Wednesday, August 19, 2009

वट वृक्ष की शोक सभा

नीम ने बुलाई एक आम सभा
वटवृक्ष को श्रधान्जली देने
देश विदेश के पेडो को
संदेश भेजा!
पवन के द्वारा

कुछ पेडो ने आने में
असमर्थता जताई
पवन के ही
द्वारा
कुछ इस अवसर का
इंतजार ही कर रहे थे

बबूल ,आम, इमली ,नारियल आदि -आदि
कई ख्याति प्राप्त पेड़ आये
अपने अपने भाषण
साथ में लेकर

कुछ छोटे छोटे पौधे
भी अपनी उपस्थिति
दर्ज करने आ पहुंचे

सबने वटवृक्ष कि मौत पर
सवेदना प्रकट की
नीम ने कहा -
बरसो मेरा साथ रहा
आज मै अकेला
महसूस कर रहा हूँ ....
पीपल ने कहा -
हम तीनो
ब्रह्मा विष्णु महेश थे
आज सिर्फ ब्रह्मा विष्णु रह गये

और सबने अपनी अपनी
अश्रुपूरित श्रधांजलि
अर्पित की
बूढे बरगद को

शोक सभा संपन्न हुई
बरगद कि जटा के
अंतिम छोरतक
पहुँचते ही सबके
धैर्य का

बांध टूट गया
नीम ने कहा -सदियों तक
इसकी तानाशाही सही
अब मै राजा हूँ !

सारी बीमारिया
दूर करता हूँ मै
और वाहवाही बटोरे ये ?
छोटे पौधे
बोल उठे -
आखिर कब तक?
इसके साये में पलते रहे ?
इसने कभी न
पनपने दिया हमे
चलो !
सदियों का शोषण
ख़त्म हुआ
अपनी जटाओं से सारी
जमीन पर आधिपत्य जमा
रखा था
कुढ़ते कुढ़ते पीपल ने ,
अपनी व्यथा कह डाली

बरगद के पेड़ की
कुछ
कोंपलें फूट रही थी |
और बरगद उन कोपलों
के माध्यम से
अपनी शोक सभा में
दूर -दूर से आये
पेडो को देखकर
हर्षित हो रहा था
उसने अपना जीवन धन्य माना
अपनी कोंपलों को देखकर
फिर से वो लोगो के
दुःख समेटना चाहता था
सबको छांव देना चाहता था
हर राहगीर को
एक ठांव देना चाहता था
जंगल से निकलकर
गाँव में बसा था वो,
कितने ही?
बसंत देखे
उसने अपने चबूतरे के साथ,
कितने ही सच झूठो का
साक्षी बना
फिर न जाने इस गाँव को
क्या हुआ ?

चबूतरा तक उखड गया
और बरगद सूखता गया
कितु जाते हुए पेडो का
वार्तालाप सुनकर
उसका सदियों पुराना
भ्रम टूट गया

उसने अपनी यौगिक क्रिया से
अपने को साध लिया
धरती का पानी लेना बंद
कर दिया
पवन से माफ़ी मांग ली
सूरज कि रौशनी से
अपनी दिशा बदल ली
और अपने साथियों
के फलने फूलने के लिए
अपनी जटाओं
को समेट लिया
और
इस तरह
एक वटवृक्ष
की जिन्दगी
मौन हो गई
सदा के लिए .................

16 टिप्पणियाँ:

अमिताभ श्रीवास्तव said...

jeevan ki ek yah bhi sachchai he/
ek nai tarah ki kavita/ vraksho ke sahare aapne jeevan aour usake vat vraksh ko bakhoobi uker diya/ sach me bahut achhi rachna he/
mere (19 aug)janmdin par aapki badhai v shubhkamnaye prapt hui,
mere sir par aapke aashirvaad rahe..bs/

Abhishek Prasad said...

nature ko use karke ek satik bahvovyakti...

waise to main aapke lekhan par koi tippani kar sakun aisi yogyata mujh mein nahi hai... par kahan chahunga saare bhaav achhe hai...

kabhi mere blog par bhi aaiyega aur mera maarg-darshan kijiyega...

दिगम्बर नासवा said...

इक नयी सोच से लिखी हुयी ......... कमाल की रचना है .......

रंजना said...

क्या कहूँ.......झकझोर दिया......अभिभूत कर दिया आपकी इस रचना ने.......

किस किस का यथार्थ आपने इस एक वटवृक्ष की कथा में समेट दिया है......उफ़ !!!

