Monday, January 24, 2011

"एक चुटकी प्रयास "-4

१२ जनवरी स्वामी विवेकानन्द जी के जन्म तारीख से २६ जनवरी उनकी तिथि पूजा तक दिनों में उनके विचारो का संकलन आप सब से बाँटने का वादा था मेरा |बल ,सेवा ,आत्मसंयम के बाद आज का विचार है -

"त्याग "
* महान कार्य महान कार्य से ही सम्पन्न हो सकते है |
* 'सार्वभौमिकता '- इस एक भाव के लिए यदि सब कुछ त्याग देने की आवश्यकता हो ,तो भी पीछे न हटो |
* दूसरो कि मुक्ति के लिए यदि तुम्हे नरक में भी जाना पड़े ,तो सहर्ष जाओ |धरती पर ऐसी कोई मुक्ति नहीं ,जिसे मै अपना कह सकूं |
* मुक्ति उसी के लिए है जो दूसरो के लिए सब कुछ त्याग देता है |और दूसरे जो दिन -रात मेरी मुक्ति ,मेरी मुक्ति
कहकर माथा पच्ची करते रहते है ,वे वर्तमान और भविष्य में होने वाले अपने सच्चे कल्याण को नष्ट कर
यत्र - तत्र भटकते फिरते है |मैंने स्वयम अपनी आँखों से ऐसा अनेक बार देखा है |
* नाम की कौन परवाह करता है ?त्याग दो उसे !यदि भूखो के मुंह में अन्न का कौर पहुँचाने के प्रयास में ,सम्पति ,यहाँ तक कि सर्वस्व भी स्वाहा हो जाय तो तुम त्रिवार धनी हो |ह्रदय ही विजयी होता है - मस्तिष्क नहीं !
पुस्तके और पांडित्य ,योग, ध्यान और ज्ञान -ये सब तो प्रेम कि तुलना में धूल के बराबर है
* भारत को कम से कम सहस्त्रो तरुण मनुष्यों कि बलि कि आवश्यकता है ;पर ध्यान दो -'मनुष्यों' कि
'पशुओ' कि नहीं |
* किसी धर्मिक सम्प्रदाय का पतन उसी दिन से आरम्भ हो जाता है ,जिस दिन से उसमे धनिकों कि उपासना पैठ जाती है |
* "सार "बात है त्याग !त्याग के बिना कोई पूरे ह्रदय से दूसरो के लिए कार्य नहीं कर सकता |
त्यागी पुरुष सब को स्मद्र्ष्टि से देखता है -तब फिर तुम अपने मन में यह भावना क्यों पालते हो कि पत्नी पुत्र दूसरो कि अपेक्षा तुम्हारे अधिक अपने है ?तुम्हारे दरवाजे पर साक्षात् नारायण एक दिन भिखारी के रूप में भूखो मर रहा है !उसको कुछ न देकर तुम केवल अपनी पत्नी बच्चो कि चटोरी रसना कि त्रप्ति में ही लगे रहोगे ?क्यों यः तो पाशविक है |
* स्वार्थपरता ही अनीति है और निस्वार्थपरता नीति |
* हमें यः धयान रखना चाहिए कि हम सभी संसार के ऋणी है ,संसार हमारा कुछ नहीं चाहता \हम सबके लिए यः तो एक महान सौभाग्य है कि संसार के लिए कुछ करने का अवसर मिले \संसार कि भलाई करने में वास्तव में हम अपनी ही भलाई करते है \
*ऊंचे स्थान पर खड़े हो दो पैसे हाथ में लेकर यः न कहो "ऐ भिखारी यः ले "वरन कृतग्य होओ कि वह बेचारा गरीब
वहां है ,जिसे दान देकर तुम अपनी ही सहायता करने का अवसर पाते हो |सौभग्य दान देने वालो का नहीं वरन दान लेने वालो का है |
* त्याग बिना कोई भी महान कार्य सिद्ध नहीं हो सकता |इस जगत कि स्रष्टि के लिए स्वयम उस विरत पुरुष भगवान को भी अपनी बलि देनी पड़ी |
आओ अपने ऐशो आरामों ,नाम -यश ,ऐश्वर्य यहाँ तक कि अपने जीवन कोभी निछावर कर मानव -श्रंखला
का एक सेतु निर्माण कर डालो .ताकि उस पर से होकर लाखो जीवात्माए इस भवसागर को पर कर ले |शुभ कि समस्त शक्तियों को एक केंद्र में ले जाओ |यः न देखो कि तुम किस झंडे के नीचे आगे बढ़ रहे हो \यः न देखो कि तुम्हारा कोनसा रंग है -लाल ,हरा नीला पर सारे रंगों को मिला एक साथ मिला दो और प्रेम के उस श्वेत रंग का तीव्र प्रकाश उत्पन्न करो |
* इस संसार में सदैव दाता का स्थान ग्रहण करो |सब कुछ दे डालो और बदले कि चाह न रखो |
प्रेम दो ,सहायता दो ,सेवा अर्पित करो ,जो कुछ तुमसे बन पड़ता है दो पर" दुकानदारी "के भाव से बचे रहो |
न कोई शर्त रखो न कोई तुम पर शर्त डालेगा ,न तुम पर कोई बंधन आयेगा |जिस प्रकार भगवान हमें स्वेच्छा से देते है ,उसी प्रकार स्वेच्छा से हम भी दे |

साभार -विवेकानन्द कि वाणी




9 टिप्पणियाँ:

मुकेश कुमार तिवारी said...

शोभना जी,

स्वामी जी के विचारों को पुनः पढ़ के यह सोवने पर मजबूर हो गया कि जीवन का लक्ष्य कैसा होना चाहिये और हम कैसे जी रहे हैं?

यह विचार अपने ही जीवन की एक नई खोज के लिये विवश करते हैं।

एक सार्थक पोस्ट के लिये बधाई।

आजकल आप इन्दौर में हैं? आपकी प्रोफ़ाईल से पढ़ा, पहले यह खण्डवा हुआ करता था। मेरा सेल नम्बर 8085953115 है।

सादर,

मुकेश कुमार तिवारी
कवितायन

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

इन विचारों को पढ़ कर बहुत कुछ मन में भाव आये ...मुक्ति पर विशेष रूप से ...आभार

रचना दीक्षित said...

सार्थक विचारणीय पोस्ट.जीवन के सत्य को याद दिलाती बहुत गहरी बातें.

वन्दना said...

सार्थक और गहन विचार्…………सभी विचार सोचने को प्रेरित करते हैं…………आभार्।

कविता रावत said...

बहुत ही सुन्दर अनमोल वचन !
सार्थक और उपयोगी जानकारी के लिए आपका बहुत बहुत आभार

प्रवीण पाण्डेय said...

विचार उतर कर भीतर पहुँच जाते हैं और गहरी बातें करने लगते हैं।

राज भाटिय़ा said...

बहुत सुंदर संदेश जी धन्यवाद

rashmi ravija said...

बहुत कुछ सिखलाती,समझाती एक सार्थक पोस्ट...स्वामी जी के अनमोल वचन से पुनः साक्षात्कार करवाने का बहुत बहुत शुक्रिया

अजय कुमार said...

प्रेरक विचारों की सराहनीय प्रस्तुति