Wednesday, December 01, 2010

दर्शन

वो मोर मुकुट वाला
आँखों में शरारत लिए
मेरे सम्मुख खड़ा है
मै उसे निहारती |

उसके होठो से लगी
मुरली की तान सुनकर
जीवंत होती
या कि अपनी
सुध बुध खो देती |


मेरी कल्पना है
या ,आभास
उसमे डूबती उतरती
परमानन्द को पाती |

मेरी कामना हो पूरी
ये आकांक्षा नहीं
सदा मै
तुम्हे पुकारू
ये आकांक्षा
रहे मेरी |

19 टिप्पणियाँ:

माधव( Madhav) said...

sundar

वाणी गीत said...

मेरी कल्पना है
या ,आभास
वो मोर मुकुट बंसी वाला ...सामने खड़ा उसे निहारती ...

गदगद हुए ...
बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति ...

प्रवीण पाण्डेय said...

मुरलीधारी मधुर मनोहर।

shikha varshney said...

बहुत पावन सुन्दर सी रचना.

वन्दना said...

सदा मै
तुम्हे पुकारू
ये आकांक्षा
रहे मेरी |
बस यही आकांक्षा बनी रहनी चाहिये…………भक्ति रस से ओत-प्रोत रचना।

अपर्णा "पलाश" said...

ईश्वर आपकी आकांक्षाओ और कामनाओ दोनो को पूरा करे।
सच्ची भक्ति पूर्ण रचना

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

बहुत सुन्दर ..

जयकृष्ण राय तुषार said...

behad sundar kavita badhai shobhnaji

वन्दना said...

आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
प्रस्तुति कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
कल (2/12/2010) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
अवगत कराइयेगा।
http://charchamanch.blogspot.com

Manoj K said...

मुरली वाले की बात ही कुछ और है ...

निराला है कृष्ण

मनोज खत्री
---
यूनिवर्सिटी का टीचर'स हॉस्टल - अंतिम भाग

rashmi ravija said...

मेरी कल्पना है
या ,आभास
उसमे डूबती उतरती
परमानन्द को पाती |
बिलकुल भाव-विभोर कर देने वाली रचना

रचना दीक्षित said...

बहुत सुन्दर भक्ति रस से ओत-प्रोत रचना।

डॉ॰ मोनिका शर्मा said...

उसके होठो से लगी
मुरली की तान सुनकर
जीवंत होती
या कि अपनी
सुध बुध खो देती |
बहुत ही सुंदर स्तुति..... मनोहारी रचना

ZEAL said...

.

श्रीकृष्ण चिंतन और मुरली की धुन में ही जगत की समस्त समस्यायों का हल है। इश्वर आपको खुशियाँ और मन का सुकून दे। इस बेहतरीन प्रस्तुति के लिए आपका आभार।

.

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार said...

आदरणीया शोभना चौरे जी
प्रणाम !


कृष्ण-भक्ति और प्रेम की बहुत सुंदर अभिव्यक्ति आपने अपनी रचना के माध्यम से पहुंचाई है … आभार !

मेरी कामना हो पूरी
ये आकांक्षा नहीं
सदा मै
तुम्हे पुकारू
ये आकांक्षा
रहे मेरी


सच है , प्रेम प्रत्युत्तर में कुछ मांगता नहीं … प्रेम करते रहना ही चाहता है सच्चा प्रेमी !


कृष्ण-प्रेम में लिखी मेरी एक ग़ज़ल का एक शे'र और फिर मतला आपको सादर समर्पित कर रहा हूं -
वो तब भी सबसे दूर था , वो अब भी पास है
काइम जहां में उसकी ही ज़ादूगरी रही

उस मोरपांख वाले से दीवानगी रही
उसकी ही बंदगी में ज़िंदगी मेरी रही

सादर शुभकामनाओं सहित
- राजेन्द्र स्वर्णकार

Kailash C Sharma said...

मेरी कामना हो पूरी
ये आकांक्षा नहीं
सदा मै
तुम्हे पुकारू
ये आकांक्षा
रहे मेरी ...

यह आकांक्षा पूरी होना ही जीवन की उपलब्धि है..बहुत सुन्दर भक्तिपूर्ण रचना...आभार

आशीष/ ਆਸ਼ੀਸ਼ / ASHISH said...

शोभना माँ,
सुन्दर चित्रण,
जय श्री कृष्ण.
आशीष
---
नौकरी इज़ नौकरी!

कविता रावत said...

मेरी कामना हो पूरी
ये आकांक्षा नहीं
सदा मै
तुम्हे पुकारू
ये आकांक्षा
रहे मेरी |
....man ke sachhe udgaar...
saparpit bhakti ka sundar roop... man ko bahut achha laga..

kshama said...

मेरी कल्पना है
या ,आभास
उसमे डूबती उतरती
परमानन्द को पाती |
Kaisi awastha hogi ye bhee!