Thursday, September 24, 2009

अपनी बात

जैसे ही मै टेलर की दुकान पर गई देखा वहा चार पॉँच युवा कारीगरों के बीच एक वृध्ध महिला भी बड़ी तन्मयता से और फुर्ती से सिलाई मशीन पर अपना काम कर रही थी |मुझे थोडी हैरानी हुई क्योकि वृध्ध पुरूष टेलर को तो कई बार देखा ;है पर महिला वृद्ध टेलर पहली बार ही देखि; हो सकता है ? ? और जगहों पर काम करती हो, पर मैंने पहली बार देखा |मैंने टेलर मास्टर (महिला )जो की उस दुकान की मालिक भी लग रही थी और टेलर मास्टर भी है ;अपने कपडे दिए सिलने को और हिदायते भी दी बावजूद इसके की जैसे उनको सिलना है ? वैसे ही सीलेगी, और कभी भी समय पर नही देगी? जब तक दो या तीन बार उनकी दुका के चक्कर लगा ले |खैर मैंने उस वृध्ध महिला की तरफ देखा पार्वती !अम्मा जी हां यही नाम है उसका |उन्होंने भी जवाब में प्यारिसी मुस्कराहट दी |मै घर आकर सोचती रही? बिचारी पारवतीअम्मा को इस उमर में भी काम करना पड़ रहा है |देखने से तो कुछ समझ नही आता की उनकी आर्थिक स्थिति कैसी है ?क्योकि यहाँ बंगलौर में या चेन्नई में आप कपडो से अंदाजा नही लगा सकते की उनकी आर्थिक स्थिति कैसी है ?उत्तर भारत में आप आदमी ओरतो के कपड़े देखकर अंदाज लगा सकते है उनकी परिस्थिति का |हाँ अब ये बात अलग है की आजकल भले ही खाने को रुखा सुखा भी हो पर कपड़ो की शान में कोई समझौता नही ?
बार बार पारवती अम्मा का ही ख्याल आता रहा की कैसे दिन भर वो काम करती है ,शायद उसके बहु बेटे उसकी कोई मदद नही करते ?या शायद उसका कोई भी अपना नही है ?इसी उधेड़बुन में रही और मन में पक्का कर लिया अगली बार जब सिले हुए कपड़े लेने जाउंगी तब उससे बात करुँगी और यथासंभव उसकी मदद करुँगी |मन में हमेशा समाज सेवा का कीडा कुलबुलाता रहता है |अचानक मुझे हमारे एक रिश्तेदार का वाकया याद आया गया |एक बार वो इंदौर से खंडवा जा रहे थे सुबह -सुबह निकले थे साथ मेंऔर चार पॉँच लोग भी थे| चकाचक सफेद कुरता पायजामा कलफ लगा हुआ नेताओ कीतरह |रास्ते में बडवाह या सनावद में नाश्ता करने के लिए पोहे , समोसे चाय की दुकान पर गाड़ी रोकी |मध्य प्रदेश में सुबह सुबह नाश्ते में पोहे जलेबी और समोसों का प्रचलन है हरेक दुकान पर मिल जावेगे दुकाने छोटी छोटी ही रहेगी |पर उन जलेबी पोहो का कोई जवाब नही !
तो भाई साहब ने नाश्ता किया और उनकी निगाह दुकान के बहार प्लास्टिक की कुर्सी पर बैठे एक बुजुर्ग पर गई |उन्होंने सोचा चलो सुबह सुबह पुण्य कमा ले? और एक प्लेट पोहा और जलेबी अलग से मंगवाई और दुकान में काम करे वाले लडके को कहा -जा बेटा वो बाबा बैठे है ? उनको ये नाश्ता दे दे |
लड़का भाई साहब की तरफ अजीब निगाहों से देखने लगा ?
और जो लड़का जलेबी बना रहा था जो की उम्र में उससे बड़ा था उसकी और प्रश्न वाचक नजरो से देखने लगा |
भाई को कुछ समझ में नही रहा था उनका तो दिमाग चलने लगा एक तो भूखे को खाना खिलाओ और उनकी अकड तो देखो |
तब जलेबी बनाने वाला लड़का उठकर आया और भाई साहब को एक तरफ ले जाकर धीरे से उसने कहा-साहब वो बुजुर्ग ही इस दुकान के मालिक है |
अब भाई साहब को काटो तो खून नही |
ऐसा ही मुझे लगने लगा कही पारवती अम्मा भीतो दुकान की मालकिन निकल जावे फ़िर भी मैंने पूछ ही लिया और अम्मा कैसी है आप ?उन्होंने उसी मुस्कराहट के साथ फ़िर जवाब दिया -ठीक हूँ माँ ,और फ़िर अपने सहकर्मियों के साथ कन्नड़ में हंस हंस कर बाते कर अपना काम निबटाने लगी |मेरा भी समाज सेवा का फितूर धीरे धीरे हवा हो गया |मेरी सोच का रुख पलट गया |शायद वो अपना समय बिताने के लिए ये काम कर रही हो ? या फ़िर उसकी ये हाबी हो ?पर मन में ये कही तो था की वो जरूरत के लिए कर रही है ?फ़िर मुझे किसी की कही बात याद आई
'" जब तक कोई सलाह मांगे उसे सलाह मत दो "|इसी विचार की तर्ज पर मैंने भी अपने कंधे उचकाकर अपनी राह पकडी और मन ही मन कहा फटे में टांग अडाने की क्या जरूरत है |


usne
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11 टिप्पणियाँ:

Dr. Smt. ajit gupta said...

