Wednesday, June 03, 2009

अपनी बात

मन में कई विचार आते ही ,पर कई बार मै उनको apasमें जोड़ नही पाती , और वे विचार दिमाग से भी हटना ही नही चाहते
न ही कविता बनती ही नही कोई लेख बस दो लाइन पर ही अटक जाती हुँ |
सोचा आप सबसे ये दो लाइने बाँट लू ;

शातिरों की बस्ती में ,बस गये हम|
जैसे मुखोटो के बाज़ार में आ गये हम

5 टिप्पणियाँ:

रश्मि प्रभा... said...

सही कहा शोभना इ आपने,कई बार ऐसा होता है,शब्द रूप नहीं ले पाते, भावनाओं की आँधियाँ उन्हें इधर-उधर कर देती है,पर जिन्हें आपने पकड़ लिया,वह बहुत अच्छे हैं.....

शोभा said...

जिन्दगी साथ है तो
मौत की तलब है |

मौत की दस्तक है
तो जिन्दगी की तलब है ................................
bahut sahi likha hai . yahi jeevan hai.

Babli said...

बिल्कुल सही फ़रमाया आपने! यही तो ज़िन्दगी का दस्तूर है!

仔仔 said...
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水煎包amber said...
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