Monday, May 03, 2010

रिटायर मेंट और स्वामीजी का नजरिया ..........









`ट्रेन से जैसे ही उतरते है सामान लेकर| तुरंत कुली आता है .
कितना लोगे ?चार डाक (नग )का ?कुली अपने सर पर रखने वाला वाला कपडा अपने ही हाथो से गोल गोल घुमाता है और सामान उठाने का उपक्रम करता है और कहता है १०० रूपये ?
अरे !अरे! चार नग के इतने रूपये ?सब तो हलके है |मै सिर्फ खड़ी हूँ और देखती हूँ की मुझे कैसे इसमें से अपना सामान उठाना है क्योकि मुझे मालूम है मेरे पति देव कभी भी इतने रूपये तो कुली को देगे नहीं ?१० मिनट तक बहस होगी ,और फिर भी बात नहीं बने गी |जब मोल तोल कर ५० रपये पर कुली राजी हुआ तो पति देव बोले ४० रूपये ले लो मै रिटायर्ड आदमी हूँ |
तो यात्रा क्यों करते हो ?टका सा जवाब देकर वो कुली चलता बना |
जब आजू बाजू देखा तो प्लेटफार्म लगभग खली हो चुका रहता है और कोई कुली भी नहीं दिखाई दे रहा है काफी सारे लोग कुली के सर पर या जिनका ज्यादा सामान है वो गाड़ी में लदवाकर शान से चले जा रहे है |हम दोनों भी याने की मेरे पति और मै मूक निगाहों एक दुसरे की भाषा समझ कर सामान उठाकर चलने लगते है और पुल से नीचे आने पर देखते है कुली हमे देखकर मुस्कुरा रहा होता है |
अब सामने रिक्शा वाला खड़ा है
बाबूजी कहाँ चलना है ?
पतिदेव उसकी तरफ देखते नहीं!? उन्हें लगता है ये ज्यादा पैसा मांगते है एकदम बाहर निकलकर आते है रेलवे स्टेशन के और सडक पर आने जाने वाले रिक्शा को हाथ दिखाते है, उससे वही बहस मै रिटायर्ड आदमी हूँ इतने पैसे कहाँ से दूंगा |रिक्क्षा वाले की मुस्कराहट मेरे सब्र के बांध तोड़ देती है मै इन पर खीज जाती हूँ \और कहने लगती हूँ क्या घर तक भी पैदल चलना होगा ?घर पांच किलोमीटर दूर है तब ये रिक्क्षा में बैठते है |घर आने तक हमारा मौन वाक युद्ध चलता है हमारे रिटायर मेंट से कुली और रिक्श्वाले को क्या लेना देना |उन्हें भी तो अपनी रोजी रोटी कमाना है? मन ही मन बुदबुदाती |रिटायर्ड नहीं हुए थे तो जितने पैसे वो मांगते थे तो दे देते थे क्या ?
सब के सब लूटने बैठे है |क्या हमारे पास फोकट में पैसा आता है ? इन्ही विचारो के साथ मौन बहस के साथ घर आजाते |
इन्ही सब के गुजरते हमे भी हरिद्वार कुम्भ स्नान की लालसा हुई हमारे कुछ मित्रो के परिवार साथ हम लोगो का कार्यक्रम तय हुआ |
सभी परिवार मुंबई से थे हमारे पुराने साथी |कुल ९ लोग थे |बड़ी मुश्किल से एक निर्माण धीन धर्मशाला में रूकने की जगह मिली |जब हरिद्वार रेलवे स्टेशन पर उतरे तो पूरा प्लेटफार्म लोगो से पटा पड़ा था बड़ी कठिनाइयों से अपने अपने ट्राली बेग खीचकर बाहर आये तो पता चला स्टेशन से दो या तीन किलोमीटर तक कोई वाहन नहीं मिलेगा \अब हमारे पतिदेव को न तो कुली से और नहीं रिक्क्षावाला को ये कहना पड़ेगा की भाई मै रिटायर हो गया हूँ अपने आप ही पैसे बच गये |हमारी धर्मशाला बहुत दूर थी कोई भी वाहन वहां जाने को तैयार नहीं था पिछले १० दिनों से और दर्शनीय स्थल देखते देखते वैसे ही हम सब लोग थक गये थे और अमावस्या के स्न्नान के दूसरे दिन भीड़ के रेले के रेले चले जा रहे थे कोई स्नान करके लौट रहा था तो कोई स्नान करने जा रहा रहा था |हर की पोड़ी
ऋषिकेश


