Monday, March 01, 2021

सूखा पेड़

तुमने देखा है मुझे 
हरा भरा
वो मेरा सिंगार
किया था प्रकृति ने 
मेरी छाँव में 
सुख पाया ऐसा तुम कहते हो
मैंने तुम्हारी भूख मिटाई
ऐसा भी तुम ही कहते हो
अनगिनत वर्षो से जिया
तुम्हारे लिए
ऐसा भी तुम ही कहते हो
आज थक गया हूँ 
झुर्रियां दिखने लगी है
बेतहाशा मेरी
फिर भी मैं
झुका नहीं
क्योकि तुमने
ही मुझमे प्राण फूंके
यह कहकर
कि
ठूंठ का भी
अपना सौंदर्य होता है।
शोभना चौरे

Saturday, February 13, 2021

बस कुछ यूं ही

बस कुछ यूं ही
💐💐💐💐💐💐
विचारों का दरख़्त 
खोखला हुआ चला है
जड़ें भी सिमटने लगी है
मैं महान हूँ
इसी भ्रम में,
पीछे लगी कतार को
झुठला न सके
न मालूम!
इस कतार में से 
कितने दरख़्त
बनेंगे?
कितने खजूर बनेंगे?
कितने बोन्साई 
बनाये जाएंगे?
दरख़्त बनने की
आपा धापी में
टूटती कतार
सिर्फ घास 
बनकर 
ओस की बूंदों
को दामन में 
भरकर मिटती  
जाती है
महान बनने 
की कतार!!!!