Tuesday, September 28, 2010

"पितृ -पक्ष और खरीददारी"

पितृ पक्ष में हमारे सारे भारत में ऑर जहाँ जहाँ भी भारतीय लोग बसे है बहुत श्रद्धा के साथ हमारे पूर्वजो को याद किया जाता है |अपने परिवार ऑर कुटुंब के साथ पितरो को तर्पण ,ब्राम्हण भोजन आदि कराया जाता है |इसके साथ ही कई मान्यताये जुडी होती है कई कार्य निषिद्ध होते है |जिसमे नये कपड़े खरीदना ,नै गाड़ी खरीदना ,नये मकान में प्रवेश करना ,ऑर भी कोई नई वास्तु का प्रयोग करना आदि |मै अपने बचपन से सुनती आई हूँ और इसका पालन भी किया है चलो क्या जाता है ?अगर १५ दिन कोई नई वस्तु नहीं वापरेंगे तो क्या हो जायगा ?किन्तु हमेशा प्रश्न अनुतरित ही रहता कि क्यों?जब हम बाजार से सब्जी,अनाज ,ऑर खाने कि चीजे खरीद कर लाते है खाते है ?तो फिर अन्य वस्तुए क्यों नहीं ?
ऑर आजकल तो अख़बार में विज्ञापन भी आने लगे है कि ज्योतिषियों ने कहा है नई वस्तुए खरीदने में कोई अड़चन नहीं ?अब ये बाजार का बाजारवाद है ,अथवा हमारी असहनशीलता कि हम कितना नियंत्रण रख पाते है ,खरीददारी पर |
मेरे इस प्रश्न के जवाब में मुझे कुछ जानकारी मिली है कि ,श्राद्ध पक्ष में नई वस्तुओ कि खरीददारी इसलिए नहीं करते है कि अगर हम कोई नई वस्तु लाते है तो हमारा पूरा ध्यान उसी पर रहता है ऑर हम हमारे पूर्वजो कि आवभगत मन से नहीं कर पाते जितना सम्मान उन्हें देना चहिये उतना नहीं दे पाते हमारा ध्यान बंट जाता है |
मै कुछ संतुष्ट नहीं हूँ इस उत्तर से |
आप सब लोग क्या कहते है ?कृपया अपने विचारो से अवगत कराये ताकि आने वाली पीढ़ी को भी सही मार्गदर्शन मिल जाये |

22 टिप्पणियाँ:

Apanatva said...

mera janm jain parivar me huaa aur hamare yanha shradh nahee manae jate.........

sacchaaee to ye hai ki hamare poorvaj the to hum hai.......hamara astitv unhee kee dain hai.....15 din matr saal bhar me unhe yaad karne ke liye....?
kum nahee lag rahe?
nayee cheeze nahee khareedane waleee baat par to mai ye hee kahoongee.....................

sayyam kee pareeksha hee hai ye paramparae..........

ajit gupta said...

भारत में प्रत्‍येक रीति रिवाज के पीछे मौसम का बहुत बड़ा हाथ है। मुझे लगता है कि जब यह रीति बनी थी उस समय खरीदने का क्‍या था? खाने की वस्‍तुएं और पहनने को कपड़ा। या फिर घर के सामान और जानवर आदि। अभी वर्षा ॠतु समाप्‍त ही हुई थी और पितृ पक्ष आ गए। शायद इसलिए ही कुछ नया नहीं खरीदा जाता होगा कि वर्षा के मौसम के बाद दीवाली आने पर ही नवीन धान भी आएगा, आवागमन के साधन भी दुरस्‍त हो जाएंगे तो इस समय कुछ भी नया नहीं खरीदा जाता होगा। लेकिन अब तो दुनिया ही बदल गयी है। इसलिए पुराने रीति-रिवाज में बदलाव भी आवश्‍यक है। वैसे भी धान तो नया आने पर ही खरीदा जाता है।

सतीश सक्सेना said...

पूजा के नाम पर शायद एक यही लकीर पीट रहा हूँ अब तक मगर इन दिनों रोज स्नान कर सुबह जब पितरों को याद करने बैठता हूँ तो मन में बेहद शांति मिलती है ! आखिरी दिन पांच गरीब ब्राह्मणों को बुलवा कर पिता और माँ को याद करते हुए उन्हें जब कुछ वस्त्र आदि देता हूँ तो लगता है अपनी माँ और पिता को दे रहा हूँ ! मुझे मालूम है यह अंधविश्वास है मगर इस अंधविश्वास को छोड़ नहीं सकता क्योंकि इसके कारण मुझे अपने बड़ों की याद करने का बहाना मिल जाता है !
बाकी आपके द्वारा वर्णित और पंडितों द्वारा निर्दिष्ट बातें नहीं मानता ! सब कुछ खाता हूँ और किसी वर्जना को नहीं मानता !