हम लेखक लोग सब जगह कोई कहानी ही ढूंढते हैं, इसीलिए ऐसा होता है। मैं तो पोहे की दुकान और दुकान मालिक को ही बेसहारा समझ पोहे खिलाने वाली बात पर बहुत देर तक हँसती रही। यही जीवन का सच है। हमारे यहाँ भी ऐसा ही होता है। जब मालिक वृद्ध हो जाता है तब वह ऐसे ही किसी कोने में बैठकर बेटों को दुकान चलाते देखते हैं। ऐसे वृद्ध आपको हर कहीं मिल जाएंगे। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि वे सुखी नहीं हैं। वे बेहद सुखी है बस अब त्‍याग की भूमिका में है। बेहद अच्‍छी पोस्‍ट, इसके लिए आपको बधाई।

राज भाटिय़ा said...

आप की यह कहानी पढ कर, मुझे भी एक सची कहानी याद आ गई, एक करोड कि किमत की कोठी की मालकिन, लाखो बेंक बेलेंस ओर दो दो बेटो की मां... अपने ही घर मै बिमारी की हालत मै अपने ही घर मै नोकरो की तरह से काम करे, बहूं के हुकम को सहे, एक बेटे को पता नही चला, जिसे पता था वो अपनी बीबी का गुलाम... ओर एक दिन सारे गम लिये मर गई.... ओर उस बेटे को कोई शर्म नही आई जो सब देख रहाथा....

डॉ टी एस दराल said...

जब तक कोई सलाह न मांगे उसे सलाह मत दो
बिलकुल सही कहा आपने.
वैसे ये राज़ तो राज़ ही रह गया और उत्सुकता भी बढ़ गयी की आखिर वो कौन थी.
मज़ेदार किस्सा सुनाया आपने.

k.r. billore said...

shobhanaji,,jab tak koi salah na mange mat dijiye,,,aur madad yaa daan to bilkul bhi nahi...kissa nahi ye to hakikat hai ,,,kamna mumbai

रचना त्रिपाठी said...

बहुत सच्ची बात है लेकिन कभी-कभी बहुत अच्छे कपड़े पहनने वाले बुजुर्ग भी अंदर से बहुत दुखी होते हैं। मैने भी देखा है छ: बेटे और करीब पच्चीस नाती-पोते,छ: बहुएं वाली बूढ़ी माँ पानी माँगते-माँगते मर गयी। यह पोल घर के छोटे बच्चों से खुली।

Nirmla Kapila said...

हमारे यहाँ तो अधिकतर औरतें टेलर का काम करती हैं प्रसंग बहुत अच्छा है। डा. गुपता जी सही कह रही हैं शुभकामनायें

Harkirat Haqeer said...

तब जलेबी बनाने वाला लड़का उठकर आया और भाई साहब को एक तरफ ले जाकर धीरे से उसने कहा-साहब वो बुजुर्ग ही इस दुकान के मालिक है |
अब भाई साहब को काटो तो खून नही |
ऐसा ही मुझे लगने लगा कही पारवती अम्मा भीतो दुकान की मालकिन न निकल जावे...

हा...हा...हा.... बहुत खूब शोभना जी ......!!

दिगम्बर नासवा said...

बिलकुल सही कहा आपने. .......जब तक कोई सलाह न मांगे उसे सलाह मत दो .......... आपका किसा रोचक है ...... लिखने की शाली भी जोरदार है .......

Babli said...

बहुत बढ़िया और बिल्कुल सठिक लिखा है आपने! बिना मांगे कभी भी किसीको सलाह देने की ज़रूरत नहीं और आज के ज़माने में तो लोगों की मदद करने से उल्टा ही आरोप लगाते हैं की आखिर हमनें उनकी मदद क्यूँ की!
विजयादशमी की हार्दिक शुभकामनायें!

sadhana said...

जब तक कोई सलाह न मांगे उसे सलाह मत दो
............... didi namste,
ye kahani aap biti lagi mujhe mere sath bhi kaibar ho chuka hai...

PN Subramanian said...

बहुत सुन्दर. MDH मसालों का टीवी पर विज्ञापन देखा ही होगा. समझ में नहीं आ रहा है की हमें आपका ब्लॉग मिलता क्यों ही नहीं है. ब्लोगवाणी को तो हम देखते ही हैं. हाँ पिछले एक माह के दौरान हम बाहर ही रहे और मौका नहीं मिला. क्षमा एवं आभार