प्रोफ़ेसर साहब के घर में आज सुबह से ही बधाइयों के फोन पर फोन आ रहे थे घर में जितने मोबाईल थे बारी बारी से बजे जा रहे थे |
प्रोफ़ेसर साहब की पत्नी भी सबको हंस हंस कर धन्यवाद दे रही थी |शीना के पास बैठकर इंतजार करने के आलावा और कोई रास्ता नहीं था ...उसे भी तो आज ही टी वि पर ब्रेकिंग न्यूज में ये खबर दिखानी है |
इसी बीच एक आठ से १० साल के बीच का एक बच्चा उसके सामने चाय की ट्रे रखकर चला गया |
तभी प्रोफ़ेसर साहब भी सामने आकर बैठ गये सूट बूट में -पूछिए आपको क्या पूछना है ?
शीना ने भी अपने केमेरा मेन राकेश को अलर्ट किया औरप्रोफ़ेसर साहब से पूछने लगी ?
शीना -सर -आप तो विज्ञानं के प्रोफ़ेसर है फिर आपकी रूचि साहित्य में कैसे हुई ?और रूचि भी ऐसी की आपने पूरी किताब लिख ली और प्रदेश का सर्वोच्च पुरस्कार भी प्राप्त कर लिया |
सर ये तो बहुत बड़ी उपलब्धी है ,बहुत बहुत बधाई हो हमारे चैनल की और से और सारे दर्शको की तरफ से |
प्रोफ़ेसर -हाँ जी हाँ जी धन्यवाद |
शीना -सर आप कुछ प्रकाश डालेगे आपके उपन्यास के विषय में ?
हाँ क्यों नहीं ?
मैंने बाल श्रम के विरोध में इस उपन्यास की रचना की है क्योकि अभी तक इस विषय पर कुछ खास लिखा नहीं गया है और सरकार बहुत प्रसन्न है की मैंने इतनी संवेदनाओ के साथ इस विषय को लोगो तक पहुंचाया |
इतने में फिर मोबाईल बज उठा प्रोफ़ेसर साहब उठकर कोने में चले गये |उधर उनकी पत्नी फोन पर कह रही थी किसी से -हाँ हाँ क्यों नहीं ?भाई आपको भी मंगवा देगे हमारे कृष्णा जैसा लड़का !भई इसका नाम तो नन्हा था,
पर हमने बदलकर कृष्णा रख दिया इसी बहाने दिन भर भगवान का नाम भी ले लिया जायगा |
अच्छा ठीक है पांच हजार में बात तय होगी चलेगा न ?अबकी छुट्टियों में गाँव जायेगे तब जरुर आपके लिए भी गोविंदा ले आवेगे |नमस्ते ...
अरे कृष्णा !जरा एक कप चाय तो ले आना !
सर भारी हो गया है !
प्रोफ़ेसर साहब अभी भी बधाई लेने में व्यस्त है !!!!!!!!!!!!
शीना ने इधर उधर घर में लगे कुछ मेडल ,कुछ शील्ड ,कुछ ट्राफियो को कवर किया और दोपहर की ब्रेकिग न्यूज बना डाली |
एक महान वैज्ञानिक द्वारा रचित साहित्य का अद्वितीय उपन्यास "सवेदनाओ की राख "को प्रदेश के सर्वोच्च पुरस्कार से नवाजा गया है ...........
Tuesday, June 08, 2010
Sunday, June 06, 2010
"कुछ चटपटा हो जाय "
अभी अभी बारिश(मानसून पूर्व )हो चुकी है |उमस बढती जा रही है अभी पकोड़े खाने का तो मौसम नहीं आया तो चलिए आपको आज सूजी का ढोकला ही खिला देते है जो झटपट बन जाता है |
इंस्टेंट "सूजी का ढोकला "
सामग्री -२५० ग्राम सूजी भुनी हुई, १/२ लीटर छाछ खट्टी वाली ,चार हरी मिर्च ,एक छोटा टुकड़ा अदरक ,एक चाय का चम्मच चीनी ,एक चुटकी हिंग , स्वादानुसार नमक ,आधा चम्मच राई ,एक पाउच इनो पाउडर ,दो बड़े चम्मच तेल |
हल्दी इच्छानुसार डालना हो तो | १० से १२ मीठे नीम की पत्ती |
चटनी की सामग्री ; हरा(गीला) नारियल आधा, चने की दाली भुनी हुई एक बड़ा चम्मच , दो हरी मिर्च ,,एकछोटा टुकड़ा अदरक एक कटोरी ताजा दही नमक स्वादानुसार |
ढोकला बनाने की विधि - अदरक मिर्च दरदरा पीस ले |छाछ में सूजी अदरक मिर्ची का पेस्ट .नमक ,चीनी मिलकर अच्छी तरह फेंट ले |ढोकले के बर्तन में पानी भरकर गर्म होने रख दे |इडली पात्र में भी बना सकते है |जब पानी उबलने लगेतब ढोकले के मिश्रण में इनो मिला दे और बर्तन में या इडली के सांचे में थोडा हाथ से तेल लगा कर मिश्रण उसमे डाल दे और १० मिनट तक पकाए |फिर गैस बंद कर दे |ठन्डे होने पर ढोकला के छोटे -छोटे टुकड़े काट ले चाकू की सहायता से फिर उन्हें छौक दे |
एक कडाही में दो चम्मच तेल डालकर तेल गर्म करें उसमे हिंग ,राई ,मीठा नीम डाल दें और टुकड़े किये हुए ढोकले डाल दें |ऊपर से गीला कसा नारियल और बारीक़ कटी हरी धनिया डाल दें |

चटनी की विधि -नारियल के छोटे टुकड़े कर के या कद्दूकस कर ले उसी में हरी मिर्च, अदरक ,भुनी दाल नमक और दही मिलकर बारीक मिक्सी में पीस लें |
बस तो तैयार है सुबह के नाश्ते में पौष्टिक ढोकला और चटनी |
Tuesday, May 18, 2010
गर्मी में महकता मोगरा

गर्मी में
