शरीर और जीव का द्वंद अविराम चलता ही रहता है ,यह द्वंद हम पर कितना हावी है .हम शरीर के इतर कुछ सोच ही नही पाते है हमारी भावनाओ के नियंत्रण में आकर रह गया है ,जीव इससे परे सोचता है| शारीरिक भावनाए सामाजिक रिश्तो पर आधारित होती है,रिश्ते मान्यताओ पर आधारित होते है मान्यताये हमने तुमने ही गढ़ी है फ़िर जीव तो कोई बंधन में नही है उसे तो बाहर आना ही होगा ,इन सबसे और इस द्वंद से उबरना ही होगा .कुछ सालो पहले स्वामी विवेकानंद इस द्वंद से बाहर आए थे ,और उन्होंने अपने गुरु श्री रामकृष्ण 'परमहंस 'की 'जीव सेवा 'इस वाणीको क्रियान्वित कर सारे विश्व को आलोकित किया था,जो आज भी उतनी ही प्रासंगिक है और आलोकित हो रही है ।
शोभना चौरे
Sunday, January 11, 2009
भारत बनाम अमेरिका
मै कभी अमेरिका नही गई, न ही मुझे अंग्रेजी आती है ,लेकिन अमेरिका के बारे में अपने रिश्तेदारों ,पडोसियों और अखबारों के माध्यम और हाँ फिल्मो में अमरीकी स्थलों की शूटिंग देखकर वहा की काफी जानकारी रखती हुँ ।
अमेरिका में इतनी सफाई है की वहा महीनों कपडे न धोओं तब भी मालूमही नही पड़ता की ये कपड़े बिना बिना धुले
है .यह कोई पैदल ही नही चलता अगर एक हरी मिर्ची भी लाना हो तो कार से जाना पड़ता है ,जबकि हमारे इंडिया
(भारत )में घर के सामने बिना पैदल चले ही ठेले पर ५रुप्ये में महीने भर की हरी मिर्च मिल जाती है .अमरीकी सड़के, अमरीकी अमरीकी शिष्टता (थेंक्यु ,सारी )अमरीकी लोग ,अमरीकी इंडियन लोग वहा की बड़ाई करते नही थकते, अपने देश में गली गली पान की पीक थूकते लोग अचानक वंहा कैसे सभ्य हो जाते हैबहुत सोचने पर भी मै कभी जान नही पाई .मेरे रिश्तेदार जब भी कभी अमेरिका से आते सभी तरह की चर्चाये होती ,मै उन्हें भारत की की समस्याए बतातीयंहा की सरकार की भर्ष्टाचार ki खबर देती तो वे लोग ओके ओके कहकर सर हिलाकर मेरी बात सुनते तब मुझे लगने लगता वे मेरी बात बात कितने ध्यान से सुनकर उनपर व्यथित होते मै आशावादी हो जाती की शायद भारत की समस्याए सुनकर यंहा की समस्यों का हल चुटकी में निकाल लेगे ,क्योकि उनके रहन सहन में समर्धि की झलक होती और मेरी ये धारणा है की प्रत्येकसमर्ध व्यक्ति हमेशा दुसरो की मदद करता है और फ़िर इन्हे तो अपने देश का अपनों का कितना दर्द है जो हर साल इंडिया में आकर अपने पुराने कपड़े जूते जर्किन और अन्य सामान अपने रिश्तेदारों में शान से बाँट जाते ।
अचानक मै उनसे पूछ बैठी ,अमेरिका में नेता लोग ,अभिनेता लोग सरकारी अधिकारी कितने इमानदार होते है न?कभी भी मने नही सुना की वहा कोई इस तरह की चोरी करता है नही व् ह कभी छापे पड़ते है ,न ही पोलिस अधिकारी कोई भ्रष्टाचार करते है कितना अच्छा है न,हमारे भारत में उनसे ये सब चीजे क्यो नही सीखते ?
