Monday, September 21, 2009

माँ कभी बाजार नही गई

माँ की आराधना का पर्व है ," नव रात्रि "| नो दिनों तक उपवास रखकर ak नियम pal कर शक्ति की aradhna करते है |अलग अलग प्रान्तों में अलग अलग तरीके से माँ की पूजा अर्चना होती है |आजकल युवाओ को गरबा कर माँ की आराधना करने का सबसे सरल उपाय लगता है , तो ज्योतिशी भी अनेक उपाय बताने लगे है .माँ को खुश रखने के ,धन प्राप्ति के । कन्या को अच्छा वर मिलने के ,वर को अच्छी वधु मिलने के ,निसंतान दम्पति को संतान प्राप्ति के|मानो इन ९ दिनों में ही सबको अभीष्ट फल की प्राप्ति हो जायगी |दुकाने ज्योतिषियों के बताये सामान से भरी पडी है ,पाव मीटर से लेकर १०० मीटर तक की चुनरिया माँ के लिए मिल रही है |माँ के पास सिर्फ़ मांगने ही जा रहे है भले ही आरती में हम गाते है
नही मांगते धन और दौलत
न चांदी न सोना
हम तो मांगे माँ तेरे मन में
एक छोटे सा कोना .........

देवी माँ सबकी आशाये पूरी करे

नव रात्रि के भव्य आयोजनों माँ कही खो गई है |
आज मुझे इस अवसर पर माँ की याद आरही है उन

भव्य बजारों की चकाचौंध देखकर मन बरबस ही कह उठता है -


माँ ne कभी अपने जीवन में
छाते का उपयोग नही किया
क्योकि
उसने बारिश मे
कभी घर के बाहर कदम नही रखा

माँ ने कभी चप्पल नही खरीदी
क्योकि
दादी कि पुरानी चप्पल
फेक नही सकते थे

माँ ने कभी
ताजी रोटी नही खाई
क्योकि
घर में नौकर
नही थे

माँ ने कभी
नई साडी नही पहनी
क्योकि
बुआओ को
हर तीज त्योहारों पर
शगुन भेजना जरुरी होता था|

माँ कभी भी
पलंग पर नही सोई
क्योकि
पलंग सिर्फ
दादा बाबूजी और चाचाजी
के लिए था

माँ ने कभी
बाजार नही देखा
क्योकि उसकी
कभी कोई जरुरत
ही नही होती थी |

नवरात्रि के शुभ अवसर पर मै अपने सभी ब्लागर भाई बहनो का ह्रदय से आभार मानती हूँ जिन्होने हमेशा अविलम्ब मेरी अभिव्यक्ति पर अपनी महत्वपूर्ण टिप्पणिया देकर मेरा होंसला बढ़ाया |
इतनी बड़ी दुनिया मे हमारे सभी के विचारो का ये परिवार खूब फले फूले इन्ही शुभकामनाओ के साथ माँ के आराधना के पर्व की अनेक बधाई |

16 टिप्पणियाँ:

mahesh chander kaushik (डुगडुगी) said...

आप निराशावादी सोच से भरे हुए आर्टिकल क्यों लिखती हैं आज तो नारी हवाई जहाज चला रही है आप पुरानी कुठिंत बातों को लेकर क्यों बैठी हैं। कृपया क्षमा करें पर आपका लेख मुझे कुछ ऐसा ही लगा आशा है भविष्य में आप आशाओं का संचार करते हुए उर्जावान आर्टिकल लिखेंगी व इस कमेंट को नकारात्मक न लेकर आज से ही सकारात्मक सोच का प्रारभं करेंगी।

राज भाटिय़ा said...

आप ने अपने लेख ओर कविता मै मां के बारे बहुत सुंदर लिखा.मां सच मै ऎसी ही होती है, नारी हवाई जहाज चलाये या राकेट लेकिन जब वो मां है तो महान है
धन्यवाद

mark rai said...

आकाश को देख रहा हूँ । कोई छोर नही दीखता । इतना फैला हुआ है ...... डर लग लगता है ।
सोचता हूँ । हमारे अलावा इस ब्रह्मांड में कही और जीवन है ???
...nice article...

प्रकाश पाखी said...

आपकी रचनाए बेहतरीन तो होती ही है.इस रचना ने माँ के माध्यम से भारतीय नारी की स्थिति का समग्र चित्रं कर दिया है.आपकी श्रेष्ठ रचनाओं में एक लगी यह रचना.

