Wednesday, June 17, 2009

ब्लॉग की परिभाषा

मेरा लगातार कंप्यूटर के साथ बैठना मेरी सासु माँ को बैचेन कर देता है ,वो मुझे लगातार देखती रहती है |बहुत कुछ बोलने का प्रयत्न करती है परन्तु मेरी पिछली करतूतों के कारण वो मुझे कुछ कह नही पाती है |
दरअसल जब मै कुछ कचरा बीनने वालो बच्चो को ,गाँव से आए मजदूरों के बच्चो को अपने घर के आँगन में पढाती थी तो उन्हें शुरू में तो अच्छा लगा पर रोज रोज का यह मेरा तीन घंटे तक व्यस्त रहना उन्हें नागवार गुजरा |उन्हें लगता बेकार ही मै माथा पच्ची करती हुँ उन बच्चो के साथ ,क्योकि उनकी हार्दिक इच्छा थी की ,मै कोई स्कूल में मास्टरनी होती तो? कम से कम घर में तनखा तो आती?उन्हें मेरे ये फोकट के कामो से बडी खीज होती |
एक बार तो मै किसी काम से ऊपर के कमरे में थी तो उन्होंने बाहर से बच्चो को भगा दिया, और कह दिया तुम्हारी दीदी आज बीमार है |मै अपने समय से नीचे आई तो देखा बच्चे गायब ?|
मै बच्चो की एक दिन की भी छुट्टी नही करती ,क्योकि उनका एक दिन चार दिन तक चलता रहता और फ़िर वही से शुरू करना होता है जहा से शुभारंभ हुआ रहता है ?जैसे तैसे बच्चो को फ़िर से इकट्ठा किया |सासु माँ की आगया के विरुद्ध काम करने के लिए उनसे माफ़ी माग ली |
तब बडी मासूमियत से कहने लगी -बहू मैंने तो तुम्हारी भलाई के लिए ही उनकी छुट्टी की तुम इतनी भाग दौड़ करके घर का
काम करके थक जाती हो इसीलिए मैंने सोचा आज तुम आराम कर लो |
एक साँस की अपनी अपनी बहू के लिए सकरात्मक सोच |
मेरी सासू माँ का सपूर्ण जीवन गाँव में ही बीता ,कभी वो कोई स्कूल में पढ़ने नही गई कितु सीखने की ललक ने उन्हें रामायण गीता पढना सीखा दिया जब शादी कोकर वो ससुराल आई तो ससुरजी मास्टर थे और अपनी छोटी बहन को घर पर ही पढाते थे| बस उन्होंने भी घर का काम करते करते मन ही मन अक्षरों को जोड़ना और किताबे तो थी ही , उन्हें खाली समय में बैठकर पढना सीख लिया |आज भी अपनी ८० साल की उम्र में अनवरत रामायण सुंदर कांड का पाठ और धार्मिक पुस्तके पढ़ती रहती है हांलाकि उनकी गति काफी धीमी होती है पर उन्होंने पढ़ना नही छोड़ा |
जब से मुझे कंप्यूटर पर लिखते पढ़ते देखती है .साथ ही गाना सुनते देखती है उन्हें लगता है मैंने फ़िर से कोई नई माथा पच्ची का रोग लगा लिया है ,अब ब्लॉग पढो तो देर तो लगती ही है ?प्याज के छिलकों की तरह एक ब्लॉग पढो और उस पर टिप्पणी दो तो दूसरा ब्लॉग आकर्षित कर लेता है और ये सिलसिला चलता ही रहता है बशर्ते बिजली देवी की क्रपा हो तब तक ?
वो हमेशा पढ़ते हुए मेरे मनोभावों को देखती रहती |जब मै कागज पर लिखती तो उनको लगता मै क्या पन्ने भरती रहती हू ?कभी कोई अख़बार या पत्रिका में (भूले भटके )कविता या लेख छपते ;तो उनका ये प्रश्न अवश्य होता -कुछ दक्षिणा वक्षिना भी देते है या ऐसे ही छपते रहते है ?तुम इतनी मेहनत करती हो ?
और मुझे ये लगने लगा है की अभी ये मुझसे कहेगी- मुझे भी कंप्यूटर पर पढना सिखा दो ?
आज भी उनकी हर चीज सीखने की प्रबल इच्छा रहती है !
मेरे पतिदेव रामदेव बाबा का योग टी वि पर देखकर करते है तो वो भी सोफे पर बैठे बैठे प्राणायाम करना सीख गई है वैसे वो ख़ुद ही इतनी करिशील और स्वस्थ है की उन्हें कोई योग की जरुरत नही है |
ब्लॉग पढ़ने की बात जब शाम को अपने बहु बेटे से चर्चा करती तो ब्लॉग शब्द का बार बार प्रयोग होता तब वे सोचती पता नही?ये ब्लॉग क्या चीज है ?मै भी पहले जानती नही थी ,वो तो भला हो मेरी बहु का जिसने ब्लॉग से मेरा परिचय करवाया (हालाँकि अभी भी मुझे कोई तकनिकी जानकारी नही है सिर्फ़ ब्लॉग पढना और टिप्पणी करना ही आता है )वरना मै भी सोचती ही रहती की ब्लॉग क्या बला है ?
आज तो उन्होंने मुझसे कह ही दिया- अच्छा बताओ ?तुम क्या पढ़ती हो?लिखती हो ?
मैंने भी सोचा जब मेरी बहू ने मुझे प्रशिक्षित किया है ,तो मेरा भी फर्ज है उन्हें बताऊ ?
तब मैंने अपनी एक कविता निकाली और कहा पढिये |
ये कविता ?उन्होंने पढ़कर कहा -ठीक ही है| और नाक पर आए चश्मे को थोड़ा खस्काकर कहा -ये टिप्पणी का क्या मतलब होता है?
मैंने कहा-कविता या लेख पढ़कर अपनी राय दीजिये |मैंने उन्हें सारी (सिर्फ़ चार या पॉँच )टिप्पणी जिसमे दो का तो मैंने ख़ुद ही जवाब दिया था पढ़कर सुना दी -जिसमे लिखा था -"बहुत खूब ""अति सुंदर ""मार्मिक कविता "आदि आदि |
तो वे तपाक से बोली -अरे ये तो कवि सम्मलेन के जैसे ही हुआ न?
कविता समझ में आवे न आवे ?अच्छी लगे न लगे ?पर मंच पर बैठे कवि "कविता "पढ़ने वाले कवि की कविता सुने या न सुने ?परन्तु कविता की हर पंक्ति के बाद वाह - वाह जरुर कहते है |
ऐसे ही तो तुम्हारे ब्लॉग पर भी होता है? और क्या?
ये कोनसी बडी बात है ?
इसे ही ब्लॉग कहते है क्या?