लदी है मोगरे की डालियाँ
गर्मी में
फैली है, हर तरफ
आमो की खुशबू
तरबूजो की ,खरबूजो की
बहार है
लीची ,शहतूतो ,जामुनो की भरमार है
फिर भी
हाय गर्मी ,हाय गर्मी
कहते हुए हम बेहाल है |
इस साल बहुत गर्मी है, जब भी किसी से मिलते है ?तो प्रार भिक बातचीत के बाद यही एक जुमला होता है |अरे भाई साल दर साल इतनी ही गर्मी होती है हाँ ये बात अलग है की टी वि पार रोज चढ़ा हुआ पारा देखकर हमे ज्यादा गर्मी का अहसास होने लगता है औरहो भी क्यों न ?बाजारवाद हम पार हावी जो हो चला है |और इस बाजारवाद ने हमारी सहनशक्ति को ही लील लिया है |बिजली के उपकरणों के बिना हम जीना ही भूल गये है |किसी समय में हर मध्यम वर्गीय घर में एक अदद टेबल फेन होता था जो किसी मेहमान के आने पर लगाया जाता था \धीरे धीरे छत के पंखे आये ,फिर कूलर और अब तो बिना ए .सी के गुजारा ही नहीं |

जमीन से लगा पौधा और उसमे फूल ही फूल |
अगर बिजली चली जाय तो छोटे छोटे बच्चे सो ही नहीं पाते |और गाँव में ये आलम है की बहर खुले में भी लोग कूलर चलाकर सोते है (अगर घंटा दो घंटा बिजली रही तो )|१० साल पहले भी ४५ डिग्री पारा था २० साल पहले भी और रिकार्ड बताते है की ५० साल पहले भी इतना ही पारा रहता था तब भी लोग काम करते थे अब भी करते है फर्क इतना है की अब सुविधाओ में रहकर ही काम किया जा सकता है |प्रकृति अपने नियम से ही चलती है ये अपने उपर है की हम उसे कितने सामान्य ढंग से जीते है |इस पर मुझे एक लोक कथा याद आ रही है जो मेरे दादाजी अक्सर हमे बचपन में सुनाया करते थे |
गर्मी की छुट्टियों में पूरे दो महीने गाँव में ही बीतते थे उस समय कोई समर क्लासेस नही होती थी और चाचा ,बुआ मामा के सभी भाई बहन एक साथ रहकर आम ,तरबूज इमली के चटखारे लेना ,मिटटी के खिओलोने बनाना घर के काम करना और बस मस्ती करना |तब भरी दोपहर से हम सबको बचाने के लिए बैठक में दादाजी हाथ में पंखा लिए ये कथा कहते |
एक बूढी माँ गंगा के किनारे रहती थी अपनी झोपडी बनाकर |गर्मियों में सूत काटती चरखा चलाकर ,जड़ो में स्वेटर बुनती बरसात में गोदाड़ियाँ सिलती और कभी कभी खेत में भी मजदूरी करने चली जाती |सुबह शाम भगवान की आराधना करती |
साधू संतो को भोजन कराती दीन दुखियो की सेवा करती |बरसो तक उसका यही क्रम चलता रहता चाहे कितनी बरसात हो कितनी ही गर्मी ही कितनी ही ठण्ड हो |भगवान राम उसकी इस दिनचर्या से बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने सोचा चलो आज मै की परीक्षा ली जाय ,वो साधारण इन्सान का भेष बना कर माँ की कुटिया में गये ,माँ ने उन्हें आदर के साथ बैठाया जलपान कराया |
फिर रामजी ने माँ से पूछा ?
क्यों माई ?
खूब धूप पड़ रही है ,सूरज आग उगल रहा है तुम यहाँ कैसे रह पाती हो ?तुम्हे तकलीफ नहीं होती क्या ?
माँ ने जवाब दिया -क्यों भैया धूप नहीं पड़ेगी तो बादल कैसे बने गे और बादल नहीं बनेगे तो बरसात कैसी होगी ?
और ये भी तो भगवान की ही देन है |
फिर रामजी ने माँ से पुछा ?
फिर तो बरसात में तुम को बहुत परेशानी होती होगी गंगा जी में तो बहुत पानी भर जाता होगा? तुम्हारी झोपडी मेभी पानी भर जाता होगा चारो और कीचड ही कीचड ?
माँ ने प्यार से कहा -भैया बरसात नही होगी तो किसान अन्न कैसा बोयेगा धरती में ?फिर हम सब क्या खायेगे ?
और मेरी झोपडी का क्या ?जहाँ पानी टपकता है बर्तन रख देती हूँ मुझे कितनी जगह चहिये सोने को ?और गंगा माँ को भरपूर देखकर जो आनंद मन में उठता है उसकी तो तुम कल्पना भी नहीं कर सकते |
फिर रामजी ने पुछा ?
सर्दियों में तो बहुत ठण्ड लगती होगी ?नदी का किनारा है |
मै फिर उमंग से बोली बेटा -सर्दियों में बर्फ नही जमेगी तो गंगा मै में पानी कहाँ से आवेगा ?और पानी नहीं होगा तो भाप कैसे बनेगी भाप नहीं बने गी तो बरसात कैसे होगी?फसल कैसे होगी ?
देने वाले श्री भगवान
इस पर भगवान प्रसन्न होते है औरमाँ को दर्शन देकर उस झोपडी की जगह महल बना देते है |
किन्तु बूढी माँ की दिनचर्या फिर भी वही रहती है |
अब माँ के पडोस में एक और बुढिया रहती थी उसने माँ का महल देखा तो माँ से पूछने लगी? रातो रात ये चमत्कार कैसा हो गया ?