प्रकाश पाखी said...

पुनश्च- महेश चंदर जी से विनम्र असहमति है.महेश जी कविता का बिम्ब माँ के माध्यम से नारी को बता रहा है.हमारे देश में नारी चाहे हवाई जहाज चलाए या रेलगाडी ,वह सुबह घर पे खाना बनाकर जाती है और शाम को वापस आकर खाना ही बनाती है...पति निठल्ला होगा तो भी चारपाई तोड़ना श्रेष्ठ समझेगा.जिस दिन वे पैसों को निवेश और खर्च करने में पति की इजाजत के बिना निर्णय लेना शुरू कर देगी उसदिन कविताओं का कथ्य अपने आप बदल जाएगा.

ज्योति सिंह said...

माँ ने कभी
बाजार नही देखा
क्योकि उसकी
कभी कोई जरुरत
ही नही होती थी |
maa shabd ka arth hi sangharsh aur tyaag hai .tabhi to maa hai aadarniye hai ,uske jaisa dooja nahi .navdurga ke pavan parv ki badhai .umda .

Babli said...

आपने बहुत ही सुंदर रूप से माँ के बारे में प्रस्तुत किया है! माँ के बारे में जितना भी कहा जाए कम है! माँ हमारे जीवन में एक महत्वपूर्ण स्थान रखती हैं! बहुत संघर्ष करती है माँ और उन्ही की वजह से हम जन्म लेते हैं! माँ और पिताजी दोनों ही भगवान समान है और उनका सम्मान हर किसीको करना चाहिए! नवरात्री की हार्दिक शुभकामनायें!
http://ek-jhalak-urmi-ki-kavitayen.blogspot.com

naveentyagi said...

sundar kavy rachna.

Mumukshh Ki Rachanain said...

माँ की ऐसी दुर्दशा बनाने वालों के संहार के लिए ही तो लोग "माँ' के पास मँगाने जाते हैं. पर वहां पहुँच कर न जाने क्या हो जाता है कि लोग अपनी सुख-सुविधाओं कि ही मांग कर बैठते हैं, शायद संहार का अभी उचित समय नहीं आया है, पाप का घडा अभी कुछ खली रह गया है................

अति विचारशील लेख.

नवरात्रि कि आपको हार्दिक शुभकामनाएं

चन्द्र मोहन गुप्त
जयपुर
www.cmgupta.blogspot.com

वाणी गीत said...

मां किसी ओहदे तक चली जाये ...सफलता की कितने पायदाने क्यूँ न चढ़ जाये ...अपने घर परिवार और बच्चों के लिए दिनप्रतिदिन त्याग करने वाली निपट साधारण माँ ही होती हैं
बहुत अच्छी रचना ...
नवरात्री की बहुत शुभकामनायें ..!!

kshama said...

Bahut dinon baad aapko padha aur laga kisee bade apne se baat kar rahee hun/sun rahee hun...ek shant sheetal pravaah bah raha hai..

k.r. billore said...

shobhanaji,,samay ke saath,parivesh badal gaye hai ,,aaj ki maa saptah me do baar bazar jaroor jati hai,,,aapki maa bisvi saddi ki hai ,,ekkisvi saddi ki maa per aaj aapke kya vichar hai,,,kamna mumbai

k.r. billore said...

shobhanaji,,samay ke saath,parivesh badal gaye hai ,,aaj ki maa saptah me do baar bazar jaroor jati hai,,,aapki maa bisvi saddi ki hai ,,ekkisvi saddi ki maa per aaj aapke kya vichar hai,,,kamna mumbai

Mrs. Asha Joglekar said...

Ma aaj chahe hawaee jahaj chalaa le jab apne bachchon kee bat aatee hai to use har tyag manjoor hai.

Rakesh said...

माँ ने कभी
नई साडी नही पहनी
क्योकि
बुआओ को
हर तीज त्योहारों पर
शगुन भेजना जरुरी होता था|
wah
sohbhnaji
bahut acha kaha
maa .....wakai maa .....maa ke bare jitna keho likho socho padho....kum hi hai
maa ......adhbhut rista hai ye....

अल्पना वर्मा said...

एक माँ का परिवार और संबंधों के प्रति निस्वार्थ समर्पण यही तो है...!