति उनका जीवन मेरी आँखों के सामने आ जाता है।
कई सालो बाद "गुलाब माँ ;"हाँ यही नाम था उनका,
उनके पति को भी याद आई और पता ठिकाना ढूंढते ढूंढते आ गए अधकार जताने पर स्वाभिमानी गुलाब माँ ने उनको घर में न घुसने दिया और मोहल्ले के लोगो ने भी उनका साथ दिया।जब भी वो आते झगड़ा करते ,मुझे धुंधला सी याद है धोती कुरता और सर पर काली टोपी रहती।जिस दिन वो आते गुलाब माँ के घर अशांति पसर जाती माँ बेटी के बीच भी लड़ाई होती ।
पर गुलाब माँ उन्हें एक पैसा नही देती जिसके लिए वो आते ।
गुलाब माँ अपने उसूलो की पक्की थी ।पथरीले जीवन पर चलते चलते वो भी सख्त हो गई थी।
उनकी कला बेमिसाल थी ।जितने भी अख़बार के कागज के टुकड़े होते उन्हें उन्हें एकत्र करती उनकी लुगदी बनाती ।उस लुगदी से टोकनिया,
गुड़िया बनाती ।और जितना भी बाड़े में में वेस्ट मटेरियल मिलता ,हलवाई के घर से आये जलेबी सेव के कागज की पुड़िया के कागज ,तो लुगदी में डाल देती और उनमें बंधा हुआ धागा लपेट कर रख लेती ।उस धागे से गोदड़ी सिलती, गुड़िया के कपड़े सिलती ,अपना लहंगा (घाघरा ही पहनती)सिलती
अपना ब्लाउज(पोल्का)जिसमे पीच्छे सिर्फ डोरियाँ होती वो खुद ही बनाती और सूती ओढ़नी
पहनती। उनकी बनाई करीब 50 साल पुराणी ये गुड़िया आज भी मेरे पास है इसमें जो भी सामान उपयोग हुआ
उसमे एक पैसा भी भी नहीं लगा है।
अपनी खटिया खुद ही रस्सी से बुनती। अपने छोटे से घर जिसमे वो करीब ४५ साल रही कंचन बनकर रखा अपनी मेहनत से। उनका बनाया खाना सिमित साधनों वाला आज भी भुलाया नहीं जाता।
और भी बहुत सी बाटे है जो समय समय पर याद आती रहती है.
आज जब हम सर्वसाधनो से युक्त घरों में रहते है छोटी छोटी बातो में असन्तोषी हो जाते है तब गुलाब माँ बहुत याद आती है और जीवन को संबल मिलता है।

Monday, December 28, 2015

NARI TERE KITNE ROOP

नारी तेरे कितने रूप
अभी पिछले हफ्ते गांव जाना हुआ मेरे मायके का गांव
वो गलिया जो अक्सर मन में रहा करती थी उनसे फिर मुलाकात करना बड़ा सुखद रहा। मौसम बदलते है फिर इतने सालो में तो बहुत कुछ बदल गया विकास के बढ़ते चरण स्पष्ट देखे जा सकते है।
हर घे में एक मोटर सायकल अनिवार्य सी हो हो गई हो भी क्यों न ?काम आसान हो जो गए है पेट्रोल मंहगा हो गया है ऐसा कहि लगता नही ?मोबाईल पर खर्च करना फिजूल खर्ची बिलकुल भी नही माना  जाता जैसे हम मानते है। सबकी अपनी जरूरते है।
और भी बहुत चीजे है जिनके बारे में जानकर देखकर कुछ सुखद और कुछ दुखद आश्चर्य होता है।
इन्ही के बीच एक दादी अपने ७ वर्षीय पोते के साथ हमारे घर में किरायेदार के रूप में रहती है खेतो में मजदूरी करके बच्चे को अंग्रेजी माध्यम स्कुल में पढ़ा रही है बच्चे के पिता घर का किराया दे देते है और स्कुल की फ़ीस दे देते है और अपनी पत्नी और बच्चे के साथ शहर में रहता है पत्नी जिसने अपने सौतेले बेटे को रखना इसलिए नामंजूर किया की जब उसकी अपनी माँ उसे छोड़कर दूसरे के साथ भाग गई तो मैं  क्यों राखु ?
इसको ?
दादी से बच्चे का अपमान ,उसकी अवहेलना देखा नही गया और वह अपने कुछ रिश्तेदारो की मदद से इस गांव में लड़ प्यार से बच्चे को पाल रही है। जिस उम्र में उसे सहारे  की जरुरत है वो सहारा बन रही है।