सतीश सक्सेना said...

पूजा के नाम पर शायद एक यही लकीर पीट रहा हूँ अब तक मगर इन दिनों रोज स्नान कर सुबह जब पितरों को याद करने बैठता हूँ तो मन में बेहद शांति मिलती है ! आखिरी दिन पांच गरीब ब्राह्मणों को बुलवा कर पिता और माँ को याद करते हुए उन्हें जब कुछ वस्त्र आदि देता हूँ तो लगता है अपनी माँ और पिता को दे रहा हूँ ! मुझे मालूम है यह अंधविश्वास है मगर इस अंधविश्वास को छोड़ नहीं सकता क्योंकि इसके कारण मुझे अपने बड़ों की याद करने का बहाना मिल जाता है !
बाकी आपके द्वारा वर्णित और पंडितों द्वारा निर्दिष्ट बातें नहीं मानता ! सब कुछ खाता हूँ और किसी वर्जना को नहीं मानता !

shikha varshney said...

अजीत गुप्ता जी की बात ठीक लग रही हैं ..वैसे इस तरह के सवाल मेरे मन में उठते रहते हैं :)

डा. अरुणा कपूर. said...

मुझे लगता है कि श्राद्ध-पक्ष में ....नई चिज-वस्तुओं की अति आवश्यकता या मजबूरी में ही खरीदारी होनी चाहिए!...रोज-मर्रा की चीजें जैसे आटा, दाल, घी, तेल, सब्जियां इत्यादी की खरीदारी पर रोक नहीं लगानी चाहिए!...नया मकान, नई कार, नया फ्रिज या नई वाशिंग मशिन जैसी चीजों की खरीदारी इन पंद्रह दिनों के बाद की जा सकती है!....हमारे पूर्वजों के सन्मान स्वरुप अगर हम साल में एक बार, इतना भी कर लेते है तो...इससे हमें ही मानसिक संतुष्टी मिलेगी कि हमने अपने पूर्वजों को श्रद्धांजली दे दी...उन्हे याद किया!...विषय-वस्तु उत्तम है!

दिगम्बर नासवा said...

याद करने तक तो कोई बुराई नही है ... वैसे आपकी व्याख्या ठीक लगती है ....

धर्म सिंह........;;;;;.. (इक अजनबी) said...

दी नमस्ते
बहुत दिनों बाद आना हुआ है
बहुत ही प्यारा लेख पढ़ के बहुत अच्छा लगा

धर्म सिंह........;;;;;.. (इक अजनबी) said...
This comment has been removed by the author.
rashmi ravija said...

मुझे भी यह तर्क ठीक लगता है कि कुछ दिन अपने पूर्वजों के नाम कर दें...जिनकी बनायी दुनिया में हमलोग रह रहें हैं.
वैसे आने वाली पीढ़ी के पास कहाँ इतना समय बचेगा??..हमारी पीढ़ी के पास ही नहीं है...

kshama said...
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kshama said...

Mai wyaktish: to is baat ko nahi manti.Gar koyi cheez zaroori hai to khareed bhi letee hun.Haan,chunki,anya pariwaarwale mante hain to unka dil nahi dukhana chahti.
Bramh bhoj me to qatayi wishwas nahi.Zarooratmand ko do/khilao.Jiska pet waise hee bhara ho,use aur adhik khilake kya fayda?

देवेन्द्र पाण्डेय said...

विश्वास को आँखें मूंद कर मानना ही अंध विश्वास को बढ़ावा देना है। हमारे सोलह संस्कार हमारे जीवन की उन्नति के लिए ही बने हैं मगर हमेशा यह ध्यान रखा
जाना चाहिए कि जो बातें कही गयीं हैं वे क्या अब भी उतनी ही प्रासंगिक हैं। कहीं हम धार्मिक कर्मकाण्ड के पालन में ठगे तो नहीं जा रहे। पितरों को याद करना और निर्धन को भोजन कराना तो किसी भी तरह से गलत नहीं है।

प्रवीण पाण्डेय said...

मैं भी उत्तर ढूढ़ रहा हूँ।

ZEAL said...

