Thursday, August 11, 2011

कभी कभी ......





बहुत सारे आहार है
फिर भी
निराहार
महसूस होती
जिन्दगी|

बहुत सारे आधार है
फिर भी
निराधार
महसूस होती
जिन्दगी |


जब अटे पड़े है
बाजार
कपड़ो से
फिर भी
जार जार
महसूस होती
जिन्दगी |

समुन्दर के किनारे
शिद्दत से
प्यास को
महसूस
करती है ज़िदगी |



19 टिप्पणियाँ:

kshama said...

kYa kamaal kaa likha hai....sach,zindagee bhee ek pahelee hee hai....

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

बहुत गज़ब की बातें लिखी है

समुन्दर के किनारे
शिद्दत से
प्यास को
महसूस
करती है ज़िदगी |

बहुत सुन्दर ..

डॉ॰ मोनिका शर्मा said...

बहुत सारे आधार है
फिर भी
निराधार
महसूस होती
जिन्दगी ...

सच में......

अजय कुमार said...

जिंदगी पर सुंदर पंक्तियां

मनोज कुमार said...

आज इस पावन पर्व के अवसर पर बधाई देता हूं और कामना करता हूं कि आपकी कलाई पर बंधा रक्षा सूत्र हर समय आपकी रक्षा करें।

ज्योति सिंह said...

समुन्दर के किनारे
शिद्दत से
प्यास को
महसूस
करती है ज़िदगी |
bahut hi achchha likha hai ,rakhi parv ki badhai aapko

प्रवीण पाण्डेय said...

अजब सी प्यास है जिन्दगी।

रचना दीक्षित said...

कमाल लिखा है शोभना जी, बहुत सुंदर.

स्वतंत्रता दिवस और रक्षाबंधन की आपको बहुत बहुत शुभकामनायें.

वन्दना अवस्थी दुबे said...

बहुत सारे आधार है
फिर भी
निराधार
महसूस होती
जिन्दगी |
शोभना जी, बहुत सुंदर.

k.r. billore said...

Sadhuvad ,,,bharpur jindagi me bhi dhundti hai thodisi sachmuch ki jindagi ,,,lamhe lamhe me ho jindadil jindagi-----bhulo kuch pal kabhi ho gai ho udaas zindgi,,,,,,Kamna Billore

तेजवानी गिरधर said...

बहुत सुन्दर

सतीश सक्सेना said...

जन्माष्टमी की शुभकामनायें स्वीकार करें !

Ojaswi Kaushal said...

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ZEAL said...

समुन्दर के किनारे
शिद्दत से
प्यास को
महसूस
करती है ज़िदगी |....

Great expression Shobhna ji!

.

गिरिजा कुलश्रेष्ठ said...

कमाल की कविता ।

Anonymous said...
This comment has been removed by a blog administrator.
Rajey Sha राजे_शा said...

Sahi kaha "adhoorapan" to hamesha hi rahta hai..
Kavita Ka Vishay

AARUNI said...

I could not see the poet within you.It is spring up surorisingly like FLOWERS OF ASHOKA TREE.I am amazed with its smell. arun puranik.

प्रवीण पाण्डेय said...

मन के शान्त निनाद को शब्दों में उतार दिया आपने, अद्भुत पंक्तियाँ..