Wednesday, December 16, 2015

mn ki bat

अतीत कितना खूबसूरत होता है ये हर लेखक या हर व्यक्ति महसूस करता है और अपनी अभिव्यक्ति अभिव्यक्त करता है अपने अपने माध्यम से ऐसा ही एक दौर ब्लॉग का हुआ करता था जब हम समाज ,घर ,आँगन अपने आसपास हुए रोजमर्रा के भावो  व्यक्त किया करते थे। साथ ही यात्रा  संस्मरण ,पारिवारिक संस्मरणों का आनंद लिया   करते थे। आज फेसबुजैसे माध्यम ने हमे सिर्फ राजनितिक हलचल तक सिमित कर मनभेद की ओर अग्रसर कर दिया है, और ब्लॉग लेखन अतीत हो गया है।

Wednesday, October 07, 2015

mn ki bat

 मन की बात
करीब एक साल से ब्लॉग पर कोई पोस्ट नही डाली कुछ पारिवारिक व्यस्तता और कुछ फेसबुक का चलन
आज ब्लॉग का समय याद आया तो महसूस हुआ की और कुछ न कर पाये चलो फिर से शुरुआत की जय
तो एक छोटी सी शुरुआत ही सही ....... 

बहुत सालो पहले जब हम पत्र पत्रिकाये पढ़ते थे बहुत सरे गुड मैनर्स के लेख लिखे जाते थे ज़ैसे किसी के घर जाना है तो कैसा व्यवहार करना चाहिए ,किसी के घर मेहमान बनकर गए है तो अपने साथ क्या क्या सामान लेना चाहिए ताकि मेजबान को तकलीफ न हो आदि आदि ऽअज समय बदल गया है लोगो के घर आन अ जाना बहुत कम हो गया है किसी काम से गांव से शहर भी आते है भी आते है तो लोग आवागमन के साधन के चलते कोई भी रिश्तेदार के घर रुकना पसंद नही करते .मोबाईल से बात कर लेते है  सारी दुनिया मुठी में आ गई याने की मोबाईल में सारी इन्फर्मेशन उससे लेकर अपना काम कर लेते है ,
और इस वजह से मोबाईल अति व्यस्त रहते है पर क्या मोबाईल के भी कुछ मैनर्स होते है की सामने परिवार के लोग बैठे हो बातें  कर रहे हो आप है की वाट्सअप और फेसबुक के चुटकुलो को पढ़कर हंस रहे है क्या आको लगता है की कुछ तो मैनर्स होने चाहिए ?

Thursday, September 18, 2014

बस कुछ यूँ ही ----

यादो के साथ पीछे जाना सुखद है ,
और वो सुख प्रत्यक्ष में दंश है।


एक अदद आश्रय पाकर निराश्रय हो  गए हम,
तुम्हारे घर में बेगाने हो गए अपनापन ढूंढते ढूंढते।

आये थे ख़ुशियो के भागीदार बनने ,
खारे  पानी के साथी बनकर रह गए हम ।




Monday, September 01, 2014

निमाड़ का वरत वर्तुळा

आज संतान सातो है  याने शीतला सप्तमी . आज के दिन निमाड़ मालवा में व्रत  वर्तुले  का समापन दिवस है यानि की हरितालिका तीज से से लेकर आज सैलई सात्तो तक निमाड़ी गृहिणी यो का कढिन उपवासों के साथ अपने परिवारों के लिए मंगल कामना करने का व्रत आज पूरा होता है. शीतला माता की पूजा करके ठंडा खाना बनाने से लेकर खाने से  खिलने तक का। हरतालिका तीज  का निर्जला व्रत ,उसी वर्त में में पुरे घर परिवार के लिए खाना बनाना और नियमितता के घर के काम पुरे करना फिर पूजा रात्रि जागरण कर सुबह से गणेशजी के आगमन की तैयारी में लग जाना ,लड्डू बनाना आज तो  लड्डू बना आसान हो गया है पहले तो खलब्बते में कूट कर चूरमे के लड्डू बनाकर गणेशजी को घर लाया जाता था ,उसके बाद ऋषि पंचमी में खेत में जहाँ हल चला हो वहां का कुछ भी नहीं खाना मतलब शककर भी नहीं तालाब में होने  वाला सिंगाड़े के आटे से बनी कोई चीज खाना इस बीच घर परिवार के सारे  काम निबटाना। फिर आई हल षष्ठी( हलछट )याने आज भी खेत का हला हुआ कुछ नहीं खाना पंसार के चांवल खाना पूजापाठ  करना कहानी सुन्ना सुहागन महिला को भोजन कराना।
फिर शाम को अगले दिन शीतला सप्तमी के लिए खाना बनाना जिसमे मीठे परांठे ,नमकीन पराठे , सादी दो पूड की रोटी सुखी सब्जी बनाना। आज तो हम सब अपनी सुविधा और  साधन के चलते पुरियां बना  लेते है।
मुझे आज भी याद है   जब माँ चूल्हे पर घंटो पराठे सकती रहती थी। और हम सब गणेशोत्सव के कार्यक्रम देखककर लौटते तो माँ चूल्हा लीप रही होती थी क्योकि जिस चूल्हे पर शीतला सप्तमी का नैवेद्य बना होता उस दिन वह चूल्हा नहीं जलाया जाता था।
इस व्रत वर्तुले में सभी बहनो को बधाई और अपनी माँ, दादी ,छोटी दादी , ताईयाँ ,काकियाँ , भाभियाँ , बुआओ
सासुमा ,जेठाणी देवरानी सभी को नमन करती हूँ जो अपनी परम्पराओ के साथ रहकर इन व्रतो को सार्थक बनाती है और हमारे जीवन को ऊर्जा से भर्ती है  उतस्वों में प्राण डालती है।
इस  अवसर पर माँ तुम बहुत   बहुत याद आती हो।

