Thursday, January 01, 2009

नव वर्ष का आगमन

कंटीली झाडियों सा वक्त,

पथरीले रस्ते सा वक्त ,
सूर्यास्त और पतझड़ सा वक्त ,
फिरकनी सा घुमाता हुआ वक्त ,
खुशी में भी टीस देता हुआ वक्त
अपनों को अपने से तोड़ता वक्त ,
गीली टहनी सा झुका हुआ वक्त
इस बेरहम वक्त से संघर्ष करता हुआ ,
गुलाब की कलियों से महकता सूर्योदय
का समय
सीधी सी पगडण्डी के किनारों पर
सजीला बहारो का समय
शांत झील सा सुंदर समय
लकड़ी के गठ्हर सा दुसरोको ,
को अपने से जोड़ता सुखद समय
इसी मेहरबान समय के साथ
नव वर्ष की बधाई एवम शुभकामनाये .

Sunday, November 16, 2008

आज का विचार

क्रिक्रेट हमारा' धर्म '|
रियलिटी शो हमारा 'अर्थ'|
स्वछंदता हमारा 'काम'|
और भगवा हमारा" मोक्ष "

Tuesday, November 04, 2008

ऐसा क्यो होता है

ऐसा क्यो होता है ?
जंहा' फूल तोड़ना मना है '
'लिखा है '
वही पर सबसे ज्यादा फूल तोड़ते है |
जहा' नो पार्किंग 'होती है ,
वंही "विशेष "गाडिया खड़ी होती है |
जहा' धुम्रपान 'वर्जित है ,
वही "सूटेड बूटेड "
धुएं के छल्ले उडाते देखे जाते है |
जहा कचरा फेकाना मना है ,
वही पर
पोलिथिनो में बांधकर कचरा फेकते है
"कैन में पेट्रोल ले जाना मना है ,
वही पेट्रोल पम्प पर धड़ल्ले से
कैन भरी देखि जा सकती है |
हम कौनसी भाषा समझते है ,या की
समझनाही नही चाहते
मन्दिर की शान्ति को सराहते है ,
परन्तु
जूतों कीगंदगी
वहा फैला ही आते है
आप ही बताये
ऐसा क्यों होता है |

Wednesday, October 15, 2008

रंग

रिश्तो के अहसास ,बताने से नही होते
उनकी महक महसूस की जाती है |
फूलो की खुशबूआनंद देती है
नाम उसको सार्थक करता है |
नाम उसके रंगों की खोज करता है ,
कोई रंग सुकून देता है ,कोई आभास भर देता है |
रंगों के नाम किसने दिए ?
शायद अहसासों ,आभासों और विश्वासों ने ?
और सचमुच ये अहसास ही जीवन को पूर्ण कर गये |

Saturday, October 04, 2008

कैसी पूजा ?कैसी संस्क्रती ?कैसी श्रद्धा ?


मन्दिरों में बेहिसाब चढावा ,
तीस से .मी .की करोडो "चुननिया ?
करोडो के पंडालों में ,थिरकते ,लाखो लोग |
विदेशो में पूजा में ,
पारम्परिक भारतीय पहनावा ,
भारत में 'आरतियों 'में
वेदेशी पहनावा |
शर्धा ऐसी की
बुढे माँ= बाप
तरसते है सहारे को ,
और मन्दिरों मे ,जुता स्टेंड पर ,
"सेवा "देकर धार्मिक" शर्धा ",से
ओतप्रोत है श्रद्धालु |

'बेठे ठाले '

व्यस्तताओ का बहाना बनाकर ,
अपनों से दूर होते जा रहे है हम लोग |
समय न होने पर भी ,
"बिग बॉस "के निठ्लो को देखकर ,निठ्ले
होते जा रहे है हम लोग |

Friday, October 03, 2008

''समझ''


अपनी  महत्वाकांक्षाओं  को ,
अपना ज्ञान बनाने की भूल कर बैठता है आदमी |
और अपनी इस समझ से ,
सदा दुखी होता रहता है आदमी |

Sunday, September 21, 2008

जाग्रत

जीवन के नेराश्य को
जिसने मुझे मुखरित किया
उन क्षणों को ,जिसने मुझे वाणी दी
आत्मप्रशंसा के अभिमान से निवर्त होकर
आत्म विश्वास दीर्घजीवी हो
परिभाषित जिन्दगी की आकांक्षा नही,
ब्व्न्द्रोमे झुझ्ती भावनाए
शोषित होती कल्पनाये ,
गिरकर उठने का साहस ,
एक अहसास दे गया |

Friday, September 19, 2008

कुछ क्षनिकाए


"आकाश और जमीन"

आकाश की उचाईयो छूने के बाद
सारा जहा मेरा अपना हो गया है
और जमीन से जुड़े रहने की चाह में
मुझसे मेरे अपने जुदा हो गये है

"नीड"
पराये आशियाने में अपना नीड कहा
पराये दर्दो में अपनी पीर कहा
अब तक तो जिए बेखोफ जिन्दगी ,
अब मरने को दो गज जमीन कहा

मंजिल

जिन्दगी से निराश कुछ नवयुवको को देखकर सन२००० मेंयह कविता लिखी थी

तुझे पाने की चाह में ,
अपनी मासूमियत खो बैठे हम |
तेरे नजदीक पहुंचते पहुंचते ,
अपनी इंसानियत खो बैठे हम |
हम भी थे स्कूल के अच्छे बच्चे ,
माँ के सानिध्य में सुस्न्स्कारो में,
प्ले दुलारे |
पिता की आशाओ के तारे
तेरी पथरीली ने प्गदंदियो ने
लहुलुहान कर दिया
तेरी राह के कटीले तारो ने ,
हमे छलनी कर दिया |
निकले थे तुझे खोजने सुंदर से
शहर में,
किंतु
तेरी दम तोड़ती व्यवस्थाओ और
हमरी म्ह्त्वाकंक्षाओ ने
हमे बियाबान दे दिया |