Monday, March 01, 2021

सूखा पेड़

तुमने देखा है मुझे 
हरा भरा
वो मेरा सिंगार
किया था प्रकृति ने 
मेरी छाँव में 
सुख पाया ऐसा तुम कहते हो
मैंने तुम्हारी भूख मिटाई
ऐसा भी तुम ही कहते हो
अनगिनत वर्षो से जिया
तुम्हारे लिए
ऐसा भी तुम ही कहते हो
आज थक गया हूँ 
झुर्रियां दिखने लगी है
बेतहाशा मेरी
फिर भी मैं
झुका नहीं
क्योकि तुमने
ही मुझमे प्राण फूंके
यह कहकर
कि
ठूंठ का भी
अपना सौंदर्य होता है।
शोभना चौरे

Saturday, February 13, 2021

बस कुछ यूं ही

बस कुछ यूं ही
💐💐💐💐💐💐
विचारों का दरख़्त 
खोखला हुआ चला है
जड़ें भी सिमटने लगी है
मैं महान हूँ
इसी भ्रम में,
पीछे लगी कतार को
झुठला न सके
न मालूम!
इस कतार में से 
कितने दरख़्त
बनेंगे?
कितने खजूर बनेंगे?
कितने बोन्साई 
बनाये जाएंगे?
दरख़्त बनने की
आपा धापी में
टूटती कतार
सिर्फ घास 
बनकर 
ओस की बूंदों
को दामन में 
भरकर मिटती  
जाती है
महान बनने 
की कतार!!!!

Monday, December 14, 2020

ओतस इडली

#मैं मेरी#रसोई और मेरी कहानी
पोस्ट 8
इधर कई दिनों से तबियत खराब थी तो चाहकर भी रसोई की कहानी लिख न पाई।
इस बार 
कहानी कुछ यूँ है जब मुम्बई में थी तो हमारा महिला मंडल सक्रिय था हम लोगों ने तय किया था कि हर शक्रवार को सोसायटी में खाने के स्टॉल लगाएंगे और जो इनकम होगी उससे झोपड़ियों के बच्चों को पढ़ने की सामग्री देंगे।
दो ,दो महिलाओं के ग्रुप बना दिये जिसकी जिसमें मास्टरी हो वो बनाता था।
मैं इडली,और समोसा बनाती थी साथ में मेरी एक सहेली थी।
1किलो चांवल में 80 इडली बनती थी और सिर्फ नारियल की चटनी।बनाने में आधा दिन लग जाता और 1 घण्टे में सारी खत्म हो जाती ।सारा हिसाब किताब होता।लागत निकालकर सारा प्रॉफिट मण्डल में जमा हो जाता ।कॉफी सालों तक किया ।परफेक्ट इडली बनती थी।
हाँ एक बात मुझे हमेशा सोचने पर मजबूर करती है कि जो इडली चटनी मुम्बई या बैंगलोर में स्वाद देती है वो स्वाद यहाँ इंदौर में नही?
शायद जलवायु?
खैर आज आपको ओट्स की मसाला इडली और रसम की चटनी खिलाते है।

ओट्स और रवे की इडली
1 कटोरी रवा
1 कटोरी ओट्स भूनकर पिसा हुआ
2कटोरी दही
गाजर,शिमला,मिर्च,पत्ता गोभी,प्याज
सब मिलकर चाप किया हुआ मिक्सर2 कटोरी।
हरि मिर्च अदरक का पेस्ट  नमक स्वाद के अनुसार
सबको मिक्स करके आधा घण्टा रख दे।
1 चमच तेल में कढ़ी पत्ता ,हींग, उड़द दाल राई  तड़काएं और मिश्रण में मिला दे
फिर ईनो मिलाये और ग्रीस किये इडली पात्र में इडली बना लें।

रसम चटनी
1गिलास पानी मे  2 बड़े चमचm t r का रसम पाउडर घोला, उसमें थोड़ा कच्चा नारियल,चना दाल भुनी हुई पीसकर डाली नमक और थोड़ा इमली का पल्प डाला ।
एक चमच तेल में कढ़ी पत्ता राई और हींग का तड़का घोल में डाला और 5 मिनट तक उबाल लिया ।
रसम चटनी तैयार।