माँ ने सहज भाव से कहा रामजी आये थे किरपा कर गये |
बस फिर क्या बुढिया सुबह शाम रामजी की मूर्ति पर जल चढ़ाती ,अगर भूले भटके में कोई आता तो उसे भगा देती मेरे घर में कुछ नही है ,दिन भर खटिया पर पड़ी रहती और मुझे महल दे दो , मुझे महल दे दो रटा करती |
रामजी ने सोचा ?चलो कैसे भी हो मेरा स्मरण करती है दर्शन दे ही दू ?
रामजी गये बुढिया के घर
पूछा ?और माँ क्या हाल है ?
अरे भाई मत पूछो ?पसीना निकल रहा है ,न कुछ खाने को है ?न कुछ पीने को ?
मै तो तुझे पानी भी नहीं पिला सकती |
आग लगे इस गर्मी को |
फिर रामजी ने पुछा ?फिर तो तुमको बरसात में अच्छा लगता होगा पानी ही पानी ?
अरे बरसात तो इससे भी बुरी -पूरी झोपडी टपकती है चारो तरफ कीचड ही कीचड न कही आ सकती न कही जा सकती ?खीजते हुए बुढिया ने उत्तर दिया |
तब तो जाड़े में बहुत अच्छा लगता होगा ?रामजी ने पुछा ?
अरे कहा ठंड के कारण अकड जाती हूँ कोई पानी देने वाला भी नहीं रहता |
और बुढिया ने रामजी से कहा -अरे भाई जाओ न क्यों मेरा माथा खा रहे हो /
मुझे महल दे दो , मुझे महल दे दो जपने लगी!
रामजी ने कहा -मै तो महल ही देने आया था पर उसमे भी तुम्हे तकलीफ होगी ,इसलिए तुम ऐसे ही रहो |और झोपडी भी चली गई और रामजी अन्तर्धान हो गये |
तो जैसे ठूंठ का अपना सौन्दर्य होता है ,फिर गर्मी तो हमे बहुत कुछ देकर जाती है साल दर साल फिर हाय गर्मी क्यों?
Monday, May 03, 2010
रिटायर मेंट और स्वामीजी का नजरिया ..........
`ट्रेन से जैसे ही उतरते है सामान लेकर| तुरंत कुली आता है .
कितना लोगे ?चार डाक (नग )का ?कुली अपने सर पर रखने वाला वाला कपडा अपने ही हाथो से गोल गोल घुमाता है और सामान उठाने का उपक्रम करता है और कहता है १०० रूपये ?
अरे !अरे! चार नग के इतने रूपये ?सब तो हलके है |मै सिर्फ खड़ी हूँ और देखती हूँ की मुझे कैसे इसमें से अपना सामान उठाना है क्योकि मुझे मालूम है मेरे पति देव कभी भी इतने रूपये तो कुली को देगे नहीं ?१० मिनट तक बहस होगी ,और फिर भी बात नहीं बने गी |जब मोल तोल कर ५० रपये पर कुली राजी हुआ तो पति देव बोले ४० रूपये ले लो मै रिटायर्ड आदमी हूँ |
तो यात्रा क्यों करते हो ?टका सा जवाब देकर वो कुली चलता बना |
जब आजू बाजू देखा तो प्लेटफार्म लगभग खली हो चुका रहता है और कोई कुली भी नहीं दिखाई दे रहा है काफी सारे लोग कुली के सर पर या जिनका ज्यादा सामान है वो गाड़ी में लदवाकर शान से चले जा रहे है |हम दोनों भी याने की मेरे पति और मै मूक निगाहों एक दुसरे की भाषा समझ कर सामान उठाकर चलने लगते है और पुल से नीचे आने पर देखते है कुली हमे देखकर मुस्कुरा रहा होता है |
अब सामने रिक्शा वाला खड़ा है
बाबूजी कहाँ चलना है ?
पतिदेव उसकी तरफ देखते नहीं!? उन्हें लगता है ये ज्यादा पैसा मांगते है एकदम बाहर निकलकर आते है रेलवे स्टेशन के और सडक पर आने जाने वाले रिक्शा को हाथ दिखाते है, उससे वही बहस मै रिटायर्ड आदमी हूँ इतने पैसे कहाँ से दूंगा |रिक्क्षा वाले की मुस्कराहट मेरे सब्र के बांध तोड़ देती है मै इन पर खीज जाती हूँ \और कहने लगती हूँ क्या घर तक भी पैदल चलना होगा ?घर पांच किलोमीटर दूर है तब ये रिक्क्षा में बैठते है |घर आने तक हमारा मौन वाक युद्ध चलता है हमारे रिटायर मेंट से कुली और रिक्श्वाले को क्या लेना देना |उन्हें भी तो अपनी रोजी रोटी कमाना है? मन ही मन बुदबुदाती |रिटायर्ड नहीं हुए थे तो जितने पैसे वो मांगते थे तो दे देते थे क्या ?