पिछले पांच मिनट में कई वाक्य लिखकर मिटा चुकी हूँ.......सच कहूँ तो मनोभाव को अभिव्यक्त करने योग्य उपयुक्त शब्द का संधान नहीं कर पा रही........पता नहीं कितने समय तक यह यूँ ही निस्तब्ध स्तब्ध किये रहेगा....

आपकी लेखनी को नमन है....

k.r. billore said...

shobhanaji ,vat vraksh ke madhayam se jivan ke katu satay ko ujagar kiya ye hi jivan ka ytharth hai ,sunder aur bhav purn kavita ke liye badhai ,,,,,,,,kamana mubai ,,,,,,,,,,

Babli said...

एक नई सोच और सुंदर भाव के साथ लिखी हुई प्रकृति पर ये ख़ूबसूरत रचना प्रशंग्सनीय है! मुझे बहुत पसंद आया!
मेरे नए ब्लॉग पर आपका स्वागत है -
http://ek-jhalak-urmi-ki-kavitayen.blogspot.com

विपिन बिहारी गोयल said...

बहुत सुंदर



तेज धूप का सफ़र

arun prakash said...

वृक्षो की शोक सभा पढ़ कर लगा जैसे सशरीर उपस्थित हूँ उस सभा में
संवेदना व यथार्थ परक सामयिक कविता
आभार

Mumukshh Ki Rachanain said...

दिल को झकझोर देने वाली शशक्त कविता.
बधाई.

Nirmla Kapila said...

बहुत सुन्दर एक वट बृक्ष के माध्यम से पर्यावर्ण का संदेश ! बधाई

आनन्द वर्धन ओझा said...

शोभानाजी,
आपकी यह रचना भाव-बोध की अद्भुत अभिव्यक्ति है. २३ जुलाई को मेरे ब्लॉग पर 'नवचेतना के छंद' शीर्षक एक कविता है, उसके प्रत्युत्तर-सी आपकी यह रचना मुझे सुकून देती है, आश्वस्त करती है और किंचित दुखती रगें भी छूती है... भाव और शब्द-संयोजन का अप्रतिम सामंजस्य सीधा असर करता है.. बधाई !
'रास-लीला' के छंद आपको प्रियकर लगे, जानकार अच्छा लगा. आभारी hun . साभिवादन...

अल्पना वर्मा said...

वटवृक्ष की इस कहानी ने जो सन्देश देना चाहा है वह उस में पूरी तरह सफल है...
यह कविता एक उत्कृष्ट रचना है...

बरगद का कोपलों को देख अपना जीवन धन्य मानना . और राहगीर के हितों के बारे में सोचना आदि...भाव इस कविता को बहुत ही अर्थपूर्ण और भावपूर्ण बना रहे हैं.

रचना त्रिपाठी said...

सबने वटवृक्ष कि मौत पर
सवेदना प्रकट की
नीम ने कहा -
बरसो मेरा साथ रहा
आज मै अकेला
महसूस कर रहा हूँ ....
पीपल ने कहा -
हम तीनो
ब्रह्मा विष्णु महेश थे
आज सिर्फ ब्रह्मा विष्णु रह गये

मेरी भी संवेदनाएं जोड़ लीजिए। बहुत अच्छी कविता है।

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

वट वृक्ष का जमाना तो अब लद ही गया है। अब बोन्साई के पौधे पसन्द किए जा रहे हैं। गमले में उगाकर रखे जा रहे हैं। नाप-तौलकर खाद-पानी दिया जाता है, घर के भीतर खाली जगह को भरने के लिए या बरामदे में रख दिया जाता है, सुविधानुसार जगह बदल दी जाती है बेचारों की।

अब सभी स्वतंत्र हवा में मनचाहे तरीके से उड़ने की इच्छा रखते हैं। कोई बोझ नहीं ढोना चाहता। पूरी तरह प्रोफ़ेशनल जिन्दगी।

आपने अच्छा किया जो श्रद्धाञ्जलि सभा अभी आयोजित कर ली। कुछ समय बाद इसमें कोई आने वाला भी नहीं मिलता। ईश्वर वटवृक्ष की आत्मा को शान्ति दें।

ज्योति सिंह said...

jeevan ki gaharai ko samate atut satya ko darshaati hui, aapki rachana nazar aati hai .shaandar .bahut din huye aapke lekh ke intzaar me hoon .

P.N. Subramanian said...

पर्यावरण के प्रति आपकी संवेदनाओं को कविता में ढाल कर सशक्त रूप से प्रस्तुत किया गया है. नमन