Monday, September 28, 2020

मेरी रसोई की कहानी

मेरी रसोई की कहानी

 हम मध्यम वर्ग की गृहिणियों  में कोई भी चीज का नुकसान न होने देने की आम बीमारी होती है।
ये ठीक उसी तरह होती है जैसे कोई भी सुंदर से डिब्बे में कोई सामान आया तो समान के उपयोग के पहले ही दिमाग सोचने लगता है इस डिब्बे में क्या भरूंगी?
चाहे कितने भी डिब्बो के सैट पहले से मौजूद हो😊
इसी तरह जब भी घी बनाती हूँ पहले ही सोच लेती हूँ छाछ का क्या उपयोग करना है?
तो कहानी ऐसी है कि मैं जब बैंगलोर मे  थी हमारे घर मे एक नेपाली महिला गीता काम करती थी।
3 लीटर दूध लेते थे तो हर चौथे दिन छाछ घी बनाती तो जाहिर है छाछ भी बनती
अब हर समय की उपयोग करे ?
तो मैने गीता को पूछा ?
तुम ले जाओगी ?वो बोली हाँ।
मुझे प्रसन्नता हुई कि फेंकना न पड़ेगी।
उससे भी ज्यादा और खुशी तब हुई जब उसने कहा-
मेरे आदमी को छाछ बहुत अच्छा लगा ओर  पूरा पी लिया और कहने लगा कि माँ की याद आ गई गाँव की, बिल्कुल वैसा ही स्वाद है।
फिर तो जब तक मैं रही मुझे ये खुशी मिलती रही।
अब यहाँ की रसोई में भी हर पाँचवे दिन
घी बनाती हूँ तो छाछ भी भरपूर
तो सूजी के ढोकले तो निश्चित है ही
चूंकि इस छाछ में थोड़ा बहुत मक्खन रह ही जाता है तो ढोकले बहुत ही अच्छे बनते है।
सूजी के ढोकले तो आप सब हमेशा ही बनाते है तो आज की कहानी में 2 अलग चटनियों की रेसिपी दे रही हूँ।
मेरे आँगन में बहुत बड़ा मीठे नीम का पेड़ है।
इन दिनों खूब ताजी ताजी पत्तियाँ आ रही है तो सोचा चलो चटनी बनाई जाय
खूब सारी पत्तियां तोड़कर धो ली और कपड़े पर फैला कर रात भर रख दी।
💐💐💐💐💐💐
चटनी 1
एक कटोरी कढ़ी पत्ता(मीठा नीम)
आधी कटोरी मूंगफली भुनी हुई
4 हरि मिर्च
नमक स्वादानुसार
कढ़ी पत्ते को काढ़ाई में सेंक लिया मध्यम आँच पर कुरकुरा होने तक
ठंडा होने पर मूंगफली,कढ़ी पत्ता आ7र हरीमिर्च नमक डालकर पीस लिया।
अगर गीली चटनी चाहिए तो पानी और नीबू का रस मिलाएं।
चटनी 2
एक कटोरी कढ़ी पत्ता, आधी कटोरी सूखा नारियल कद्दूकस किया हुआ
4 लाल मिर्च
आधा चमच अमचूर पाउडर
नमक स्वाद के अनुसार एक चम्मच चीनी
आधा चमच भुना पिसा जीरा।
कढ़ी पत्ते। को सुखा ही कढ़ाई में भुने कुरकुरा होने तक।
निकल कर गैस बंद कर उसी कढ़ाई में 
नारियल और लाल मिर्च थोड़ी बहुत ले
ठंडा होने पर सब मिलाकर पीस ले।
चटनी 3
ये आम गीले नारियल की जो इडली
के साथ बनाते है वही है।
कहानी तो कुछ और लिखने वाली थी पर आज ये कहानी बन गई।


Thursday, July 23, 2020

पचपन पार की औरते

नारी दिवस पर 
💐💐💐💐

55 पार की औरते

55 के पार की औरतें
शीशे में अपना अक्स
देखने में सकुचाती है
अपना आत्म विश्वास
खोने लगती है
जब
जिसकी अर्धांगिनी होती है
जिनको जन्म दिया,
पालन किया वो 
हर बात में उसे
टोका करते है
तब,