हमें
तो कोई दिशा का ज्ञान ही नहीं हो पा रहा था हमारे कुम्भ आने का उत्साह फीका पड़ता जा रहा था जिस भी टेक्सी वाले को पूछो कोई जाने को तैयार नहीं पुलिस से जानकारी मांगी तो कहते थोडा और आगे
चलो वहां से टेक्सी मिल जावेगी |,अभी तक सिर्फ टी.वि पर कुम्भ मेला देखा था प्रत्यक्ष मेला देखने का सुयोग पहली बार ही मिला था |लोग अपना सामान कोई हाथ में कोई सर पर रखकर चलते जा रहे थे |और उन सबके बीच हम सब लोग अपनी अपनी ट्रालिया बेग पर्स घसीटते हुए मेले का तमाशा बने जा रहे थे |बड़ी मुश्किल से एक बड़ा रिक्क्षा मिला उसने कहा -अगर
वाहनों को जाने देना शुरू किया होगा तो ले चलूँगा वर्ना वही छोड़ दूंगा हम सब तो कही तक भी जाने को तैयार थे |भाव भी नहीं पुछा उसने ५०० रूपये मांगे सम सब मय सामान के बैठ गये उसमे कैरियर भी नहीं था सारा सामान गोद में में लेकर हवा आने को भी जगह नहीं थी बस तसल्ली थी की अपने गंतव्य पर जा रहे थे और संयोग से वाहन प्रतिबन्ध हट गया था तो सीधे धर्मशाला पहुँच गये|
सामान से लदे फदे ....