सब के सब लूटने बैठे है |क्या हमारे पास फोकट में पैसा आता है ? इन्ही विचारो के साथ मौन बहस के साथ घर आजाते |
इन्ही सब के गुजरते हमे भी हरिद्वार कुम्भ स्नान की लालसा हुई हमारे कुछ मित्रो के परिवार साथ हम लोगो का कार्यक्रम तय हुआ |
सभी परिवार मुंबई से थे हमारे पुराने साथी |कुल ९ लोग थे |बड़ी मुश्किल से एक निर्माण धीन धर्मशाला में रूकने की जगह मिली |जब हरिद्वार रेलवे स्टेशन पर उतरे तो पूरा प्लेटफार्म लोगो से पटा पड़ा था बड़ी कठिनाइयों से अपने अपने ट्राली बेग खीचकर बाहर आये तो पता चला स्टेशन से दो या तीन किलोमीटर तक कोई वाहन नहीं मिलेगा \अब हमारे पतिदेव को न तो कुली से और नहीं रिक्क्षावाला को ये कहना पड़ेगा की भाई मै रिटायर हो गया हूँ अपने आप ही पैसे बच गये |हमारी धर्मशाला बहुत दूर थी कोई भी वाहन वहां जाने को तैयार नहीं था पिछले १० दिनों से और दर्शनीय स्थल देखते देखते वैसे ही हम सब लोग थक गये थे और अमावस्या के स्न्नान के दूसरे दिन भीड़ के रेले के रेले चले जा रहे थे कोई स्नान करके लौट रहा था तो कोई स्नान करने जा रहा रहा था |
हर की पोड़ी
ऋषिकेशहमें तो कोई दिशा का ज्ञान ही नहीं हो पा रहा था हमारे कुम्भ आने का उत्साह फीका पड़ता जा रहा था जिस भी टेक्सी वाले को पूछो कोई जाने को तैयार नहीं पुलिस से जानकारी मांगी तो कहते थोडा और आगे
चलो वहां से टेक्सी मिल जावेगी |,अभी तक सिर्फ टी.वि पर कुम्भ मेला देखा था प्रत्यक्ष मेला देखने का सुयोग पहली बार ही मिला था |लोग अपना सामान कोई हाथ में कोई सर पर रखकर चलते जा रहे थे |और उन सबके बीच हम सब लोग अपनी अपनी ट्रालिया बेग पर्स घसीटते हुए मेले का तमाशा बने जा रहे थे |बड़ी मुश्किल से एक बड़ा रिक्क्षा मिला उसने कहा -अगर
वाहनों को जाने देना शुरू किया होगा तो ले चलूँगा वर्ना वही छोड़ दूंगा हम सब तो कही तक भी जाने को तैयार थे |भाव भी नहीं पुछा उसने ५०० रूपये मांगे सम सब मय सामान के बैठ गये उसमे कैरियर भी नहीं था सारा सामान गोद में में लेकर हवा आने को भी जगह नहीं थी बस तसल्ली थी की अपने गंतव्य पर जा रहे थे और संयोग से वाहन प्रतिबन्ध हट गया था तो सीधे धर्मशाला पहुँच गये|
सामान से लदे फदे ....


धर्मशाला पहुंचने पर हमारा बहुत अच्छी तरह से स्वागत हुआ कोई आश्रम के भक्तो के लिए भक्तो के सहयोग से ही धर्मशाला बन रही थी |महा कुम्भ के चलते भक्तो के लिए अस्थायी व्यवस्था कर दी थी |हमें अपने एक परिचित भक्त के सहयोग से यहाँ आश्रय मिला था |उस दिन तो दिन भर आराम किया शाम को पास ही गंगा घाट था वहां गये गंगाजी के दर्शन करते ही सारी थकावट दूर हो गई |लोटते में फिर पैदल ही चलना था रास्ते भर आश्रमों के पोस्टर राम कथा ,भगवत कथा सत्संग अलग अलग सम्प्रदायों के बड़े बड़े पोस्टर |मन में एका एक ख्याल आया जिस तरह मुंबई में सिने स्टार की भरमार है जगह जगह उनके द्वारा अभिनीत फिल्मो के पोस्टर है कुछ इसी तरह यहाँ अनेक साधू संतो के बड़े बड़े सेट्स पंडाल और पोस्टर लगे है |
अलग ही अनुभूति हो रही थी |
दूसरे दिन आश्रम के बड़े स्वामीजी वहां आये थे हम सभी लोगो ने उनके दर्शन करने का निश्चय किया उनके शिष्यों ने व्यवस्था की स्वामीजी हमारा इंतजार ही कर रहे थे |सुन्दर वातानुकूलित कमरा ,चाँदी का स्वामीजी का सिहांसन ,सामने बड़े बड़े सोफे, नीचे सफेद चादरे बिछी हुई थी |ऐसा लग रहा था मानो कोई सीरियल का सेट था |हम सभी लोग नमस्कार कर बैठ गये हमसे पहले एक भक्त परिवार आया दर्शन किये प्रणाम किया और साथ ही मोटा सा लिफाफा भेंट किया \हम सब एक दूसरेका मुंह देखने लगे क्योकि हम सब तो खाली हाथ ही दर्शन करने आ गये थे |
इस बीच स्वामीजी लगातार मोबाईल पर बात कर रहे थे |
कुछ इस तरह कह रहे थे -मुझे पूरी खबर दो कल की भगदड़ में क्या हुआ ?
फिर हमारे तरफ मुखातिब हो कहने लगे -अच्छा आप लोग मुंबई से आये है ?
कोई तकलीफ तो नहीं ?
नहीं नहीं कोई तकलीफ नहीं बहुत अच्छा इंतजाम है |हम सब एक साथ बोल उठे |
फिर हमारे साथ के पुरुषो से परिचय पाने लगे |कोई बैंक से रिटायर्ड , कोई मार्केटिग कोई रिटायर्ड इंजिनियर |हम सब महिलाये भी अपने अपने क्षेत्र में पूरी तरह समर्पित थी और अपना नौकरी का कार्यकाल पूरा करने बावजूद हर कोई ,कोई न कोई सेवा की गतिविधियों से जुड़ा था |
हम सबका परिचय जानने के बाद उन्होंने अपने शिष्य जो की उनकी सेवा में तैनात था उसे धीरे से कुछ कहा -उसने हम सबको एक -एक चाकलेट दी और कहा स्वामीजी को आजअभी निकलना है दिल्ली के लिए पिछले तीन महीने से यही है |
आगे की बहुत सारी योजनाये है उसके लिए उन्हें दोरे पर जाना है |
बिलकुल !
