Thursday, January 13, 2011

"एक चुटकी प्रयास "2

स्वामी विवेकानंद के विचार प्रवाह की इस श्रंखला में आज का विचार है |

"सेवा "
* प्रत्येक पुरुष को प्रत्येक स्त्री को -हर एक जीव को भगवत स्वरूप समझो |
तुम किसी की सहायता नहीं कर सकते ;तुम केवल सेवा मात्र कर सकते हो |;प्रभु की संतानों की सेवा करो -जब कभी
अवसर मिले |यदि प्रभु की इच्छा से तुम उनकी किसी संतान की सेवा कर सको ,तो सचमुच तुम धन्य हो ;
अपने आप को बड़ा मत समझो |
तुम धन्य हो की यह अवसर तुम्हे दिया गया दूसरो को नहीं |उसे पूजा की द्रष्टि से देखो |गरीब और दुखी लोग तो
हमारी ही मुक्ति के लिए है ताकि रोगी ,विक्षिप्त ,कोढ़ी और पापी के रूप में अपने सामने आनेवाले प्रभु की सेवा हम कर सके |
* मै उसी को महात्मा कहता हूँ जिसका ह्रदय गरीबो के लिए रोता है ;अन्यथा वह तो दुरात्मा है |
* जब तक लाखो लोग भूखे और अज्ञानी है ,तब तक मै उस प्रत्येक व्यक्ति को कृतघ्न समझता हूँ जो उनके बल पर
शिक्षित बना और अब उनकी और ध्यान तक नहीं देता |
* विकास ही जीवन है और संकोच ही म्रत्यु \प्रेम ही विकास है और स्वार्थपरता ही संकोच |अतएव प्रेम ही जीवन का एकमात्र नियम है |जो प्रेम करता है ,वो जीता है जो स्वार्थी है वो मरता है | अतएव प्रेम के लिए ही प्रेम करो |
* हमारा उद्देश्य है संसार का भला करना ,न की अपने नाम का ढोल पीटना |
* जो आज्ञा पालन करना जानता है वाही आज्ञा देना भी जानता है हम चाहते है संगठन |
संगठन ही शक्ति है ,और उसका रहस्य है आज्ञापालन |
* जो मानव जाती की सहायता करना चाहते है ,उन्हें चाहिय की पहले वे अपने सुख दुःख ,नाम यश ,
तथा सर्व विध स्वार्थी भावनाओ की गठरी बनाकर उसे समुद्र में फेंक दें और भगवान के पास आये |यही सारे धर्म प्रवर्तकों ने कहा है और किया है |
* पक्षपात ही सारी बुराइयों का प्रधान कारण है |
* मुझे अपने मानव बंधुओं की सहायता करने दो - मै बस यही चाहता हूँ |
* करूणावश दुसरो की भलाई करना अवश्य अच्छा है ,"शिवज्ञान से जीवसेवा "सब से उत्तम है |
* वत्स कोई भी मनुष्य कोई भी राष्ट्र दुसरे से घ्रणा करके नहीं जी सकता |भारत का भाग्य सितारा तो उसी दिन अस्त हो गया जिस दिन उसने म्लेच्छ शब्द का अविष्कार किया और दूसरो के साथ मेल जोल बंद कर दिया |
* सागर की ओर देखो तरंग की ओर नहीं ;चींटी और देवता में कोई भेद नहीं देखो |प्रत्येक कीड़ा भी
ईसा मसीह का भाई है एक को उच्च और दुसरे को नीच कैसे कहते हो ?अपने स्थान में हर एक बड़ा है |
* अब तुम्हे महावीर के जीवन को आदर्श बनाना होगा |देखो वे कैसे श्रीरामचंद्र की आज्ञामात्र से विशाल सागर को
लाँघ गये |उनका जीवन या म्रत्यु से कोई नाता नहीं था |वे सम्पूर्ण रूप से इंद्रियजित थे उनकी प्रतिभा अद्भुत थी
अब तुम्हे अपना जीवन दास्य भक्ति के उस महान आदर्श पर खड़ा करना होगा |उसके माध्यम से ,क्रमश:अन्य सारे आदर्श जीवन में प्रकाशित होंगे |गुरु की सर्वतोभावेन पालन और अटूट ब्रह्मचर्य -बस यही सफलता का रहस्य है |हनुमान एक ओर सेवादर्ष के प्रतीक है ,उसी प्रकार सिन्हविक्रम के भी प्रतिक है सारा संसार उनके सम्मुख
श्रद्धा और भय से सर झुकाता है |
साभार -विवेकानन्द की वाणी



10 टिप्पणियाँ:

देवेन्द्र पाण्डेय said...

यह पोस्ट लगाना भी मानव कल्याण में एक चुटकी प्रयास है।

वन्दना अवस्थी दुबे said...

आभारी हूं, इतनी सुन्दर पोस्ट के लिये.

प्रवीण पाण्डेय said...

सेवा का सात्विक स्वरूप।

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

शिक्षाप्रद पोस्ट ....ऐसे व्यक्तित्व को नमन ...

anshumala said...

चलिए यहाँ तो हम घर बैठे ही विवेकानंद जी के विचारो को जान सकते है | आप का धन्यवाद |

ajit gupta said...

श्रेष्‍ठ विचारों का संकलन। बधाई।

अल्पना वर्मा said...

स्वामी विवेकानंद जी के विचारो ने हमेशा ही प्रभावित किया है.
यहाँ इन्हें प्रस्तुत करने के लिए आभार.

राज भाटिय़ा said...

लोहड़ी, मकर संक्रान्ति पर हार्दिक शुभकामनाएं और बधाई

अमिताभ श्रीवास्तव said...

प्रयास चाहे चुटकीभर हो किंतु वे सार्थक होते हैं। प्रयास ही हैं जिनसे सफलता की आस जुडी होती है..।
अच्छी पोस्ट..।

k.r. billore said...

Swamiji ne ye bhi kahaa hai--compitition apne aap se karo,,,aur sahyog jeevan me sab se karo ,,apne aap se pratispardha karne se apne vyktitva me nikhar aataa hai ,,,,,,,aapki ek choti si chutki prayas jeevan me swad ka kaam kar gaya hai ,,badhaiyaaaa, kamna billore.......