धर्मशाला पहुंचने पर हमारा बहुत अच्छी तरह से स्वागत हुआ कोई आश्रम के भक्तो के लिए भक्तो के सहयोग से ही धर्मशाला बन रही थी |महा कुम्भ के चलते भक्तो के लिए अस्थायी व्यवस्था कर दी थी |हमें अपने एक परिचित भक्त के सहयोग से यहाँ आश्रय मिला था |उस दिन तो दिन भर आराम किया शाम को पास ही गंगा घाट था वहां गये गंगाजी के दर्शन करते ही सारी थकावट दूर हो गई |लोटते में फिर पैदल ही चलना था रास्ते भर आश्रमों के पोस्टर राम कथा ,भगवत कथा सत्संग अलग अलग सम्प्रदायों के बड़े बड़े पोस्टर |मन में एका एक ख्याल आया जिस तरह मुंबई में सिने स्टार की भरमार है जगह जगह उनके द्वारा अभिनीत फिल्मो के पोस्टर है कुछ इसी तरह यहाँ अनेक साधू संतो के बड़े बड़े सेट्स पंडाल और पोस्टर लगे है |
अलग ही अनुभूति हो रही थी |
दूसरे दिन आश्रम के बड़े स्वामीजी वहां आये थे हम सभी लोगो ने उनके दर्शन करने का निश्चय किया उनके शिष्यों ने व्यवस्था की स्वामीजी हमारा इंतजार ही कर रहे थे |सुन्दर वातानुकूलित कमरा ,चाँदी का स्वामीजी का सिहांसन ,सामने बड़े बड़े सोफे, नीचे सफेद चादरे बिछी हुई थी |ऐसा लग रहा था मानो कोई सीरियल का सेट था |हम सभी लोग नमस्कार कर बैठ गये हमसे पहले एक भक्त परिवार आया दर्शन किये प्रणाम किया और साथ ही मोटा सा लिफाफा भेंट किया \हम सब एक दूसरेका मुंह देखने लगे क्योकि हम सब तो खाली हाथ ही दर्शन करने आ गये थे |
इस बीच स्वामीजी लगातार मोबाईल पर बात कर रहे थे |
कुछ इस तरह कह रहे थे -मुझे पूरी खबर दो कल की भगदड़ में क्या हुआ ?
फिर हमारे तरफ मुखातिब हो कहने लगे -अच्छा आप लोग मुंबई से आये है ?
कोई तकलीफ तो नहीं ?
नहीं नहीं कोई तकलीफ नहीं बहुत अच्छा इंतजाम है |हम सब एक साथ बोल उठे |
फिर हमारे साथ के पुरुषो से परिचय पाने लगे |कोई बैंक से रिटायर्ड , कोई मार्केटिग कोई रिटायर्ड इंजिनियर |हम सब महिलाये भी अपने अपने क्षेत्र में पूरी तरह समर्पित थी और अपना नौकरी का कार्यकाल पूरा करने बावजूद हर कोई ,कोई न कोई सेवा की गतिविधियों से जुड़ा था |
हम सबका परिचय जानने के बाद उन्होंने अपने शिष्य जो की उनकी सेवा में तैनात था उसे धीरे से कुछ कहा -उसने हम सबको एक -एक चाकलेट दी और कहा स्वामीजी को आजअभी निकलना है दिल्ली के लिए पिछले तीन महीने से यही है |
आगे की बहुत सारी योजनाये है उसके लिए उन्हें दोरे पर जाना है |
बिलकुल !
हम सब उठ गये |तरुण स्वामीजी प्रेस किये भगवा कपडे पहने , हाथमे लेपटाप लिए बड़ी सी वातानुकूलित गाड़ी के लिए उठ गये ,धर्मशाला में जितने लोग ठहरे थे सब हाथ जोड़े उन्हें विदाई दे रहे थे |साथ ही दिल्ली के कुछ बड़े व्यापारी उनके खाने पीने की वस्तुए रखवाने में व्यस्त थे |
और हमनोकरी पेशा रिटायर्ड लोग न ही बराबर हाथ जोड़ पा रहे थे और नहीं उनकी कोई व्यवस्था कर पा रहे थे |
उनके जाने के बाद मालूम पड़ा जो रसोइये भोजन बना रहे थे वे भी चले गये |हमे अपनी व्यवस्था खुद करनी होगी |
जाते जाते स्वामीजी कह गये थे हम यहाँ आराम से रह सकते है रिटायर्ड लोग जो ठहरे ....

19 टिप्पणियाँ:

राज भाटिय़ा said...

रिटायर मेंट की बात नही, अगर आप भी इस स्वामी जी... को हड्डी(एक मोटा सा लिफ़ाफ़ा) डालते तो आप के रहने सहने की व्यवस्ता भी होती, चलिये अगली बार किसी स्वामी ओर ऎसे ढोंगी के भगत मत बने

मो सम कौन ? said...

हमें तो मैडम "मौन वाक-युद्ध" सबसे अच्छा लगा।
ये स्वामीजी टाईप लोग भी कभी रिटायर नहीं होते, इनकी फ़ेस वैल्यू और बढ़ जाती है उम्र के साथ साथ।

बहुत अच्छा आलेख लगा।


आभार।

sangeeta swarup said...

संस्मरण रोचक है....रिटायर होने की बात बहुत रोचक ढंग से लिखी है....

सतीश सक्सेना said...

"रिटायर्ड नहीं हुए थे तो जितने पैसे वो मांगते थे तो दे देते थे क्या " हा...हा...हा.....हा......
रिटायर्ड पति की भुनभुनाती पत्नी का वास्तविक शब्द चित्र जान है इस लेख की ! आपकी शैली जीवंत है , आनंद आ गया ! भविष्य में पढने के लिए आपका फलोवर बन रहा हूँ !
शुभकामनायें

ज्ञानदत्त पाण्डेय Gyandutt Pandey said...

ओह, इस दशा से बचा कैसे जायेगा - इस पर बहुत सोचा करता हूं!