तब मेरे भाई ने तपाक से उत्तर दिया दीदी वंहा पर कोई ऐसी छोटी मोटी चोरियों धोखाधादियो में विश्वास नही करता वहा तो बडे पैमाने पर हेरा फेरी स्केंडल होते है ,तब मै हतप्रभ थी और मेरी मोटी बुधि में भी ये बात समझ नही
आई .और बात आई गई हो गई ,आज जब टी वि पर पेपर में खबरों में 'सत्यम 'ghotala पढा सुना तो मुझे विश्वास हो गया की हम इंडियन (भारतीय नही)बिल्कुल अमेरिकी नक्शे कदम पर चल कर दुसरो को गरीब बनाकर ख़ुद अमीरी की हवस से ओतप्रोत होकर पूंजीवाद को बढावा देकर समाजवाद को बौना बनाने में माहिर होते जा रहे है ।
पवित्रता हम भारतीयों के आचरण में हुआ करती थी आज वो लापता होती जा रही है |
अमेरिका में इतनी सफाई है की वहा महीनों कपडे न धोओं तब भी मालूमही नही पड़ता की ये कपड़े बिना बिना धुले
है .यह कोई पैदल ही नही चलता अगर एक हरी मिर्ची भी लाना हो तो कार से जाना पड़ता है ,जबकि हमारे इंडिया
(भारत )में घर के सामने बिना पैदल चले ही ठेले पर ५रुप्ये में महीने भर की हरी मिर्च मिल जाती है .अमरीकी सड़के, अमरीकी अमरीकी शिष्टता (थेंक्यु ,सारी )अमरीकी लोग ,अमरीकी इंडियन लोग वहा की बड़ाई करते नही थकते, अपने देश में गली गली पान की पीक थूकते लोग अचानक वंहा कैसे सभ्य हो जाते हैबहुत सोचने पर भी मै कभी जान नही पाई .मेरे रिश्तेदार जब भी कभी अमेरिका से आते सभी तरह की चर्चाये होती ,मै उन्हें भारत की की समस्याए बतातीयंहा की सरकार की भर्ष्टाचार ki खबर देती तो वे लोग ओके ओके कहकर सर हिलाकर मेरी बात सुनते तब मुझे लगने लगता वे मेरी बात बात कितने ध्यान से सुनकर उनपर व्यथित होते मै आशावादी हो जाती की शायद भारत की समस्याए सुनकर यंहा की समस्यों का हल चुटकी में निकाल लेगे ,क्योकि उनके रहन सहन में समर्धि की झलक होती और मेरी ये धारणा है की प्रत्येकसमर्ध व्यक्ति हमेशा दुसरो की मदद करता है और फ़िर इन्हे तो अपने देश का अपनों का कितना दर्द है जो हर साल इंडिया में आकर अपने पुराने कपड़े जूते जर्किन और अन्य सामान अपने रिश्तेदारों में शान से बाँट जाते ।
अचानक मै उनसे पूछ बैठी ,अमेरिका में नेता लोग ,अभिनेता लोग सरकारी अधिकारी कितने इमानदार होते है न?कभी भी मने नही सुना की वहा कोई इस तरह की चोरी करता है नही व् ह कभी छापे पड़ते है ,न ही पोलिस अधिकारी कोई भ्रष्टाचार करते है कितना अच्छा है न,हमारे भारत में उनसे ये सब चीजे क्यो नही सीखते ?
