Saturday, January 22, 2011

कुछ यू ही ....

मै तो हूँ तुम्हारी
मै ,
में मुझे
ऐसे खोजते हो
जैसे
रात में धूप खोजते हो ?

समुंदर के टुकड़े को
सूखते हुए
देखा है
मैंने
तुम कहते हो,
तुम
तैर कर आये हो


उसी
तुम्हारे ,मेरे में
फिर भी !


मै तुम्हे सूरज
की तरह मानती हूँ
तुम हो की
सूरज की ओट
में छिपे चाँद की तरह
ही चमकना
चाहते हो
कभी कभी !

23 टिप्पणियाँ:

डॉ॰ मोनिका शर्मा said...

मैं जो तुम्हे जानती हूँ, मानती हूँ... और तुम्हें मेरी तलाश है....! सुंदर

चला बिहारी ब्लॉगर बनने said...

बहुत सुंदर! मैं और तुम का भेद मिटाती और प्रेम में एकाकार होने की शिक्षा देती सच्ची कविता!

राज भाटिय़ा said...

बहुत सुंदर बात कही अप ने इस कविता मे धन्यवाद

वाणी गीत said...

मैं और तुम अलग कहाँ ...
एक सन्देश सा है इस कविता में ...
आभार !

रश्मि प्रभा... said...

main aur tum ...
pahchan hamari hi to hai
baaten ansuljhi hamare bich hi to hain ...

प्रवीण पाण्डेय said...

जिनसे उत्तर की अभिलाषा,
पूँछ रहे हैं प्रश्न वही दृग।

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

बहुत खूबसूरत अभिव्यक्ति ....मैं और तुम के बीच हम की भावना ...

Manoj K said...

मैं और तुम, बहुत ही बढ़िया कविता. आपकी लेखनी का यह रूप भाता है.

सादर
मनोज

रचना दीक्षित said...

मैं और तुम के बीच का सफ़र अच्छा लगा

nilesh mathur said...

waah! bahut sundar!

shikha varshney said...

मैं और तुम ..एक ही तो हैं..बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति.

Rashmi savita @ IITR said...

liked it!!

anshumala said...

अच्छी कविता |

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी प्रस्तुति मंगलवार 25-01-2011
को ली गयी है ..नीचे दिए लिंक पर कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया ..

http://charchamanch.uchcharan.com/

ana said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति

anupama's sukrity ! said...

मै तो हूँ तुम्हारी
मै ,
में मुझे
ऐसे खोजते हो
जैसे
रात में धूप खोजते हो ?

बहुत अच्छी रचना -
सुंदर अभिव्यक्ति

sada said...

मैं और तुम को आपने बहुत ही सुन्‍दर शब्‍द दिये हैं ...।

Kailash C Sharma said...

बहुत सुन्दर भावपूर्ण प्रस्तुति..

सूर्यकान्त गुप्ता said...

बहुत ही सुंदर व मार्मिक रचना। "मै" और "तुम" का परिवर्तन "हम" के रूप मे होना चाहिये जहां "अहम" के लिये कोई स्थान न हो…………बहुत बहुत बधाई।

POOJA... said...

तभी तो
मैं मैं नहीं
तुम तुम नहीं
ये तो सिर्फ हम हैं...
बहुत सुन्दर रचना है.

वीना said...

मै तुम्हे सूरज
की तरह मानती हूँ
तुम हो की
सूरज की ओट
में छिपे चाँद की तरह
ही चमकना
चाहते हो
कभी कभी !

बहुत अच्छी रचना

mridula pradhan said...

bahut achchi lagi.

Dr (Miss) Sharad Singh said...

समुंदर के टुकड़े को
सूखते हुए
देखा है
मैंने
तुम कहते हो,
तुम
तैर कर आये हो......

हृदयस्पर्शी पंक्तियां हैं। अच्छी कविता के लिये बधाई स्वीकारें।