Sunday, January 11, 2009

भारत बनाम अमेरिका

मै कभी अमेरिका नही गई, न ही मुझे अंग्रेजी आती है ,लेकिन अमेरिका के बारे में अपने रिश्तेदारों ,पडोसियों और अखबारों के माध्यम और हाँ फिल्मो में अमरीकी स्थलों की शूटिंग देखकर वहा की काफी जानकारी रखती हुँ ।
अमेरिका में इतनी सफाई है की वहा महीनों कपडे न धोओं तब भी मालूमही नही पड़ता की ये कपड़े बिना बिना धुले
है .यह कोई पैदल ही नही चलता अगर एक हरी मिर्ची भी लाना हो तो कार से जाना पड़ता है ,जबकि हमारे इंडिया
(भारत )में घर के सामने बिना पैदल चले ही ठेले पर ५रुप्ये में महीने भर की हरी मिर्च मिल जाती है .अमरीकी सड़के, अमरीकी अमरीकी शिष्टता (थेंक्यु ,सारी )अमरीकी लोग ,अमरीकी इंडियन लोग वहा की बड़ाई करते नही थकते, अपने देश में गली गली पान की पीक थूकते लोग अचानक वंहा कैसे सभ्य हो जाते हैबहुत सोचने पर भी मै कभी जान नही पाई .मेरे रिश्तेदार जब भी कभी अमेरिका से आते सभी तरह की चर्चाये होती ,मै उन्हें भारत की की समस्याए बतातीयंहा की सरकार की भर्ष्टाचार ki खबर देती तो वे लोग ओके ओके कहकर सर हिलाकर मेरी बात सुनते तब मुझे लगने लगता वे मेरी बात बात कितने ध्यान से सुनकर उनपर व्यथित होते मै आशावादी हो जाती की शायद भारत की समस्याए सुनकर यंहा की समस्यों का हल चुटकी में निकाल लेगे ,क्योकि उनके रहन सहन में समर्धि की झलक होती और मेरी ये धारणा है की प्रत्येकसमर्ध व्यक्ति हमेशा दुसरो की मदद करता है और फ़िर इन्हे तो अपने देश का अपनों का कितना दर्द है जो हर साल इंडिया में आकर अपने पुराने कपड़े जूते जर्किन और अन्य सामान अपने रिश्तेदारों में शान से बाँट जाते ।
अचानक मै उनसे पूछ बैठी ,अमेरिका में नेता लोग ,अभिनेता लोग सरकारी अधिकारी कितने इमानदार होते है न?कभी भी मने नही सुना की वहा कोई इस तरह की चोरी करता है नही व् ह कभी छापे पड़ते है ,न ही पोलिस अधिकारी कोई भ्रष्टाचार करते है कितना अच्छा है न,हमारे भारत में उनसे ये सब चीजे क्यो नही सीखते ?
तब मेरे भाई ने तपाक से उत्तर दिया दीदी वंहा पर कोई ऐसी छोटी मोटी चोरियों धोखाधादियो में विश्वास नही करता वहा तो बडे पैमाने पर हेरा फेरी स्केंडल होते है ,तब मै हतप्रभ थी और मेरी मोटी बुधि में भी ये बात समझ नही

आई .और बात आई गई हो गई ,आज जब टी वि पर पेपर में खबरों में 'सत्यम 'ghotala पढा सुना तो मुझे विश्वास हो गया की हम इंडियन (भारतीय नही)बिल्कुल अमेरिकी नक्शे कदम पर चल कर दुसरो को गरीब बनाकर ख़ुद अमीरी की हवस से ओतप्रोत होकर पूंजीवाद को बढावा देकर समाजवाद को बौना बनाने में माहिर होते जा रहे है ।
पवित्रता हम भारतीयों के आचरण में हुआ करती थी आज वो लापता होती जा रही है |

1 टिप्पणियाँ:

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