Friday, September 19, 2008

कुछ क्षनिकाए


"आकाश और जमीन"

आकाश की उचाईयो छूने के बाद
सारा जहा मेरा अपना हो गया है
और जमीन से जुड़े रहने की चाह में
मुझसे मेरे अपने जुदा हो गये है

"नीड"
पराये आशियाने में अपना नीड कहा
पराये दर्दो में अपनी पीर कहा
अब तक तो जिए बेखोफ जिन्दगी ,
अब मरने को दो गज जमीन कहा

2 टिप्पणियाँ:

अखिलेश सोनी said...

aapne jinhe kshanikayen kaha hai wastav mein unmen se pahli to kavita hai aur doora muktak hai. waise likha aapne bahut hi accha hai ye batane ke peeche maqsad hai ki aap aur accha likhen. meri baat ka bura mat maniyega.

makrand said...

अब तक तो जिए बेखोफ जिन्दगी ,
अब मरने को दो गज जमीन कहा

good lines
regards