Wednesday, August 27, 2014

मेरी पहली हरितालिका

कथा यहाँ पर है
http://www.chhathpuja.co/community/viewdiscussion/2381-hartalika-teej-vrat-katha-in-hindi,-%E0%A4%B9%E0%A4%B0%E0%A4%A4%E0%A4%BE%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BE-%E0%A4%A4%E0%A5%80%E0%A4%9C-%E0%A4%B5%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%A4-%E0%A4%95%E0%A4%A5%E0%A4%BE?groupid=12


कल हरितालिका तीज है जो मुख्यतः  उत्तर भारत में मनाई जाती है महाराष्ट्र और गुजरात में भी मनाई जाती है गुजरात में इसे" केवड़ा तीज" कहते है .बालू रेत से भगवान शंकर का लिंग बनाकर माँ पार्वती के साथ पूजा की जाती है कुवारी लड़कियो को अच्छे वर  मिले और सौभग्यवती स्त्रियों का सौभाग्य अखंड रहे इस मनोकामना से इस व्रत को निर्जल  रहकर किया जाता है अब भले ही इसका स्वरूप बदल गया हो और किसकी कितनी आस्था है वो विषय अलग है।
मुझे तो तो अपनी पहली हरितालिका याद आ रही है जिसे मैंने (मैंने क्या मुझे दिलवाई गई थी )आज से ५४ साल पहले शुरू की थी मात्र ६ साल की पूरी हुई थी और सातवा  साल आरम्भ हुआ ही था। गांव की अन्य महिलाओ और अपने से थोड़ी बड़ी बुआओं को देखकर बहुत शौक आया था और विधिवत दिलवाई गई हरितालिका तीज घर भर में बहुत लाड़ प्यार पहला व्रत  जो था, हम भी  बहुत बहुत उत्साही पानी भी नहीं पीना तो पुरे घर की सहानुभूति  मिल रही थी दिन भर ,शाम को पूजा के लिए सब तैयार घर में ही  रेत  के शिवलिंग बनाये गए ब्राम्हण का घर था ही छोटे दादाजी   पंडितजी थे ही सब महिलाये अपने अपने शालू पैठणी (शादी की बनारसी साड़ी ) पहनकर पूजा के थाल  लेकर आने लगी माँ की पैठणी मुझे भी पहना दी गई थी इतना याद है पूजा शुरू हुई मेरी आँखों के सामने अँधेरा सा छाने लगा था सब की पूजा हुई आरती कैसे हुई न मालूम, मैं  सीधी पहुंच गई पनिहारे (  जहाँ मटकाआदि रखे जाते है )के पास और एक गिलास पानी पिया पैठणी अधि खुल चुकी थी दादी ढूंढते ढूढ़ते आई तब तक बेहोश कहे या नींद जो लगी तो दूसरे दिन सुबह ही जाग  हुई सब लोग कहने लगे  रबड़ी   बनी   थी तुझे कितना    जगाया तू तो उठी ही नहीं तेरे  हिस्से की ही हम सबने मिलकर खा ली।  जिस रबड़ी के लिए व्रत किया वो भी गई दूसरे दिन गणपति के लड्डू ज्यादा  मिले  रबड़ी की  ऐवज में  से अनवरत यह व्रत   चल रहा है कई जगह रहे  पूजा व्रत   स्थान के अनुसार चलते रहे है अब यहां बेंगलोर में गौरी पूजा    होती  है यहाँ उपवास व्रत का कोई फंडा नहीं है।