हम सब उठ गये |तरुण स्वामीजी प्रेस किये भगवा कपडे पहने , हाथमे लेपटाप लिए बड़ी सी वातानुकूलित गाड़ी के लिए उठ गये ,धर्मशाला में जितने लोग ठहरे थे सब हाथ जोड़े उन्हें विदाई दे रहे थे |साथ ही दिल्ली के कुछ बड़े व्यापारी उनके खाने पीने की वस्तुए रखवाने में व्यस्त थे |
और हमनोकरी पेशा रिटायर्ड लोग न ही बराबर हाथ जोड़ पा रहे थे और नहीं उनकी कोई व्यवस्था कर पा रहे थे |
उनके जाने के बाद मालूम पड़ा जो रसोइये भोजन बना रहे थे वे भी चले गये |हमे अपनी व्यवस्था खुद करनी होगी |
जाते जाते स्वामीजी कह गये थे हम यहाँ आराम से रह सकते है रिटायर्ड लोग जो ठहरे ....
Friday, April 30, 2010
गाजर घास
मेरा अहं
ये अहं न चाहते हुए भी
कब उग जाता है ?
मेरे अन्दर
गाजर घास की भांति
बहुत पहले, ज्ञान न था
गाजर घास का ?
जब उगते देखा तो
खुश हुई
चलो घर कि गाजर
खाने को मिलेगी
किन्तु
वो तो फैलती गई
और पूरे बगीचे
को लील गई
खुश्की दे
सो अलग |
हर हरी चीज,
सुकून
नहीं देती ?
ये जाना
तब से !
मेरे अहं का
विरोध करती हूँ
तो अलग
बैठा दी जाती हूँ
और
मेरे अहं का
समर्थन
करती हूँ
तो
गाजर घास
बन जाती हूँ |
ये अहं न चाहते हुए भी
कब उग जाता है ?
मेरे अन्दर
गाजर घास की भांति
बहुत पहले, ज्ञान न था
गाजर घास का ?
जब उगते देखा तो
खुश हुई
चलो घर कि गाजर
खाने को मिलेगी
किन्तु
वो तो फैलती गई
और पूरे बगीचे
को लील गई
खुश्की दे
सो अलग |
हर हरी चीज,
सुकून
नहीं देती ?
ये जाना
तब से !
मेरे अहं का
विरोध करती हूँ
तो अलग
बैठा दी जाती हूँ
और
मेरे अहं का
समर्थन
करती हूँ
तो
गाजर घास
बन जाती हूँ |
Tuesday, April 27, 2010
"अयोध्या "
अयोध्या के बारे में" रामचरित मानस" के आलावा बहुत कुछ लिखा जा चुकाहै |
अपनी अल्प बुद्धि से जो कुछ समझ आया आप सबसे बाँट रही हूँ |
देखने गये थे
रामलला
दर्शन हुए
कुछ इन अहसासों के
उजाड़ नगरी ,सूनी अयोध्या
सूनी रसोई ,उजाड़ सीता महल
पवन पुत्र
पवन कि अपेक्षा
धरती पर
आसरा लिए
तुलसी कि अयोध्या
क्या सिर्फ रामचरित मानस में ही है ?
अयोध्या में दर्शन हुए तो सिर्फ बाजार
और
बाजार
नाव
कभी चलती थी
सरयू नदी में?
Saturday, April 03, 2010
बंधन
रात अश्को से भीगी आँखों को,
सुबह कि
नमी ने सुखा दिया
रात के गहरे ताप को
सुबह की पहली किरण
मिटा गई
क्षण में सपने बुनती हुई
दूसरे ही क्षण में
सपनों को
टूटते देखना
नियति हो गई
उसकी
मुखोटो की दुनिया में
वो अकेली
खडी रही

मै सारे
पिंजरों को
खोल दू
जिसमे कैद है
मासूम पंछी
मै तमाम
दरवाजे खोल दूं
भीतर है,
बिखरे सपने
मै सारे मुखोटे
खीच लू
जिनके पीछे
छिपे है
शातिर बन्दे
ये पिजरे
ये दरवाजे
ये मुखोटे
तोड़ने लगे है
अब विश्वासों को |
Friday, March 26, 2010
गाँव कि याद बहुत आती है .........

हम सब गाँव से जुड़े है ,गाँव को हमने जिया है हमारी आत्मा में बसा है ,ग्राम्य सरस जीवन |पर आज जो गाँव का तथाकथित विकास हो रहा है ,ऐसी तो कल्पना नहीं कि थी गाँव की |जब भी गाँव जाते है ,निराशा ही हाथ लगती है लगता है बहुत कुछ छूट गया है ,बहुत कुछ बिखर गया है |

गाँव कि याद बहुत आती है
गाँव न जा पाना
एक विडम्बना है ?
एक मजबूरी है ?
बिलकुल सच है |
कि हम
गाँव
जाते ही नहीं
गाँधी का गाँव ,
विदेशी वस्तुओ।
का बाजार
मोबाईल के टावरो ने,
नदी किनारों के
मंदिरों कि ध्वजा को,
अपनी ओट में ले लिया है |
इसीलिए
हम गाँव जाते ही नहीं ?
सूखी नदी
कि रेत से
शहर में,
सीमेंट के साथ
मिलकर पक्के घर बना
लेते है
माँ !!
छत के इंतजार में
बैठी ही रह जाती है
खंडहर में,
गाँव में
ये सच है कि
हम गाँव जाते ही नहीं ?
दसियों अंग्रेजी
स्कूल है
बच्चे
"मछली जल कि रानी है "
ही पढ़ पाते है
गाँव में,
और
ये सच है कि
हम गाँव जाते ही नहीं ?
फिल्मो के टेलीविजन
के गाँव ,
सिर्फ
ठाकुरों और दलितों
के गाँव ??
इसीलिए
ये सच है कि
हम गाँव जाते ही नहीं ?