18 टिप्पणियाँ:

अमिताभ श्रीवास्तव said...

ha ha ha/
vah, saas ka dharm aour bahu ka karm//
shobhnaji, blog puran sirf itna hi nahi hota/ aour kaam jisme pesa mile vo hi kaam nahi hota//kuchh hota he jo sirf apna hota he, ekdam nizi//kuchh hota he jisme ham apna samay vyay karke bhi tasalli paate he, kuchh hota he jisme hamaaraa dil shbdo ke madhyam se aawaaz deta he, kuchh hota he jo sakaratmak hota he// kuchh hota he jise ham apnaa kah sakte he/// ese hi kuchho se milkar banane vaalaa bahut kuchh jivan ka sabse bdaa uphaar hotaa he// saas nahi samjhengi// saas samjh bhi le to swikaar nahi karegi// kyuki saas bhi kabhi bahu thi/////

शोभना चौरे said...

amitabhji
dhnywad
aap man ke marm ko bkhubi smjhte hai
maine jabse blog ki dniya me prvesh kiya hai pustke pdhna lgbhag chut gya hai halaki ye bhi theek nhi hai .parntu blogs pdhne se hmara seedha savad ho jata hai aur anek prkar kisahity smaz ki jankari mil jati hai aur aapjaise logo ka margdarshan.
dhnywad
shobhana

venus kesari said...

कविता समझ में आवे न आवे ?अच्छी लगे न लगे ?पर मंच पर बैठे कवि "कविता "पढ़ने वाले कवि की कविता सुने या न सुने ?परन्तु कविता की हर पंक्ति के बाद वाह - वाह जरुर कहते है |
ऐसे ही तो तुम्हारे ब्लॉग पर भी होता है? और क्या?
ये कोनसी बडी बात है ?
इसे ही ब्लॉग कहते है क्या?


ये तो बात बात में आपने ब्लॉग के लिए बड़ा भारी व्यंग लिख दिया
वीनस केसरी

mark rai said...

sahi likha 100% correct...
aap aajkal dikhti nahi....kahi koi galti to mujhse nahi ho gayi....anyway aapko time nahi milta hoga...

दिगम्बर नासवा said...

सत्य........... चाहे आप इसे व्यंग कहें या सासू जी के कहे शब्द................. पर सच तो येही है, पर क्या करें ये सत्य अब अच्छा भी तो लगता है............ आप अपने दिल से पूछ कर बताएं ?

abhivyakti said...

शोभना जी,
बहुत सहजता से सत्य लिख दिया...पढ़ कर अच्छा लगा.वैसे ब्लॉग आपकी सृजनात्मकता का सहायक उपकरण भी है...जरा याद कीजिये हमने वर्षों पहले न जाने कितनी कवितायेँ -रचनाए अलग अलग पन्नों पर लिख कर खो दी..आज ब्लॉग पर लिख कर उन्हें सहेज कर रख सकते है...

मुकेश कुमार तिवारी said...

