Saturday, January 09, 2010

खोज

शुरू में जब ब्लॉग लिखना शुरू किया था तब उस समय जो विचार आये थे उन्हें कविता का रूप दे दिया था और शीर्षक पाठको पर छोड़ दिया था तब एकमात्र टिप्पणी आई थी और शीर्षक था" खोज "चूँकि अब टिप्पणियों का थोडा लालच आ गया है तो फिर से अपने ब्लॉग कि दूसरी पोस्ट "पोस्ट "कर रही हूँ जस कि तस |

एक
राहगीर अमराई में, आम ढूंड रहा था
एक शिक्षक कक्षा में, खास ढूंड रहा था
आम तो दलालों ने पकने रख दिए ,
और खास तो मोबाइल में व्यस्त हो गए|

एक मचुअरा तालाब में मछली ढूंड रहा था
एक पंडित मन्दिर में मूर्ति ढूंड रहा था,
तालाब की मछली ठेकेदार ले गए
और मन्दिर की मूर्ति विढेशी ले गए |

एक धार्मिक सत्संग में धर्म खोज रहा था
एक भूखा लंगर में रोटी ढूंढ़ रहा था
धर्म तो प्रवचन और कथाओं में गुम हो गया
रोटी तो चलते चलते दिल्ली पहुँच गई |

एक साधू जंगल में शान्ति ढूंढ़ रहा था
और मै टीवी समाचार में , समाचार खोज रही थी,
साधू की शान्ति तो पर्यटक ले गए
और मैं समाचार सुनकर मुर्छित हो गई||

आस्था ने बहुत सुंदर शीर्षक भेजा है
तो कविता का शीर्षक है ,
"खोज "
धन्यवाद आस्था

15 टिप्पणियाँ:

ज्ञानदत्त पाण्डेय Gyandutt Pandey said...

बहुत सुन्दर। सब कुछ ऑवर ग्लास से रेत की तरह निकल जाता है! यह जानना ही खोज है!

बस अगर पोस्ट बना ली तो पुन: रखी जा सकती है!

Priya said...

Ye khoz to kamaal hai

राज भाटिय़ा said...

एक साधू जंगल में शान्ति ढूंढ़ रहा था
और मै टीवी समाचार में , समाचार खोज रही थी,
साधू की शान्ति तो पर्यटक ले गए
और मैं समाचार सुनकर मुर्छित हो गई||
अरे वाह क्या बात है, एक सच को कविता का रुप देना आप से सीखे, बहुत ही सुंदर ओर आज का सच

Apanatva said...

Bahut acchee lagee aapakee ye khoj hum bhee naye naye blogger hai avsar mila aapakee rachana padane ka post karane ke liye dhanyvad.
vaise bhee kahate hai na OLD IS GOLD .

sangeeta swarup said...

खोज में कम से कम ये तो पता चल ही गया की क्या कहाँ गया? बहुत अच्छी कविता...सोचने पर मजबूर करती हुई....

बधाई

मनोज कुमार said...

यथार्थबोध के साथ कलात्मक जागरूकता भी स्पष्ट है।

Tej Pratap Singh said...

बहुत सुन्दर

अजय कुमार said...

अलग अंदाज में अच्छी रचना

निर्मला कपिला said...

एक अलग अन्दाज़ मे बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति है। इस खोज मे ही जिन्दगी निकल जाती है मगर खोज खत्म नहीं होती बधाई इस रचना के लिये ।

दिगम्बर नासवा said...

अलग अलग रूप मिलते हैं कविता के ......... आपने भी अच्छा प्रयोग किया है ......... अच्छी रचना है बहुत ..........

अमिताभ श्रीवास्तव said...

khoj hi to jeevan hota he...aour yah bhi khoob rahaa..blog khojate khojate kai saare log tippani dene lage...vese tippani kaa laalach naa rakhe to achha he.., isase lekhan me vyavdhaan aataa he.

प्रकाश पाखी said...

बहुत सुन्दर।
एक साधू जंगल में शान्ति ढूंढ़ रहा था
और मै टीवी समाचार में , समाचार खोज रही थी,
साधू की शान्ति तो पर्यटक ले गए
और मैं समाचार सुनकर मुर्छित हो गई||
बहुत अच्छी कविता.JO सोचने पर मजबूर करती HAI.
बधाई!

गौतम राजरिशी said...

ये आपकी पुरानी कविता शायद मिस हो गयी थी पहले हमसे....

हत विरोधाभासों को अनूठे तरीके से संजोये अपने अद्‍भुत बिम्बों के जरिये रची गयी एक बेमिसाल रचना मैम।

अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी said...

कतरा - कतरा मिटते की खोज एक ओर , व
बेहूदी खोज को ख़ोज समझना दूसरी तरफ ...
........ कुलमिलाकर अनुभव में पगी रचना , आभार ,,,

रचना दीक्षित said...

एक बहुत अच्छी कविता. बहुत नयापन लिए हुए,.हर एक बात नपी तुली और सधी हुई, सीधी बात.