तब मेरे भाई ने तपाक से उत्तर दिया दीदी वंहा पर कोई ऐसी छोटी मोटी चोरियों धोखाधादियो में विश्वास नही करता वहा तो बडे पैमाने पर हेरा फेरी स्केंडल होते है ,तब मै हतप्रभ थी और मेरी मोटी बुधि में भी ये बात समझ नही
आई .और बात आई गई हो गई ,आज जब टी वि पर पेपर में खबरों में 'सत्यम 'ghotala पढा सुना तो मुझे विश्वास हो गया की हम इंडियन (भारतीय नही)बिल्कुल अमेरिकी नक्शे कदम पर चल कर दुसरो को गरीब बनाकर ख़ुद अमीरी की हवस से ओतप्रोत होकर पूंजीवाद को बढावा देकर समाजवाद को बौना बनाने में माहिर होते जा रहे है ।
पवित्रता हम भारतीयों के आचरण में हुआ करती थी आज वो लापता होती जा रही है |
Thursday, January 08, 2009
खिड़की

सपनो और अपनों की कोई
परिभाषा नही होती ,
जेसे हवा सिर्फ़ महसूस होती है
ठीक
अपनों का व्यवहार सिर्फ़
महसूस किया जाता है
ठंडी हवा ,गर्म हवा
महसूस होते ही
हम अपने घर की खिड़की बंद कर देते है
कितु रिश्तो के गर्म और ठंडे
होने पर अपना सयम खो देते है
हवा और रिश्ते हमारे प्राण है ,
फ़िर ये खिड़की क्यो ?
परिभाषा नही होती ,
जेसे हवा सिर्फ़ महसूस होती है
ठीक
अपनों का व्यवहार सिर्फ़
महसूस किया जाता है
ठंडी हवा ,गर्म हवा
महसूस होते ही
हम अपने घर की खिड़की बंद कर देते है
कितु रिश्तो के गर्म और ठंडे
होने पर अपना सयम खो देते है
हवा और रिश्ते हमारे प्राण है ,
फ़िर ये खिड़की क्यो ?
Thursday, January 01, 2009
नव वर्ष का आगमन
कंटीली झाडियों सा वक्त,
पथरीले रस्ते सा वक्त ,
सूर्यास्त और पतझड़ सा वक्त ,
फिरकनी सा घुमाता हुआ वक्त ,
खुशी में भी टीस देता हुआ वक्त
अपनों को अपने से तोड़ता वक्त ,
गीली टहनी सा झुका हुआ वक्त
इस बेरहम वक्त से संघर्ष करता हुआ ,
गुलाब की कलियों से महकता सूर्योदय
का समय
सीधी सी पगडण्डी के किनारों पर
सजीला बहारो का समय
शांत झील सा सुंदर समय
लकड़ी के गठ्हर सा दुसरोको ,
को अपने से जोड़ता सुखद समय
इसी मेहरबान समय के साथ
नव वर्ष की बधाई एवम शुभकामनाये .
पथरीले रस्ते सा वक्त ,
सूर्यास्त और पतझड़ सा वक्त ,
फिरकनी सा घुमाता हुआ वक्त ,
खुशी में भी टीस देता हुआ वक्त
अपनों को अपने से तोड़ता वक्त ,
गीली टहनी सा झुका हुआ वक्त
इस बेरहम वक्त से संघर्ष करता हुआ ,
गुलाब की कलियों से महकता सूर्योदय
का समय
सीधी सी पगडण्डी के किनारों पर
सजीला बहारो का समय
शांत झील सा सुंदर समय
लकड़ी के गठ्हर सा दुसरोको ,
को अपने से जोड़ता सुखद समय
इसी मेहरबान समय के साथ
नव वर्ष की बधाई एवम शुभकामनाये .
Sunday, November 16, 2008
आज का विचार
क्रिक्रेट हमारा' धर्म '|
रियलिटी शो हमारा 'अर्थ'|
स्वछंदता हमारा 'काम'|
और भगवा हमारा" मोक्ष "
रियलिटी शो हमारा 'अर्थ'|
स्वछंदता हमारा 'काम'|
और भगवा हमारा" मोक्ष "
Tuesday, November 04, 2008
ऐसा क्यो होता है
ऐसा क्यो होता है ?