शोभना जी,

सबसे पहले तो आपका आभार "कवितायन" पर पधारने और अपनी टिप्पणी देने का।

ब्लॉग को परिभाषित करते हुये आपने होनी वाली तमाम बातों को हर पहलुओं पर छुआ है कतिपय को बेनकाब भी किया है। सासूमाँ के कटाक्ष का संज्ञान लिया जाये तो उन्होंने भोले शब्दों में सबकी पीड़ा व्यथा को उधेड़ कर रख दिया है।

सुन्दर, सार्थक तीखा व्यंग्य।

आपकी कविता पढी है, उसके मर्म तक जाना अभी बाकि है, शेष जल्दी ही।

सादर,

मुकेश कुमार तिवारी

ज्योति सिंह said...

bewak aur satya likhi hai aap .dilchasp rachana aur aap khud bhi dilchasp lagati hai .sabke vichar dekhi magar baat yahan samjhane se jyada apno ke samjhane ki ,jahan hum maat kha jaate hai .har shaks apno se hi haarata hai .wahan koi salah kaam nahi aati .siwaye virodh ke .

M VERMA said...

आपकी सासू मा को मेरा सलाम. आपके प्रति उनकी सह-अनुभूति जिसके तहत वे बच्चो को भगा दी – वाह गर्व करिये ऐसी सासू मा पर.
बहुत अच्छी अभिव्यक्ति

रंजना [रंजू भाटिया] said...

:) इसे ही ब्लाग कहते हैं क्या ..सही कहा बहुत अच्छी सासू माँ हैं आपकी . बरबस एक मुस्कान आ गयी इसको पढ़ते हुए अच्छा लगा ब्लॉग को इस नजरिये से पढना .शुक्रिया

Babli said...

आपने इतना सुंदर लिखा है कि कहने के लिए अल्फाज़ कम पर गए! बेहद ख़ूबसूरत अभिव्यक्ति है! आप जैसे महान लेखिका को मैं सिर्फ़ इतना कहूँगी कि आपकी लेखनी को सलाम! मुझे बेहद पसंद आया!

अल्पना वर्मा said...

शोभना जी ,ब्लॉग की दुनिया ही ऐसी है..मुझे तो अच्छी हिंदी किताबें पढ़े अरसा हो गया क्यों की उपलब्ध ही नहीं है.सो हिंदी पढने लिखने की क्षुधा को यह अंतर्जाल ही तृप्त करती है..और ब्लॉग पढ़ कर विभिन्न विचारों से भेंट हो पाती है.
आप की सासू माँ तो सच में बहुत अच्छी हैं.खुशनसीब हैं आप ,जो बड़े बुजर्गों का साथ है.
मुझे तो ब्लॉग जगत ने बहुत कुछ सिखाया है ,यहाँ सब तरह के लोग हैं अच्छे भी और बुरे भी...बस खुद तय करना है कि किन का साथ रखें किन से बचें.

woyaadein said...

ठीक यही प्रश्न एक बार मेरे सर ने मुझसे भी किया था जब उन्होनें मुझे ब्लॉग पढ़ते देखा था.......बोले ये क्या बकवास लगाये रखते हो, यूं ही एक-दूसरे की तारीफ़ किये जाते हो, बहुत अच्छा, मज़ा आ गया, उम्दा...वगैरह-वगैरह......सब ढकोसला है.....मगर एक बात जो मैं उन्हें उस दिन नहीं कह पाया था वो ये है कि जिस तरह बिना पानी में उतरे उसकी गहराई पता नहीं चलती, ठीक उसी तरह ब्लोगिंग भी है.....बिना ब्लोगिंग में उतरे इसके बारे में कोई टीका-टिप्पणी करना ठीक नहीं....और फ़िर बन्दर क्या जाने अदरक का स्वाद वाली कहावत तो आप सबने सुनी ही होगी..... :-)

साभार
हमसफ़र यादों का.......

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

माता जी की बात सही है।
मुफ्त में वाह-वाही लूटने
का उचित माध्यम ब्लॉगिंग
ही तो है।

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

शोभना जी,
माता जी का भी एक ब्लॉग शुरू करवा दीजिये, फिर देखिये टिप्पणियों के बारे में उनका नजरिया कितना सकारात्मक होता है. [कृपया यह टिप्पणी उन्हें न पढ़वायें!]

रचना त्रिपाठी said...

मजा आ गया। पहली बार आप के ब्लॉग पर आयी हूँ। बहुत अच्छा लिखती हैं आप। आपने सासू माँ का अच्छा वर्णन किया है। काश सभी सासें ऐसी सकारात्मक सोच वाली हो जातीं। उन्हें प्रणाम और आपको बधाई।

राज भाटिय़ा said...

शोभना चौरे जी, आप ने अच्छी परिभाषा बताई, ओर हम सब को बहुत अच्छा लगा, आप का सासू मां को समझाना, ओर उन के बारे बतलाना, आप की बातो से सम्मन झ्लकता है, ओर आप की सासू मां की बातो से प्यार,काश सब को मिले ऎसी सासू मां , ओर ऎसी बहू,
बच्चो को भगाना, पेसे का पूछना इन सब बातो मै लालच नही एक प्यार झलकता है ओर जिसे सभी नही समझ सकती,
बहुत सुंदर ढंग से आप ने लिखा, ओर पता ही नही लगा कब आप का लेख खत्म हो गया.
धन्यवाद

गौतम राजरिशी said...

अपनी सासु माँ के जरिये आपने अपने इस प्यारे हिंदी ब्लौग-जगत की पूरी सही-सही तस्वीर उकेर कर रख दिया....

बहुत खूब!