मैंने देखा है 
सूजे हुए पाँव लेकर
पोर पोर टिसते 
हुए अंगो के जोड़,
तब भी घरेलू इलाज
का हवाला देकर
डॉ के पास नही जाती
क्योंकि उसे मालूम है
ये उसके बजट के बाहर है
पूरा जीवन सर्फ साबुन
किफायत से उपयोग
करती रही
आज उनको पानी में
 घुलते देख
खुद भी घुलती है।
अपनी बची हुई
जिंदगी में,

हाँ ये 
सुख की बात है
 55 पार की ओरतें
जो
रिटायर होने वाली है
अपनी नौकरी से
उनके मुख पर
आभा है,
क्योकि वो हमेशा
चेकअप करवाती 
रही अपना
उसकी पेशानी
पर बल नही
क्योंकि
उसे साबुन सर्फ
में किफ़ायत
का अनुभव नही?
-शोभना चौरे

नदी

नदी
एक नदी थी अपनी,
कलकल बहती
लहराती ,इठलाती
दर्पण सी पारदर्शी
प्यास बुझाती,
भूख मिटाती
नाव  को सहारा बनाती
किनारों के मिलने का ,
न जाने !
कब ?
वो सरकारी हो गई
पहले रेत निकाली गई
फिर बिजली के नाम
सूखा दी गई
फिर दिखावे में
भर दी गई
धर्म के नाम पर
पूजी भी गई
और भर गई 
जल से नहीं!
व्यापार के
अवशेषों से
अब न प्यास
बुझती नभूख मिटती
कभी सबकी होती,
नदी
आज चंद
निजी हाथों में
सौंप दी गई।
💐💐💐💐
शोभना चौरे

Thursday, June 25, 2020

कोरोना काल

कोरोना काल

कोरोना तुम्हारा 
कोई दोष नही?
जब टी वी आया तो 
हमने उसे दोष दिया
कि परिवार को ,समाज 
को निगल गया
जब इंटरनेट आया तो
 उसको दोष दिया
की सारे संबंध 
आभासी है
और अब तुम्हें कि
तुम ने सम्बन्धों में
दूरियाँ बढ़ा दी
दरअसल हम तो यही
चाहते थे मन से,
आत्मीयता तो दिखावा थी
आज फोन पर ही
 बात करने से 
समझ जाते है अंदाज में
कि
उनको ,आपकी बात में 
कितनी रुचि है?
ये जुमला 
सही है ,
सेनिटाइजर फेक्ट्री के लिए
दवाई की खोज के लिए
कि आपदा में अवसर है
बाकी तो
ओढ़ी गई आपदा में
हम किसी को बुलाने
में भी कतराते है
और किसी के घर ,
जाने में भी।