हजारो डाक्टर
शपथ लेते है
सेवा करने की ,
दर साल
महानगरो में ,
नर्से और रिटायर्ड कम्पौन्दर
स्वास्थ सेवा दे रहे है
गाँवो में
इसीलिए
हम गाँव जाते ही नहीं?
Tuesday, March 16, 2010
निमाड़ का गणगौर पर्व और गणगौर गीत
आज से चैत्र कि नवरात्री उत्तर भारत ,पंजाब के साथ सभी प्रेदेशो में कई रूप में मनाई जाती है |साथ ही राजस्थान कि गणगौर भी इसी समय मनाई जाती है जो कि सर्व विदित है |मध्य प्रदेश के ग्रामीण और अब शहरों में भी विशेषकर निमाड़ में गणगौर का उत्सव धूमधाम से मनाया जाता है कुछ कुछ बंगाल कि दुर्गा पूजा जैसा ही उत्साह होता है गाँवो में अपनी साल भर कि फसल कि कमाई से बचा कर रखा पैसा गणगौर पर्व पर श्रधा से खर्च करते है निमाड़ के किसान |चूँकि खेतिहर लोगो से जुड़ा है यह त्यौहार तो इसमें लोक संस्क्रती कि प्रधानता है |
चैत्र वदी १० से चैत्र सुदी ३ तक के ९ दिनों के गणगौर उत्सव निमाड़ (मध्य प्रदेश )कि विशेषता है |इस अवसर पर सारा प्रदेश गीतमय हो जाता है और शिव -पारवती ,ब्रह्मा -सावित्री ,विष्णु -लक्ष्मी तथा चंद्रमा -रोहिणी कि वंदना के गीत गए जाते है |इनमे सबसे अधिक गीत रनुदेवी और उनके पति (धनियेर )सूर्य के के संवाद रूप में कहे गये है |
रणुबाई ही निमाड़ी लोकगीतों कि अधिष्टात्री देवी है |इसके एक गीत में सौराष्ट्र देश से आने का संकेत रनुदेवी कि पहिचान के लिए महत्वपूर्ण है |एक गीत में रनु बाई को रानी कहा गया है अन्यत्र रणुबाई के मंदिर का वर्णन है जिसमे रणुबाई बिराजती है और अपने भक्तो के लिए द्वार खोल देती है |
रनुदेवी सूर्य कि पत्नी राज्ञी का ही अपभ्रंश भाषा और लोकभाषा में घिसा हुआ रूप है |जैसे यग्य से जरान -जन्न जाना और उससे 'जन 'बनता है ;जैसा कि यज्ञोपवित शब्द से निकले हुए जनेऊ शब्द में पाया जाता है उसी प्रकार रण्नी -रानी
और अंत में" रनु "रूप बना |वस्तुतः राज्ञी देवी कि पूजा गुजरात -सौराष्ट्र में प्रचलित थी उसकी १४वि शताब्दी तक कि मुर्तिया पाई गई गई hai |
गणगौर को नारी जीवन का सुमधुर गीति काव्य कहा जाता है निमाड़ में |९ दिनों तक चलने वाले इस त्यौहार में एक भी ऐसा कार्य नहीं जो बिना गीत के हो, स्त्रियों द्वारा सामूहिक रूप से जब इस त्यौहार को मनाया जाता है तो कुछ ऐसा लगता है मानो ऋतुराज बसंत कि अगवानी कि जारही हो |
अमराइयो में कोयल कि कूक ,पलाश के फूलो कि लाली और होली कि उतरती खुमारी के साथ जब यह त्यौहार शुरू होता है ,तो गीतों कि गूँज से सारा गाँव सरोबर हो उठता है |
इसमें होली कि राख से चुने हुए कंकरों में गीतों के स्वर के साथ गौरी कि प्रतिष्ठा कर छोटी छोटी टोकनियो में मिटटी भरकर उनमे गेंहू बोने के रूप में मानो नारी के हाथो फसल कि प्राण प्रतिष्ठा कि जाती है और फिर उसे प्रतिदिन सींचते हुए नित्य आरती और उसकी उपासना कि जाती है -
अरघ सिंचन के समय गाने वाला निमाड़ी गीत -
म्हारा हरिया ज्वारा हो कि
गहुआ लहलहे मोठा हीरा भाई वर बोया जाग
, कि लाड़ी बहू सींच लिया
रानी सिंची न जाण्य हो कि ज्वारा पेलापड्या |
उनकी सरस क्थोलाई हो ,हीरा भाई ढकी लिया
अर्थ -मेरे हरे जवारे के रूप में गेंहू लहलहा रहे है हीरा भाई के घर जाग बोया है और उनकी बहुए उन्हें सींच रही है वाह सींच कर निवर्त हुई है कि जवारे पीले पड़ने लगे है उनके सहस्त्रो अंकुरों को बहन ने स्नेह से ढँक लिया है |
मेरे हरे भरे ज्वारो के रूप में गेंहू लहलहा रहे है |
ये जवारे जीवन कि सम्रधि के प्रतीक है |hare peele jvare
हरे पीले जवारे ........