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सभी तर्क ठीक लग रहे हैं... फिर भी मुझे लगता है की इन पंद्रह दिनों में हम अपने पूर्वजों को याद करते हैं और सम्मान देते हैं। वो लोग जो अब हमारे बीच नहीं हैं। उनकी अनुपस्थिति दुःख का विषय है। ऐसी स्थिति में नयी वस्तुओं को खरीदने का कोई औचित्य नहीं है। नयी वस्तुओं को मिलने से होने वाली ख़ुशी हम अपने पूर्वजों के साथ बाँट नहीं सकते, शायद इसलिए खरीददारी नहीं करते हैं।

वैसे कहते हैं की जिनके माँ बाप जीवित हैं अर्थात जिनके ऊपर छत्र-छाया है , वो लोग नए वस्त्र खरीद/धारण कर सकते हैं।

एक महत्वपूर्ण विषय पर चर्चा के लिए आभार।

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Dr.J.P.Tiwari said...

यह कोई त्यौहार नहीं एक उपहार है. हम अपने लिए तो जन्मदिन से विवाह दिन.....न जाने और क्या- क्या मानते है आज अपने अग्रज, अपने पूर्वजों को तो याद कर लिया जाय जिन्होंने इतनो अच्छी विरासत...संस्कृति, संस्कार और विज्ञानं.. प्रदान किया हमारी सुख शांति और ऐश -ओ-आराम के लिए. पर सच बोलिए हम हों या आप कितना याद करते हैं उन्हें........? आज से प्रारंभ हुआ पितृपक्ष उन्ही के लिए है.... इस व्यवस्था को जिसने भी बनाया हो, लागू किया हो, बड़ा उपकार किया मानव समाज पर. पूर्वजो को सबसे उत्तम श्रद्धांजलि तो यह होगी की हम पुत्र - पुत्र - प्रपौत्र...के रूप में ऐसा कोई काम न करें जिससे उनके नाम के साथ हमारा नाम जोड़कर बदनाम किया जाय. यह संकल्प आज बहुत ही महत्वपूर्ण होगा. श्रद्धांजलि देंगे हम उनको और लाभ होगा हमारा. विकास होगा हमारा, प्रगति और उन्नयन होगा हमारा. तो इससे अच्छी बात और क्या हो सकती है..

शरद कोकास said...

जिस दिन बाज़ार की ज्योतिषियों से साँठ्गाँठ हो जाएगी यह बन्धन समाप्त हो जाएगा । लेकिन ऐसा न हो शयद सबकी अपनी अपनी दुकान है ।

शोभना चौरे said...

आप सभी का बहुत बहुत धन्यवाद जो इस विषय पर अपने विचार दिए जानकरी भी मिली |श्राद्ध पक्ष में हमारे पूर्वजो से हमारा तारतम्य बना रहे हम उनसे मन से जुड़े रहे शायद इसीलिए यही परम्परा रही हो कि और चीजो में न रमे |
@सतिश्जी
भले ही आप लकीर पिटे किन्तु हमारे पूर्वजो जिनमे माता पिता के आलावा दादा दादी ,या अन्य परिवार के लोगो को श्रद्धा पूर्वक याद इन्ही दिनों में किया जाता है |मन को शांति तो मिलती ही है चाहे गरीबो को भोजन कराए या ब्राहमणों को खाना खिलाये |हमारे देवी देवताओ का पूजन भी कोई न कोई विज्ञानं से जुड़ा है ग्रामीण जनता को पुरातन समय में वैज्ञानिक तरीके पूजन के माध्यम से ही समझाये जाते थे ,उदाहरन स्वरूप कई जगह गंधक का पानी होता है जिससे काफी चर्म रोगों में फायदा होता है अब लोग इसे समझ नही पाते आज भी तो वहां पर प्रचलित देवी देवता कि स्थापना कर दी जाती है जिससे रोगी धर्मिक आस्था लेकर स्नान करते है और देवी को पूजते है |

शोभना चौरे said...

@रश्मिजी
आने वाली पीढ़ी भी जरुर याद करेगी वो अपनी संस्क्रती में आस्थो में गहरा विश्वास रखती है बशर्ते उन्ही हमारी परम्पराए सिद्धान्ती के साथ समझाई जाये |हाँ तरीको में परिवर्तन हो सकता है
@अजितजी कि बात से काफी सहमत |

राज भाटिय़ा said...

मै भी अजीत गुप्ता जी से सहमत हुं.

Udan Tashtari said...

विश्वास और आस्था का मामला है...हाँ, समायानुकुल परिवर्तन निश्चित ही आवश्यक है.

ज्योति सिंह said...

shobhna ji sahi kahi hamare yahan bhi in niymo mana jaata hai ,unki pooja to jaroori hai kyonki unhi ke aashirwaad se hum panpate hai .aur hamara wazood bhi unhi se hai .achchhi post .