शोभना चौरे
#कोरोना अनलॉक1#

Saturday, June 20, 2020

संस्मरण

बच्चों पर प्रेम बरसाने वाला हरकारा :- पं रामनारायण उपाध्याय 
💐💐💐💐💐💐💐💐💐

अभी हम लोग सोकर उठे भी न होते थे कि नीचे से दादा की आवाज आ जाती आओ बच्चों जल्दी से जलेबी गर्म गर्म है।
भरी गर्मी में हम चांदनी (निमाड़ में छत को चांदनी कहते है) पर सुबह की थोड़ी सी ठंडक में गहरी नींद में होते ,और बड़बड़ाते हुए उठते की इस जेठ की गर्मी में गर्म जलेबी कौन खायेगा?पर नीचे आकर जलेबी खाकर आ दादा के लाड़ से सारी गर्मी पिघल जाती ।
दादा हमे भांप जाते , फिर अपनी चिर परिचित हँसी के साथ कहते आज म्हारी वरस गांठ छे (आज मेरा जन्म दिन है) और अपनी खादी की बंडी की जेब में हाथ डाल जितनी चिल्लर होती हमें बाँट देते और इस तरह 20 मई  दादा का जन्मदिन मनाया जाता ।
वे मेरे कवि प्रोफेसर पिता पं नारायण उपाध्याय के सगे बड़े काकाजी थे ,
सादगी की  इस प्रतिमूर्ति को हम सब  दादा ही कहते थे। मेरे पिताजी / बाबूजी की रुचि काव्य में थे , उनकी प्रेरणा से ही उनकी प्रथम कृति "लोग, लोग और लोग" प्रकाशित हुई थी । वे जब भी कोई रचना लिखते बाबूजी को ज़रूर सुनाते थे । बाबूजी भी उनसे अन्तर्मन से जुड़े थे , कोई आवश्यकता होती थी ,या कोई सलाह -मशविरा लेना होता तो दोनों कुवे की जगत पर देर तक चर्चा करते थे । वे पिताजी को अपना मानस पुत्र कहते थे , काका -भतीजे की यह जोड़ी आ माखन दादा (माखनलाल चतुर्वेदी) जी की साहित्यिक गोष्ठियों में साथ -साथ जाते थे ।
जब भी आ दादा की कोई रचना का पारिश्रमिक मिलता वो उसका एक निश्चित हम सब लड़कियों में बांट देते।
 मायके से बहुत दूर रहने वाली मैं पहली लड़की थी ।।मेरी राखी मिलने के पहले ही
मुझे मनीआर्डर कर देते ।
उनका लेखन,उनका फक्कड़पन,
उनका सदैव खुशमिजाज रहना, लड़कियों बहुओं से स्नेह उनको आगे बढ़ाना ही उनको सबसे अलग बनाता है।जिसे हम सही अर्थों में "दादा" कहते है।
आ. दादा की 19वीं पुण्यतिथि पर यही कहना चाहती हूँ कि दादा आप पूरे परिवार की छाया थे,छाया है और छाया रहेंगे,,,
-शोभना चौरे उपाध्याय
इंदौर

Sunday, June 14, 2020

गाँव की बातें संस्मरण

गाँव में बेटों के के खेती सम्भालने के बाद कुछ लोग आराम से संतोष से चौपालों पर अपनी बाकी की जिंदगी गुजारते है।
पर हमारे रामेसर भाई को चैन नहीं कुछ न कुछ काम करते रहना है उन्हें चाहे वो काश्तकारी हो समाज सेवा हो या परोपकार।
बाड़ी में फूल ,फलऔर सब्जियां लगा रखी है माली बनकर जाते है फल सब्जियों को बाड़ी में उगाने से लेकर विक्रय करने का काम खुद ही कर लेते है।साथ मे उनकी सहधर्मिणी भी बराबर साथ देती है।
और हाँ वो ग्वाले भी है साथ में मिस्त्री भी याने की ऑल राउंडर😊
ये तो खूबियां मुझे मालूम है न जाने और कितनी ही कलाएं होगी जो उन्हें विशेष बनाती है।
हाँ तो कल  सुबह बरबटी की सब्जी लेकर आये हम सब आँगन में ही बैठे थे कोने में
मोगरा महक रहा था।
बरबटी देने के बाद बोले -मख या खोश बु अच्छी नई लगती तेका लेन ह ऊ  नई लगावतो। (मुझे इसकी खुशबू पसन्द नही इसलिए मोगरा नही लगाता)
मेरे मुंह से अचानक निकल गया गुलाब तो पसन्द छे (है)
और सुनते ही अपने 70 वे वर्ष में भी शर्माकर चले गए ।दरअसल भाभी का नाम गुलाब है ।
और सुबह सुबह मोगरे के साथ गुलाब भी महक उठे।