Manoj K said...
This comment has been removed by the author.
Manoj K said...

i like the way you have portrayed your entire travel experience.

kshama said...

Aisi saral,sahaj shaili me likha hua yah aalekh padhte samay bada maza aayaa..kuchh vyang,kuchh jeevanme rachi basi vidambana...ek saaf suthra pratibimb!

hem pandey said...

हरिद्वार के संदर्भ में मेरा अनुभव बिलकुल विपरीत है.हमारे पण्डाजी( भगतजी) की धर्मशाला में जब चाहो, जब तक चाहो, प्रेम से रहो. वे आपको बिस्तर, बर्तन और गैस तथा गैसचूल्हा निःशुल्क उपलब्ध करा देंगे. हाँ बिस्तर जमीन पर लगाना पड़ेगा और अपने राशन की व्यवस्था स्वयं के खर्चे पर करनी पड़ेगी. . जाते समय यदि आप उन्हें कुछ भेंट देना चाहें तो स्वीकार करेंगे, न दें तो भी संतुष्ट रहेंगे.

ज्योति सिंह said...

aapki yatra shaandaar rahi ,padhte huye kai anubhav samne aaye ,achchha laga padhkar ye sansmaran .

कविता रावत said...

Bahut achha laga aalekh....
Main bhi pichle varsh hardwar, rishikesh hote huye Joshimath gayee thi... Aapne yaad taja kara dee...
Bahut sundar tasveeren dekhkar man ko bahut achha laga..
Bahut shubhkamnayne.

दिगम्बर नासवा said...

सब के साथ ऐसा ही होता है ... आपने बहुत रोचक रूप से रखी है ये बात ...

रचना दीक्षित said...

अच्छी रही ये यात्रा और संस्मरण साथ ही आपकी व्यंगात्मक शैली इसी बहाने हमारी भी सैर हो गयी

पद्म सिंह said...

बहुत रोचक प्रसंग है ... वैसे ऐसा अक्सर होता है कि रिक्शे वाले और कुली जैसे लोग जहां मजबूरी देखते हैं या महिला यात्री देखते है, अपने रेट बेतुका बढा देते हैं.. स्वामी जी लोग भी तरक्की पर हैं ... होत न आज्ञा बिन पैसा रे ... :)

rashmi ravija said...

बहुत रोचक तरीके से लिखा है,आपने संस्मरण....बहुत आनंद आया पढके..और पति-पत्नी के नोंक-झोंक और रिटायर्मेंट वाली बात हंसा गयी...स्वामी जी लोग तो सारे ऐसे ही हैं...

shikha varshney said...

बहुत खूब शोभना जी ! रिटायरमेंट कि मानसिकता के तडके के साथ ये कुम्भ यात्रा भी करवा दी ...बेहद रोचक पोस्ट है और तस्वीरें तो माशाल्लाह मतलब इतनी भीड़ और तकलीफ में भी फोटो खींचने से बाज़ नहीं आये आप लोग :) ...

अमिताभ श्रीवास्तव said...

sansmaran yaatraa me nikharte he..bahut kuchh dekhne aour jaanane ko miltaa he, jeevan ke kai roop he aour ye sab yatraa kar hi jaane jaa sakte he.../ swamiji jese bhi he aour asal swaami bhi he../ bharat he, vividhata me ekata jesa////

स्वाति said...

रोचक संस्मरण!
आनन्द ही गया आपकी पोस्ट पढ़ कर.. और रहा सवाल इन बाबाजी लोगो का ,तो ये तो आजकल बहुत बड़ा बिज़नस बन गया है. सचमुच के स्वामी या बाबाजी को इन ऐशो आराम की क्या जरूरत ?

Manogat said...

सुंदर शैली, सहज प्रस्तुति |
समाज में व्याप्त संवेदन-हीनता मन मसोस कर ही सही, किंतु स्वीकार कर लेना ही उत्तम है |
खैर.... अंत सुखद रहा, एक अच्छी रचना ने जन्म लिया |