धनियेर राजा और रनु बाई कि इन बोलती मूर्तियों को रथ कहते है|
इन रथो में पीले जवारे रखकर नदी किनारे देवी को पानी पिलाने ले जाते है ,पूरा गाव एकत्र होकर सबकी मंगल कामना
हेतु देवी से लोकगीतों द्वारा विनती करते है |

आओ हम सब देवी का पूजन करे
इस गीत में देवी पूजा के लिए स्त्रियों के सामूहिक आव्हान के साथ ही साथ पूजन करने वाली कि भी महत्वाकांक्षाओ एवम देवी के संतानदाता स्वरूप का वर्णन है \इसमें धन ,धान्य एवम संतान से सम्पन्न आदर्श ग्रहस्थी का अत्यंत ही सजीव चित्रण है -
डूब का डंडला अकाव का फूल
रानी ओ मोठी बहू अर्घ देवाय |
अर्घ दई न वर पाविया
मोठा भाई सो भरतार
अतुलि पातुली लाओ रे गंगाजल पाणी ,|
नहावन कर रनु बाई राणी |
रनु बाई रणुबाई खोलो किवाड़ |
पूजन वळी उभी द्वार |
पूजन वाली काई मांग |
धूत पूत अव्हात मांग |
हटियालो बालों मांग |
जतिओयालो भाई मांग |
बहू को रान्ध्यो मांग |
बेटी को परोस्यो मांग |
तोंग्ल्या बुड्न्तो गोबर मांग |
पोय्च्या बुड्न्तो गोरस मांग |
धणी को राज मांग |
सोंना सी सरवर गौर पूजा हो रना देव |
माय न बेटी गौर पूजा हो रना देव |
ननद भोजाई गौर पूजा हो रना देव |
देरानीजेठानी गौर पूजा हो रना देव |
सासु न बहू गौर पूजा ही रना देव |
अडोसन पड़ोसन गौर पूजा हो रना देव |
पड़ोसन पर तुट्यो गरबो भान हो रना देव |
कसी पट तुट्यो गरबो भान हो रना देव |
दूध केरी दवनी मझ्घेर हो रना देव |
पूत करो पालनों प्टसल हो रना देव |
स्वामी सुत सुख लड़ी सेज हो रना देव |
असी पट तुट्यो गरबो भान हो रना देव |
आरती - करंड कस्तूरी भरिया ,छाबा फूलडा जी
तुम भेजो हो धनियेर रनूबाई ,
जो हम करसा आरतीजी
थारी आरती ख आदर दिसां देव दमोदर भेटंसा जी |
अर्थ -
इस करंड भर कस्तूरी और छाबड़ी भर फूल लेकर हम देवी कि आरती कर रहे है
हे भाई तुम अपनी पत्नी को इस आरती में सम्मिलित होने को भेज दो |
हम रनु कि आरती को सम्मान देगे और दामोदर -स्वरूप भगवान से भेंट करेगे|
क्रमशः
चैत्र वदी १० से चैत्र सुदी ३ तक के ९ दिनों के गणगौर उत्सव निमाड़ (मध्य प्रदेश )कि विशेषता है |इस अवसर पर सारा प्रदेश गीतमय हो जाता है और शिव -पारवती ,ब्रह्मा -सावित्री ,विष्णु -लक्ष्मी तथा चंद्रमा -रोहिणी कि वंदना के गीत गए जाते है |इनमे सबसे अधिक गीत रनुदेवी और उनके पति (धनियेर )सूर्य के के संवाद रूप में कहे गये है |
रणुबाई ही निमाड़ी लोकगीतों कि अधिष्टात्री देवी है |इसके एक गीत में सौराष्ट्र देश से आने का संकेत रनुदेवी कि पहिचान के लिए महत्वपूर्ण है |एक गीत में रनु बाई को रानी कहा गया है अन्यत्र रणुबाई के मंदिर का वर्णन है जिसमे रणुबाई बिराजती है और अपने भक्तो के लिए द्वार खोल देती है |
रनुदेवी सूर्य कि पत्नी राज्ञी का ही अपभ्रंश भाषा और लोकभाषा में घिसा हुआ रूप है |जैसे यग्य से जरान -जन्न जाना और उससे 'जन 'बनता है ;जैसा कि यज्ञोपवित शब्द से निकले हुए जनेऊ शब्द में पाया जाता है उसी प्रकार रण्नी -रानी
और अंत में" रनु "रूप बना |वस्तुतः राज्ञी देवी कि पूजा गुजरात -सौराष्ट्र में प्रचलित थी उसकी १४वि शताब्दी तक कि मुर्तिया पाई गई गई hai |
गणगौर को नारी जीवन का सुमधुर गीति काव्य कहा जाता है निमाड़ में |९ दिनों तक चलने वाले इस त्यौहार में एक भी ऐसा कार्य नहीं जो बिना गीत के हो, स्त्रियों द्वारा सामूहिक रूप से जब इस त्यौहार को मनाया जाता है तो कुछ ऐसा लगता है मानो ऋतुराज बसंत कि अगवानी कि जारही हो |
अमराइयो में कोयल कि कूक ,पलाश के फूलो कि लाली और होली कि उतरती खुमारी के साथ जब यह त्यौहार शुरू होता है ,तो गीतों कि गूँज से सारा गाँव सरोबर हो उठता है |
इसमें होली कि राख से चुने हुए कंकरों में गीतों के स्वर के साथ गौरी कि प्रतिष्ठा कर छोटी छोटी टोकनियो में मिटटी भरकर उनमे गेंहू बोने के रूप में मानो नारी के हाथो फसल कि प्राण प्रतिष्ठा कि जाती है और फिर उसे प्रतिदिन सींचते हुए नित्य आरती और उसकी उपासना कि जाती है -
अरघ सिंचन के समय गाने वाला निमाड़ी गीत -
म्हारा हरिया ज्वारा हो कि
गहुआ लहलहे मोठा हीरा भाई वर बोया जाग
, कि लाड़ी बहू सींच लिया
रानी सिंची न जाण्य हो कि ज्वारा पेलापड्या |
उनकी सरस क्थोलाई हो ,हीरा भाई ढकी लिया