जंहा' फूल तोड़ना मना है '
'लिखा है '
वही पर सबसे ज्यादा फूल तोड़ते है |
जहा' नो पार्किंग 'होती है ,
वंही "विशेष "गाडिया खड़ी होती है |
जहा' धुम्रपान 'वर्जित है ,
वही "सूटेड बूटेड "
धुएं के छल्ले उडाते देखे जाते है |
जहा कचरा फेकाना मना है ,
वही पर
पोलिथिनो में बांधकर कचरा फेकते है
"कैन में पेट्रोल ले जाना मना है ,
वही पेट्रोल पम्प पर धड़ल्ले से
कैन भरी देखि जा सकती है |
हम कौनसी भाषा समझते है ,या की
समझनाही नही चाहते
मन्दिर की शान्ति को सराहते है ,
परन्तु
जूतों कीगंदगी
वहा फैला ही आते है
आप ही बताये
ऐसा क्यों होता है |
जंहा' फूल तोड़ना मना है '
'लिखा है '
वही पर सबसे ज्यादा फूल तोड़ते है |
जहा' नो पार्किंग 'होती है ,
वंही "विशेष "गाडिया खड़ी होती है |
जहा' धुम्रपान 'वर्जित है ,
वही "सूटेड बूटेड "
धुएं के छल्ले उडाते देखे जाते है |
जहा कचरा फेकाना मना है ,
वही पर
पोलिथिनो में बांधकर कचरा फेकते है
"कैन में पेट्रोल ले जाना मना है ,
वही पेट्रोल पम्प पर धड़ल्ले से
कैन भरी देखि जा सकती है |
हम कौनसी भाषा समझते है ,या की
समझनाही नही चाहते
मन्दिर की शान्ति को सराहते है ,
परन्तु
जूतों कीगंदगी
वहा फैला ही आते है
आप ही बताये
ऐसा क्यों होता है |
Wednesday, October 15, 2008
रंग
रिश्तो के अहसास ,बताने से नही होते
उनकी महक महसूस की जाती है |
फूलो की खुशबूआनंद देती है
नाम उसको सार्थक करता है |
नाम उसके रंगों की खोज करता है ,
कोई रंग सुकून देता है ,कोई आभास भर देता है |
रंगों के नाम किसने दिए ?
शायद अहसासों ,आभासों और विश्वासों ने ?
और सचमुच ये अहसास ही जीवन को पूर्ण कर गये |
उनकी महक महसूस की जाती है |
फूलो की खुशबूआनंद देती है
नाम उसको सार्थक करता है |
नाम उसके रंगों की खोज करता है ,
कोई रंग सुकून देता है ,कोई आभास भर देता है |
रंगों के नाम किसने दिए ?
शायद अहसासों ,आभासों और विश्वासों ने ?
और सचमुच ये अहसास ही जीवन को पूर्ण कर गये |
Saturday, October 04, 2008
कैसी पूजा ?कैसी संस्क्रती ?कैसी श्रद्धा ?

मन्दिरों में बेहिसाब चढावा ,
तीस से .मी .की करोडो "चुननिया ?
करोडो के पंडालों में ,थिरकते ,लाखो लोग |
विदेशो में पूजा में ,
पारम्परिक भारतीय पहनावा ,
भारत में 'आरतियों 'में
वेदेशी पहनावा |
शर्धा ऐसी की
बुढे माँ= बाप
तरसते है सहारे को ,
और मन्दिरों मे ,जुता स्टेंड पर ,
"सेवा "देकर धार्मिक" शर्धा ",से
ओतप्रोत है श्रद्धालु |
'बेठे ठाले '
व्यस्तताओ का बहाना बनाकर ,
अपनों से दूर होते जा रहे है हम लोग |
समय न होने पर भी ,
"बिग बॉस "के निठ्लो को देखकर ,निठ्ले
होते जा रहे है हम लोग |
अपनों से दूर होते जा रहे है हम लोग |
समय न होने पर भी ,
"बिग बॉस "के निठ्लो को देखकर ,निठ्ले
होते जा रहे है हम लोग |
Friday, October 03, 2008
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