Wednesday, January 06, 2010

कुछ यूँ भी .......

वक्त कि जुराबों में ,अनफिट रहे हम
पत्थरों के शहर में ,शीशा हुए हम|

खुदा कि खुदाई ,सहते रहे हम
पत्थरों को भगवान मान ,पूजते रहे हम|

उन सूनी और अँधेरी गलियों, कि क्या कहें
जब भीड़ भरी सडको पर , तनहा रहे हम|

अहसासों के आँगन में ,आवाज कि खामोशिया
चंदा कि चांदनी, में ढूंढते रहे हम|

सरपट दौडती जिदगी के , चोराहे पर
वक्त ही कहाँ नजरे मिलाने चुराने को दे पाए हम |

16 टिप्पणियाँ:

राज भाटिय़ा said...

खुदा कि खुदाई ,सहते रहे हम
पत्थरों को भगवान मान ,पूजते रहे हम|
बहुत सुंदर लगी आप की यह रचना

वाणी गीत said...

वक़्त की जुराबों में अनफिट रहे हम ...शिकवा है जिंदगी से ...!!
पत्रों को भगवान् मान पूजते रहते ही हैं हम...
आवाज की भी खामोशियाँ ....हाँ ...होती तो हैं .. खामोशियों में भी आवाज़ .
और सबसे आखिर अफ़सोस जिन्दगी ने इतना समय नहीं दिया की ऑंखें चुराते मिलते ..
बहुत कुछ समेटा है ...!!

दिगम्बर नासवा said...

उन सूनी और अँधेरी गलियों, कि क्या कहें
जब भीड़ भरी सडको पर , तनहा रहे हम



बहुत ही खूबसूरत शेर कहे हैं ........... ये मिस्रा तो बहुत पसंद आया ...........वक्त कि जुराबों में ,अनफिट रहे हम|

अजय कुमार said...

खुदा कि खुदाई ,सहते रहे हम
पत्थरों को भगवान मान ,पूजते रहे हम|

अच्छी रचना ,बधाई

sangeeta swarup said...

वक्त कि जुराबों में ,अनफिट रहे हम
पत्थरों के शहर में ,शीशा हुए हम|

बहुत खूब.....खूबसूरत ग़ज़ल ....सही शिकायतें की हैं....

रश्मि प्रभा... said...

उन सूनी और अँधेरी गलियों, कि क्या कहें
जब भीड़ भरी सडको पर , तनहा रहे हम|
.....waah

ज्ञानदत्त पाण्डेय Gyandutt Pandey said...

इतनी तेज चल रही है जिन्दगी कि हम पिछड़ते जा रहे हैं। और यह आपकी कविता तो वही अहसास पुख्ता कर रही है!

murar said...

इतनी तेज चल रही है जिन्दगी delhi ke jendage bhut taz ha koe aapna pan nhe

Kusum Thakur said...

"खुदा कि खुदाई ,सहते रहे हम
पत्थरों को भगवान मान ,पूजते रहे हम|"

बहुत ही सुन्दर रचना है !

निर्मला कपिला said...

न सूनी और अँधेरी गलियों, कि क्या कहें
जब भीड़ भरी सडको पर , तनहा रहे हम
वाह बहुत सुन्दर शुभकामनायें

मनोज कुमार said...

संवेदनशील रचना। बधाई।

kshama said...

अहसासों के आँगन में ,आवाज कि खामोशिया
चंदा कि चांदनी, में ढूंढते रहे हम|
kya baat hai!
खुदा कि खुदाई ,सहते रहे हम
पत्थरों को भगवान मान ,पूजते रहे हम|
Harek pankti dohraee ja sakti hai!

अल्पना वर्मा said...

'पत्थरों के शहर में ,शीशा हुए हम|'

'उन सूनी और अँधेरी गलियों, कि क्या कहें
जब भीड़ भरी सडको पर , तनहा रहे हम|'

वाह!
बहुत ही बढ़िया शेर कहे हैं!
बहुत अच्छे ख्याल हैं.

Tej P Singh said...

बहुत सुन्दर
आप की रचना हमेशा अच्छी होती हैं

रचना दीक्षित said...

वक्त कि जुराबों में ,अनफिट रहे हम
पत्थरों के शहर में ,शीशा हुए हम|

खुदा कि खुदाई ,सहते रहे हम
पत्थरों को भगवान मान ,पूजते रहे हम|

बहुत सुंदर भाव जीवन का एक कठोर सत्य

अमिताभ श्रीवास्तव said...

are aap gazal bhi likh rahi he..bahut khoob..
वक्त कि जुराबों में ,अनफिट रहे हम
पत्थरों के शहर में ,शीशा हुए हम|...
sach hi to he...
उन सूनी और अँधेरी गलियों, कि क्या कहें
जब भीड़ भरी सडको पर , तनहा रहे हम|
ye dono she'r bahut achhe lage.