अर्थ -मेरे हरे जवारे के रूप में गेंहू लहलहा रहे है हीरा भाई के घर जाग बोया है और उनकी बहुए उन्हें सींच रही है वाह सींच कर निवर्त हुई है कि जवारे पीले पड़ने लगे है उनके सहस्त्रो अंकुरों को बहन ने स्नेह से ढँक लिया है |
मेरे हरे भरे ज्वारो के रूप में गेंहू लहलहा रहे है |
ये जवारे जीवन कि सम्रधि के प्रतीक है |hare peele jvare

हरे पीले जवारे ........धनियेर राजा और रनु बाई कि इन बोलती मूर्तियों को रथ कहते है|
इन रथो में पीले जवारे रखकर नदी किनारे देवी को पानी पिलाने ले जाते है ,पूरा गाव एकत्र होकर सबकी मंगल कामना
हेतु देवी से लोकगीतों द्वारा विनती करते है |

आओ हम सब देवी का पूजन करे
इस गीत में देवी पूजा के लिए स्त्रियों के सामूहिक आव्हान के साथ ही साथ पूजन करने वाली कि भी महत्वाकांक्षाओ एवम देवी के संतानदाता स्वरूप का वर्णन है \इसमें धन ,धान्य एवम संतान से सम्पन्न आदर्श ग्रहस्थी का अत्यंत ही सजीव चित्रण है -
डूब का डंडला अकाव का फूल
रानी ओ मोठी बहू अर्घ देवाय |
अर्घ दई न वर पाविया
मोठा भाई सो भरतार
अतुलि पातुली लाओ रे गंगाजल पाणी ,|
नहावन कर रनु बाई राणी |
रनु बाई रणुबाई खोलो किवाड़ |
पूजन वळी उभी द्वार |
पूजन वाली काई मांग |
धूत पूत अव्हात मांग |
हटियालो बालों मांग |
जतिओयालो भाई मांग |
बहू को रान्ध्यो मांग |
बेटी को परोस्यो मांग |
तोंग्ल्या बुड्न्तो गोबर मांग |
पोय्च्या बुड्न्तो गोरस मांग |
धणी को राज मांग |
सोंना सी सरवर गौर पूजा हो रना देव |
माय न बेटी गौर पूजा हो रना देव |
ननद भोजाई गौर पूजा हो रना देव |
देरानीजेठानी गौर पूजा हो रना देव |
सासु न बहू गौर पूजा ही रना देव |
अडोसन पड़ोसन गौर पूजा हो रना देव |
पड़ोसन पर तुट्यो गरबो भान हो रना देव |
कसी पट तुट्यो गरबो भान हो रना देव |
दूध केरी दवनी मझ्घेर हो रना देव |
पूत करो पालनों प्टसल हो रना देव |
स्वामी सुत सुख लड़ी सेज हो रना देव |
असी पट तुट्यो गरबो भान हो रना देव |
आरती - करंड कस्तूरी भरिया ,छाबा फूलडा जी
तुम भेजो हो धनियेर रनूबाई ,
जो हम करसा आरतीजी
थारी आरती ख आदर दिसां देव दमोदर भेटंसा जी |
अर्थ -
इस करंड भर कस्तूरी और छाबड़ी भर फूल लेकर हम देवी कि आरती कर रहे है
हे भाई तुम अपनी पत्नी को इस आरती में सम्मिलित होने को भेज दो |
हम रनु कि आरती को सम्मान देगे और दामोदर -स्वरूप भगवान से भेंट करेगे|
क्रमशः
Sunday, March 14, 2010
आधी आबादी कि त्रासदी
एक पान कि दुकान पर कुछ ,
कुछ भी काम न ?
करने वाले वाले
ये लडके!
सिगरेट के छल्ले छोड़ते हुये
नौजवान लडके?
आने जाने वाली
काम करने वाली
लडकियों,
शादीशुदा उम्र दराज
काम करने वाली
ओरतो को भी
छेडते हुये,
तंग जींस चितकबरे शर्ट
बदन पर लटकाए
चोरी के
मोबाईल से गाने सुनते हुए
आवारा से लड़के
अपने आप को ?
उनकी इन नजरो से बचाती
बरसात हो ?तपती दुपहरी हो ?
या कि हाड़ कंपा देने वाली ठण्ड
अपनी शादी के लिए पैसे जुटाती ,
ऐसे ही वर (लडको )पाने के लिए
अपने आप को झोंक देती
अपने जीवन को सार्थक करने में ये
लड़कियां....
अपने बेटे कों प्राइवेट स्कूल में
पढ़ाने के लिए
दिन रात चकरी कि तरह घूमती
इन्ही बेटों कि
माँ??
कमाऊ औरत!
मार खाकर भी
कुछ न बोलने वाली
औरत!
मेहनत से कमाए पत्नी के रुपयों
को शराब में खर्च करने को
अपना अधिकार समझने वाला
ही है .....
ऐसे बेटों का पिता!
कुछ भी काम न ?
करने वाले वाले
ये लडके!
सिगरेट के छल्ले छोड़ते हुये
नौजवान लडके?
आने जाने वाली
काम करने वाली
लडकियों,
शादीशुदा उम्र दराज
काम करने वाली
ओरतो को भी
छेडते हुये,
तंग जींस चितकबरे शर्ट
बदन पर लटकाए
चोरी के
मोबाईल से गाने सुनते हुए
आवारा से लड़के
अपने आप को ?
उनकी इन नजरो से बचाती
बरसात हो ?तपती दुपहरी हो ?
या कि हाड़ कंपा देने वाली ठण्ड
अपनी शादी के लिए पैसे जुटाती ,
ऐसे ही वर (लडको )पाने के लिए
अपने आप को झोंक देती
अपने जीवन को सार्थक करने में ये
लड़कियां....
अपने बेटे कों प्राइवेट स्कूल में
पढ़ाने के लिए
दिन रात चकरी कि तरह घूमती
इन्ही बेटों कि
माँ??
कमाऊ औरत!
मार खाकर भी
कुछ न बोलने वाली
औरत!
मेहनत से कमाए पत्नी के रुपयों
को शराब में खर्च करने को
अपना अधिकार समझने वाला
ही है .....
ऐसे बेटों का पिता!
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