Wednesday, July 06, 2011

"बस यू ही "

दुकानों की,
लम्बी कतार के बीच
मेरा मकान
कहीं खो गया है |
जाना पहचाना था
सबका
आज अजनबी हो गया है |

गगन चुम्बी इमारतों
की नीरवता
के समक्ष
खंडहर भी वाचाल
हो गया है |

सुना है ?
आलीशान फ़्लैट के
मालिक होकर भी
दो गज
"ज़मीन" की
तमन्ना रखते हो ?

17 टिप्पणियाँ:

चला बिहारी ब्लॉगर बनने said...

शोभना दी!
बहुत ही गहरी बात कही है आपने.. आज तो संस्मरण से दर्शन की बातें कह दीं आपने!!बहुत अच्छी!!

shikha varshney said...

बहुत कुछ कह गईं आपकी पंक्तियाँ.

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

आज की फ़्लैट संस्कृति पर कहती आपकी रचना अच्छी लगी

अल्पना वर्मा said...

गगन चुम्बी इमारतों
की नीरवता
के समक्ष
खंडहर भी वाचाल
हो गया है |
--कविता में यह नया ख्याल अच्छा लगा .

kshama said...

सुना है ?
आलीशान फ़्लैट के
मालिक होकर भी
दो गज
"ज़मीन" की
तमन्ना रखते हो ?
Yahee to vidambana hai! Baat to bahut gahari hai!

डॉ॰ मोनिका शर्मा said...

सुना है ?
आलीशान फ़्लैट के
मालिक होकर भी
दो गज
"ज़मीन" की
तमन्ना रखते हो ?

Behtreen .... Gahan Abhivykti

प्रवीण पाण्डेय said...

अधिकार जताती दुनिया में, सबको मिलना आकार वही।

वाणी गीत said...

एक ही सीढ़ी चढ़ चले राजा रंक फ़कीर ....
सबकी गति एक समान ही है , वही दो गज जमीन ...
मगर फिर भी ??

वन्दना said...

बेहद गहन और सटीक अभिव्यक्ति।

नीरज गोस्वामी said...

वाह...यथार्थ के करीब इस रचना के लिए बधाई...
नीरज

अजय कुमार said...

जब जमीन ही नहीं होगी तो,दो गज जमीन कैसे मिलेगा ?

sushma 'आहुति' said...

बहुत गहरी बात कही अपने....

दिगम्बर नासवा said...

सच है दो गज ज़मीन तो सभी को चाहिए ... पर जब सब सब इच्छाएं खत्म हो जाएँ तब ..

कविता रावत said...

सुना है ?
आलीशान फ़्लैट के
मालिक होकर भी
दो गज
"ज़मीन" की
तमन्ना रखते हो ?

..sab kuch yahi to dhra rah jaata hai...
bahut hi gahan arthpurn prastuti hetu aabhar!

ZEAL said...

नए-नए मकान और उसमें रहती मशीनीकृत मानवों के लिए अपने ही घर अनजान होते जा रहे हैं !

anita agarwal said...

pehli baar aapke blog mei ayi hoon... mere blog ka naam "ABHIVYAKTI' hai..to bus ye dekh ke achambhit reh gayi ki 4-6 logon ke blog ka title bhi yahi hai... yahan aa ker apki rachna padhne ko mili, bahut achha laga khas kerke ye panktiyan....

गगन चुम्बी इमारतों
की नीरवता
के समक्ष
खंडहर भी वाचाल
हो गया है |

kabhi hame bhi aa ker darshan dein..

संजय भास्कर said...

बेहद गहन अभिव्यक्ति।