Saturday, August 15, 2009

स्वतन्त्रता दिवस पर विनती

पूरे बाजार में तिरंगे हर रूप में कपडे में, प्लास्टिक में उपलब्ध है |
बस नही है तो सिर्फ़ दिलो में |
बहुत कुछ लिखा जा चुका है १५ अगस्त पर |बहुत कुछ भाषणों में कहा जायगा एक रस्म की तरह |
बस एक अभियान हो ,१६ अगस्त को यहाँ वहा बिखरे प्लास्टिक के झंडो को समेट कर हम उन्हें पैरो में आने से बचा सके |

स्वतन्त्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाये |

झंडे की खुशबु


बचपन में जब
केले का आधा टुकडा मिलता ,
सेब की एक फांक मिलती
तो उसका स्वाद अमृत था
आज के दर्जनों केलो में ,
किलो से स्टीकर लगे सेबों में,
वो मिठास नही
एक फहराते हुऐ झंडे को निहारने में
जो धड़कन थी ,
जो रोम रोम की सिहरन थी
वो गली में बिकते हुऐ
तीन रंग की
प्लास्टिक की पन्नी
चोकोर आकार लेते हुऐ
जो कभी कार में सजते है
जो कभी गमले में खोंस दिए जाते है
जो कभी एक सालके बच्चे के हाथ में
दे दिया जाता है
उसका मन बहलाने के लिए ,
वो तीन रंग


क्या?
वेसा रोमांच
,वेसी सिहरन दे पायेगे कभी?

12 टिप्पणियाँ:

Mumukshh Ki Rachanain said...

क्या?
वेसा रोमांच
,वेसी सिहरन दे पायेगे कभी?

शायद कभी नहीं..........
यही हालात बने रहे तो जवाब और भी पुख्ता.

KK Yadav said...

Ajadi par sundar seekh di apne..ham apke sath is abhiyan men shamil ho gaye.

स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनायें. "शब्द सृजन की ओर" पर इस बार-"समग्र रूप में देखें स्वाधीनता को"

vikram7 said...

स्‍वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं

Priya said...

gazab hai shobna ji.....aapki rachna ne to hamara bhi school time yaad dila diya...but aajkal school mein primary students of natinal festival mein leave de di jaati hai......

Vicharo ki swatantrata mubarak ho aapko

आनन्द वर्धन ओझा said...

सचमुच कहाँ गई वह धमक, वह स्वाद, वह मिठास और वह भावना ? हम कितने बदल गए हैं ! कितनी बदल गई हैं हमारी मान्यताएं ! आश्चर्य होता है....! ये विश्वासों का दिखावटीपन है, हर आस्था का बज़रूकरण है ! १५ अगस्त पर आपकी यह टिपण्णी मन को कहीं गहरे छूती है. मैं आपकी भावनाओं की क़द्र करता हूँ..... आ.

दिगम्बर नासवा said...

सच में आज वो khushboo, वो माहोल नहीं है जो पहले हुवा करता था............. तब dilon में josh था ............

अमिताभ श्रीवास्तव said...

mahol badalne ke liye hi hota he/ prakarti ka niyam bhi yahi he/ sambhav he aaj ki pidi kal apne isi samay ko yaad kar kahe ki..kya hame vo mahol milega jo pahale hua kartaa thaa/
hna yaade apani jagah he, mujhe apane desh ke prati kaafi sukhad anubhuti bhi hoti he ki ham aaj vikaas dekh rahe he../ kal hamare paas vo sab nahi tha jo aaj he/ ab kal ki kuchh meethee yaade to aaj hame thodaa pareshaan to karengi hi..

k.r. billore said...

shobhanaji ,mrit bhavnao ka sila hai ye ,bhartiyo ka swatntrta ke sath kaisa gila hai ye ,shhido ke khun ka kaisa badrang phul khila hai ye,,,,,,,,,kamana mumbai

गौतम राजरिशी said...

झंडे की इस अनूठी खुश्बू ने मन मोह लिया मैम!

MUFLIS said...

उस जज़्बे को अब ढूँढना ही तो रह गया है
दिखावा , आडम्बर हावी हो रहे हैं
लेकिन......जवाब हमीं को ही देना है

अभिवादन
---मुफलिस---

रंजना said...

Kya baat kahi hai aapne.....bas man aapki bhavnaon ke sammukh natmastak ho gaya....

Aapki baton ne tees ko aur bhi gahra diya....par lagta hai is vedna ka saans lena hi isse mukti ka marg dikhayega...nahi?

Isliye yah vedna mujhe swikaary hai..kotishah aabhar aapka.

Mrs. Asha Joglekar said...

Aapke tirange ne jaroor wahee siharan dee hai. Abhiyan me jitane jyada log shamil hon utana achcha.