सुविधाओ के आगोश में पलते हम , सुविधाओ के जंगल में खो गये हम , क्रांति की मशाल जलाते जलाते सुविधाओ की अभिव्यक्ति में सिर्फ वाचाल हो गये हम | बाजार की सुविधा में ,सुविधा के बाजार में तन से धनवान मन से कंगाल हो गये हम ।
वेदना तो हूँ पर संवेदना नहीं,
सह तो हूँ पर अनुभूति नहीं,
मौजूद तो हूँ पर एहसास नहीं,
ज़िन्दगी तो हूँ पर जिंदादिल नहीं,
मनुष्य तो हूँ पर मनुष्यता नहीं ,
विचार तो हूँ पर अभिव्यक्ति नहीं|
7 टिप्पणियाँ:
बाजार की सुविधा में ,सुविधा के बाजार में
तन से धनवान मन से कंगाल हो गये हम ।
बिलकुल सही कहा है ....
जब सुविधा पर शीश झुकाया, अपना मान छोड़ बैठे हम।
Suvidha ke gulam ho gaye ham..
सुविधाओ के आगोश में पलते हम ,
सुविधाओ के जंगल में खो गये हम ,
सच कहा.
दुरुस्त कहा है ... मन से कंगाल हो गए हैं सब आज ...
आपकी यह रचना कल मंगलवार (बृहस्पतिवार (06-06-2013) को ब्लॉग प्रसारण पर लिंक की गई है कृपया पधारें.
तन से धनवान मन से कंगाल होगये हम ।
य़ही है हम सुविधा-भोगियों की कहानी ।
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