Thursday, July 31, 2014

हम सब उसकी संतान है

कितने लोग ईश्वर के अस्तित्व को मानते है ,नहीं मानते सबके अपने अपने तर्क है अपनी आस्था है अपना विश्वास है यह बहस युगो से चली आ रही है और चलती रहेगी । दिन रात समाचारो में अपराध ,बलात्कार हत्याए समाचार देख सुन अच्छा क्या होता है ?मानो घटता ही नही है  बहुत मेहनत     करके भी अपना परिवार का गुजर मुश्किल से कर प् रहे है इसमें कितनी ही महिलाये अपने परिवार के लिए अथक मेहनत करती है सुबह शाम तक ऐसी ही चिकर घिन्नी की तरह घूमती  एक महिला है जो एक ब्यूटी पार्लर में काम करती है जहा वह सुबह ११ बजे से ७ बजे तक जाती है और उसके पहले सुबह तीन घरो में खाना बनाती है और छुट्टी के दिन मालिश का काम करती है और अपने दो बच्चो को अच्छे ?स्कूल  में पढ़ाती है ,उसका पति ड्राइवर है महीने में तीन या चार बार ड्राइवरी करता है और हफ्ते भर शराब पिता है और जब कम पड़  जाते है पत्नी के आगे हाथ फैला  देता है | दोनों ने १२ साल पहले प्रेम विवाह किया था | धर्म परिवर्तन करके सेवा कार्य करने अग्रणी संस्थाओ के ईश्वर को वह नहीं मानता और रात को दाल चावल आटा  नमक सब मिलकर रख देता है सुबह अपनी पत्नी को कहता है बुलाओ तुम्हारे ईश्वर को और उससे कहो -ये सब चीजे अलग करे |

कितने अलग अलग तरह के दुखो से गुजरती होगी यह महिला उसकी इस  तकलीफ को देखकर निशब्द हो जाते है हम जब वो कभी घर आती है मैंने पिछले सात साल में कभी उसको मुस्कुराते हुए नहीं देखा |


Thursday, July 03, 2014

"नाम में क्या रखा है ?"

आज से ४० से ५० साल पहले तक अधिकांश घरो में सात ,आठ ,नौ भाई बहन होना आम बात थी इससे ज्यादा भी हो सकते है और साथ साथ ही गुड्डू ,बड़ा गुड्डू ,छोटा गुड्डू , पप्पू ,मुन्नू ,नन्नू ,बाबा ,बबली ,गुड़िया जैसे ही घर के नाम रखे जाते थे. वो तो भला हो राजकपूर जी का जिनपर फिल्माए गए गीत "मेरा नाम राजू घराना अनाम बहती है गंगा जहाँ मेरा धाम "से घर घर राजू हो गए राजू चाचा ,राजू मामा आज तक चल रहे है। हमारे एक रिश्तेदार थे घर में बुलाये गए  नाम से बच्चो को ज्यादा जानते थे एक बार अपने ही एक बच्चे के एडमिशन के लिए स्कूल गए जब वह बच्चे का नाम लिखने की जगह ,तो नाम ही नहीं मालूम उस समय ५ साल के बच्चे को भी अपना असली नाम नहीं !मालूम उसने पप्पू बता दिया .| पिता श्री ने भी तुरंत नया नामकरण कर दिलीप रख दिया क्योकि उस समय बहुत फेमस थे  हीरो दिलीप कुमार। घर जाकर जन्म पत्री देखि तो उसमे अशोक नाम था । लड़कियों को ज्यादा स्कूल भेजने का प्रचलन नहीं था सो जो नाम घर में वही बाहर भी|  ऐसी एक परिवार में सात बहने थी उनका नाम था ,काजू ,किसमिस ,केसर, बादामी ,इमरती ,जलेबी और बर्फी | बहुए आती तो अगर दूसरे शहर या गांव की होती तो उनका परिचय उनका गांव या शहर ही रहता या मुन्ना की बहु आदि आदि और अगर उसी शहर  की होती तो उनके मोह्हले से उन्हें पुकारा जाता।
ये तो आज बच्चो के के हिसाब से काफी पुरानी बात लगती है. हम आज के १५ साल पहले जिस टाउनशिप में रहते थे वहाँ महिलाओ को भाभीजी ,या मिसेस वर्मा या शर्मा जो भी सरनेम हो उससे ही पुकारा जाता था क्योकि फैक्ट्री की टाउनशिप में फैक्ट्री में काम करने वालो का ही परिवार रहता था और काम करने वाले पुरुष ही थे इसलिए उनके नाम से ही जाना जाता था। आज जब" फेसबुक "जैसा माध्यम हो गया है अपने पुराने साथियो से मिलने का, तो कभी कभी बड़ी कोफ़्त होती है की हमने कुछ बहनो के आलावा और बहनो के नाम क्यों नहीं जाने ?कम से कम नाम मालूम  होते तो उन्हें ढूंढा तो जा सकता है। इसलिए" नाम में क्या रखा है "
इसे हल्के में न लेकर उसके महत्व को पहचानना जरुरी है।