Tuesday, October 10, 2017

#यादों की पोटली #२
मुख्य द्वार पर एक पीतल की गोल कुंडी लगी होती
 उसके घुमाने पर अंदर लगी लकड़ी जो दो पल्लो पर लगी होती वो हट जाती और दरवाजा खुला जाता जिसे निमाड़ी बोली में" अग्गल" कहते ।जिसे बाहर से कोई भी खोल कर आ जाता सिर्फ रात को ही सांकल लगाई जाती थी अंदर से !
ताले चाबी का कोई रोल नहीँ था।
सुबह सुबह जब सुखलाल मामा आते प्रभात फेरी की घण्टियाँ दूसरी गली से सुनाई देती दादाजी दरवाजे की सांकल खोल देते ।
पिछला दिन दशहरे की खुशी में बीता आज दशहरा मिलने वालों की गहमा गहमी में ।
इस बीच अपना रुपया अपनी चचेरी बहनोँ बुआओं को बताने का सुख भी लूट चुके थे अब क्या करें ?उन दिनों हमारी 24 दिन की छुट्टी होती थी।
अब सब बहनोँ ने अगले दिन से रंगोली बनाने का तय किया उन दिनों रंगोली गांव में नहीँ मिलती थी
गांव के बाहर कुछ गुलाबी पत्थरो की छोटी छोटी सी खदानें थी वहाँ से पत्थर तोड़ कर लाना होता था ।
जिसे सिरगोला कहते थे
दादा दादी बहुत मुश्किल से भेजने को तैयार होते
कहते!सुखलाल ले आएगा !
पर हम भी जिद पर अड़ते और उन्हें हाँ कहनी पड़ती
मामा का काम निपटे !तब जाएं उसके आगे पीछे घूमते
तीन बहने हम और दूसरी सब मिलाकर कुल 8 से 10 हो जाते दौड़ते भागते पत्थर तोड़कर लाते।
दूसरे दिन इमामदस्ते (खलबत्ते) में कूटते छानते
और रंगोली तैयार सफेद झक।
अब रंगीन रंगोली भी चाहिए  तो दादा की स्याही की बोतल से नीला रंग,दादी के मसाले के डिब्बे से पीला रंग,और कंकू से लाल रंग कोयले से काला रंग इन सबको बनाने में दो दिन लग जाते ।
बीच बीच मे डांट मिलती (पोर ई न हो न जिमि तो लेव)
लड़कियों खाना तो खा लो।
फिर पड़ोस के घर जाना जीजी तुमने कितने रंग बनाये देखकर आना उत्साहित होकर फिर स्याही घोलना यही क्रम चलता रहता।
हाँ तो मैं बात कर रही थी मुख्य दरवाजे की दरवाजा खुलते ही दाहिने हाथ पर कचहरी(बैठक)तीन सीढ़ी चढ़कर थोड़ी ऊंचाई पर  घुसते ही खिड़की  पास खुली जगह फिर एक सीढ़ी और एक बड़ा सा गद्दा उस पर सफेद सी चादर बड़े बड़े लोट रखे हुए ,
वहीं दादा की लकड़ी की पेटी ,जिसमे उनका सारा जरूरी सामान ,उस पेटी में कई खाने (खांचे)बने होते
जिसमे करीने से कलम दवात, सुपारी सरोता, माचिस की तीलियाँ  ग्राम पंचायत के कागज और भी न जाने कितना सामान ।
पेटी की चाबी दादा के पास जनेऊ में लगी होती
हमें इंतजार रहता उस जादुई पेटी के खुलने का
और 5 पैसे का सिक्का लेने का।,😃
गद्दे के एक तरफ बड़ी सी लकड़ी के टेबल होती दो बड़ी सी कुर्सियां होती।
थोड़ी से नीचे की तरफ बड़ा सा लकड़ी का पलंग
लगा होता सिर्फ दोपहर के आराम के लिए।
पूरी दीवाल पर लकड़ी की फ्रेम में चारो तरफ मढ़ी हुई
तस्वीरें लगी रहती पूर्वजो की, सारे भगवानों की।
एक बड़ी सी घड़ी जिसमे रोज चाबी देना होता था
तब वह टन्न टन्न घण्टियाँ बजाती थी।
 पलंग की साइड की तरफ ही पंखे की रस्सी चलाने वाला मानकर दाजी बैठता।(पंखा झलने वाला)
