Friday, April 30, 2010

गाजर घास

मेरा अहं
ये अहं न चाहते हुए भी
कब उग जाता है ?
मेरे अन्दर
गाजर घास की भांति
बहुत पहले, ज्ञान न था
गाजर घास का ?
जब उगते देखा तो
खुश हुई
चलो घर कि गाजर
खाने को मिलेगी
किन्तु
वो तो फैलती गई
और पूरे बगीचे
को लील गई
खुश्की दे
सो अलग |
हर हरी चीज,
सुकून
नहीं देती ?
ये जाना
तब से !
मेरे अहं का
विरोध करती हूँ
तो अलग
बैठा दी जाती हूँ
और
मेरे अहं का
समर्थन
करती हूँ
तो
गाजर घास
बन जाती हूँ |

15 टिप्पणियाँ:

मनोज कुमार said...

अच्छी अभिव्यक्ति।

sangeeta swarup said...

अहम ...सच में गाज़र घास जैसा ही होता है...बहुत अच्छी अभिव्यक्ति

नीरज गोस्वामी said...

अहम् की विलक्षण उपमा दी है आपने...साधू वाद...बहुत अच्छी रचना...
नीरज

प्रवीण पाण्डेय said...

अहम को तो उखाड़ फेंकना चाहिये । वही निष्कर्ष है ।

divya pandey said...

shabdon ne abhivyakti ka pura-pura saath nibhaya ....bahut achhi rachana

अल्पना वर्मा said...

खुद से खुद की लडाई है..इस कशमकश को बहुत अच्छे से अभिव्यक्त किया है..

बेचैन आत्मा said...

अहं को स्वयम मिटाना होता है
जैसे
गाजर घास को
स्वयम ही उखाड पड़ता है।
एक को उखाड़ने में हाथ छिल जाता है
दूसरे को उखाड़ने में
मन।
---सुंदर उपमा.. अच्छे भाव।

वन्दना अवस्थी दुबे said...

मेरे अहं का
समर्थन
करती हूँ
तो
गाजर घास
बन जाती हूँ
बहुत खूब कविता और बहुत खूब उपमा. नया कलेवर अच्छा लगा.

K.P.Chauhan said...

gaajar ghaas ko dekhkar gaajar khaane ki laalsaa paalnaa maatr ek bhrm hai parantu bhrm hote hue bhi kuchh samay tak hamko sanyam me rahne ki prernaa to detaa hi hai jo ki bahut hi achchhe baat hai ,waise aapki rachnaa abhootpurv hai jisko padhkar hrday ko shaanti si prteet hoti hai waise gaajar bhi to hrday ko balishth banaati hai

कविता रावत said...

जैसे
गाजर घास को
स्वय ही उखाड पड़ता है।
एक को उखाड़ने में हाथ छिल जाता है
दूसरे को उखाड़ने में
मन।
.....Antarman ke kashkash ko sundar bimb chitran ke madhyam se bakhubi prastut kiya hai aapne.... Bahut achha laga... Haardik shubhkamnayne..

अजय कुमार said...

अहं का अच्छा विश्लेषण

ज्ञानदत्त पाण्डेय Gyandutt Pandey said...

सच में - अहं गाजर घास सा पसरता चला जाता है। बिना जलाये मुक्ति नहीं है।

रचना दीक्षित said...

मेरे अहं का
समर्थन
करती हूँ
तो
गाजर घास
बन जाती हूँ
बहुत अच्छी प्रस्तुति संवेदनशील हृदयस्पर्शी
आज के जीवन का कटु सत्य हर इन्सान इनसे रोज ही दो चार होता है

दिगम्बर नासवा said...

अपने आप से झूझना पढ़ता है ,,, ये अहम मजबूर करता है ...

dr.aalok dayaram said...

अहं सामान्य मानव जीवन का हिस्सा होता है। हां इसे संतुलित रखने की कसरत जरूरी है।