एक बड़ा सा झालर वाला रंगबिरंगा पंखा आज भी मन बैचेन कर देता जब उसकी गिररी (चकरी) चलती
तो लगता सारा सुख इसी को चलाने में है।
जब भी दादाजी और उनके मिलने वाले  कचहरी में बैठते तो लगातार पँखा चलता ।
उस समय हम बच्चों का वहाँ प्रवेश निषेध होता।
दाहिनी तरफ कचहरी फिर लम्बा से गलियारा पार कर
बरामदा होता ।जिस तरह हमारा प्रवेश द्वार वैसे ही
गलियारे की दूसरी तरफ हूबहू वैसा ही गलियारा बायीं तरफ कचहरी वैसे ही नजारा उसका जहाँ मेरे दादाजी के काकाजी बैठते जिनको पूरा गाँव मुंशी दाजी के नाम से जानता था जो मालगुजार थे।
और इसी तरह कचहरी की दाहिनी तरफ से हूबहू वैसे ही 3 घर और थे जहाँ पर मेरे  चचेरे परदादाओ की बैठकें थी । बरामदे के बाद एक बड़ा सा आँगन था उस आँगन में एक पत्थर सी खूब चौड़ी सी बैंच बनी थी जो सारे पांचों घरों की एक होने की सबूत है आज भी
जिसे निमाड़ी में दासा कहते है।
हमारा उनकी बैठक में बेरोकटोक आना जाना था
उनसे भी 5 पैसे के सिक्के मिलने का सदा लालच रहता।दोनो घरों के बरामदे के बीच एक दरवाजा था जहां से आने जाने का अपना ही आनन्द था।
अगले दिन सुबह सुबह गोबर से दरवाजे के सामने लीपकर उस पर रंगोली बनाना ।
,आड़ी तिरछी लकीरे बनाना फिर मिटाना इस क्रम में कई घण्टे लग जाते फिर हारकर बड़ी जिजियों के पास जाना,
दूसरी बड़ी बहने बहुत अच्छी रंगोली बनाती उनकी मिन्नत करते जीजी हमारी भी बना दो ।
जिजियाँ बड़ी अच्छी होती हमारी सारी समस्याएं हल कर देती।
दशहरे के कुछ दिन बाद शहर से पिताजी और काकाजी आते तब  हमारी कूदा फांदी ,को जरा ब्रेक लग जाता।बाबूजी से सदा डर लगता।
काकाजी भी तोथोड़ा डरते क्योकि वो कॉलेज में पढ़ते और बाबूजी भी उसी कॉलेज में पढ़ाते थे।
अब हम काकाजी के आगे पीछे घूमते क्योकि वो उनके भाइयो दोस्तो के साथ मिलकर  दीपावली के लिएआकाश कंदील बनाते
रंग बिरंगी पन्नियां,बांस की लकड़ी, ल ई बनाते ।
और बहुत मेहनत के बाद खूबसूरत आकाश कंदील बन जाते।
एक साथ बनाते ऊपर तीसरी मंजिल पर जहाँ सारा सामान बिखरा रहता कोई नहीँ होता रोकने टोकने वाला।बनने के बाद अपने कंदील सब घर ले जाते।
सुबह की रंगोली जो हम उन्ही दिनों बनाते थे! तब!
पर इधर कुछ दिनों पहले जब वापिस गांव जाना हुआ तो प्रभात फेरी की घण्टियाँ फिर उन दिनों को लौटा ले
आई पर वो मार्च का महीना था किंतु गांव की बालाओ ने सुबह सुबह आँगन में पानी छींटकर रंगोली बनाकर दीपक जलाकर रखे थे।
मैंने उनसे पूछा ?
रोज बनाते हो रंगोली?
तो खुश होकर बोली- जब से गाँव मे भागवत जी हुई
तो पंडित जी ने कहा! सुबह रंगोली बनाओ दीपक जलाओ तब से हम रोज बनाते है।
कहने को सहज सी बात किंतु संस्कारो के बीज ऐसे ही
फैल गए और वो नन्ही लड़की पीढ़ियों तक सींचती रहेगी ये अनमोल फसल।
उन दिनों की तस्वीरें तो नहीं है पर आज 50 साल बाद भी उन गलियों में जब बेटियां जिजियाँ जाती है गणगौर उत्सव में तो उन्ही जगहों पर रांगोली बनाकर जो सुख
पाती है वो अवर्णीय है!!!!!