Sunday, January 13, 2013

 दामिनी के लिए एक कविता 

 

"निमित्त"

मै ही सीता हूँ
जिसे
अपनी मर्यादा को
बचाने केलिए
वन भेज दिया

मैही शूर्पनखा हूँ
जिसे तुमने
प्रणय निवेदन करने पर
क्षत विक्षत कर दिया।

मै ही द्रोपदी हूँ
जिसे तुमने
अंधे के दरबार में
दांव पर लगा दिया।

कभी तुमने मर्यादा का
अहंकार किया
कभी तुमने
अपने पुरूष होने का
अहंकार किया
कभी तुमने
अपने पद का अंहकार किया
मुझे क्षत विक्षत
करके भी तुमने
मेरा ही अपहरण किया ?

मेरा चीर हरण
करके
मुझे महाभारत का
निमित्त बनाया ?

मैंने ही
तम्हें रचा ,तुम्हारा सरजन किया

तुमने मुझे

कभी बिह्डो में छोडा

कभी बाजार में बेचा

एक

सुंदर संसार की सहभागी बनू

ये समानता थी मेरी

कितु तुमने ही

मुझे कैकयी बनाया

मन्थरा बनाया

अपने ग्रंथो में,


मै चुप रही

आज तुमने मुझे

फिरसे

आदमियों के जंगल में

खड़ा करदिया है

बिकने के लिए


नही?

अब कोई मेरा
अपहरण नहीं करेगा
न ही, मेरा चीर हरण करेगा

न ही मुझे धरती में समाना होगा

न ही मुझे किसी की
जंघा पर बैठना होगा
मालूम है ?
तुम्हे
क्यो ?
क्योकि !
शक्ति ने
स्वीकार ली है,
नर- बलि |
shobhana chourey




Tuesday, December 18, 2012

मेरा शहर ,तुम्हारा शहर

सबके  अपने शहर होते है ।
कुछ सामने होते है ,
कुछ यादो में रहते है ।

चमकती बिन्दियों के सुनहरे पत्तों में
एक अदद  लाल   गोल "माथे की बिंदी "
खोजती रही  मै ,मेरे शहर में .....

सैकड़ो   तरह  की सजी  मिठाइयों के बीच 
कागज की पुडिया  में बंधे "पेड़े " की मिठास 
खोजती रही  मै , मेरे शहर में ....

मन्दिरों में बजते डी .जे .के शोर में ,,
घंटियों की सुमधुर  ध्वनि  और" हरे राम" की धुन 
खोजती रही मै, मेरे शहर में ....

मोबाईल फोन , लेपटाप की दुकानों की बाढ़ में 
मेरे बच्चों के बचपन का पुस्तकालय 
खोजती रही मै मेरे शहर में ....

अतीत क्या कभी बूढ़ा होता है ?
खोजने की जरुरत नहीं  
मेरा शहर "मार्डन  "  हो गया है 
मेरे पोते पोतियों (ग्रेंड चिल्ड्रेन )की तरह ।










Thursday, September 13, 2012

"और एक अभिलाषा "

 बहुत दिनों बाद कुछ लिख पा  रही हूँ ,इस बिच आप  सभी लोगो को थोडा थोडा ही पढ़ पाई ऐसा लगा मनो बहुत कुछ छुट रहा है कोशिश करुँगी आप सबसे जुडी रह पाऊ ।आपसभी ने मुझे समय समय पर यद् किया अनेकानेक धन्यवाद ।

नदी?
 कब ?कैसे जन्मी ?
अपनी
अनवरत यात्रा में
अनगिनत
 जीवन सींचती रही
अपने ही
 किनारों के  ।

किनारे सम्रद्ध  होते रहे,
समर्थ होते रहे  ।
यूँ तो,
 किनारे मिलते रहे
कभी नाव के सहारे
कभी पुल के माध्यम से
किन्तु,
नदी की अभिलाषा
 पनपती रही
अपने किनारों को,
आपस में जोड़ने की ।
और  ,
नदी
 अपनी ही इस जिद में
सिकुड़ती गई ,सिकुड़ती गई
और
एक दिन
सुनसान रेत
बन गई
नदी  :










Saturday, May 26, 2012

कुछ कड़ियाँ ,जो आपस में जुडती ही नहीं ?

     1.

मेरे सिरहाने
बैठी यादे
जुड़ जाती है
और
सक्रीय होकर
सपने बुन लेती है ,
अपनी कल्पनाओ की
झालरों के साथ 
       2.
फूलो की बस्ती में ,
पत्थरों का क्या काम?
रंगों की मस्ती में ,
सफेदी का क्या काम?
चंदा की चांदनी में ,
रूपसी का क्या काम?
सूरज की रौशनी में ,
चिरागों का क्या काम ?

        3.
अपराधी पिता को
बचाने
संकल्पित पुत्री को देखकर
उसी पिता के पुत्र का
उत्तर -
हाँ !वे ऐसा कर सकते है ?
उत्तराधिकारी को
परिभाषित कर गया .........












Sunday, April 08, 2012

बस कुछ यू ही ?

बहुत दिनों बाद अप सबसे मिलना हो रहा है सभी को स्नेह भरा नमस्कार |


बरसो से
कटोरा सामने रखकर
नुक्कड़ पर बैठी
कभी भी बूढी
न होने वाली
बुढिया

और
बरसो से
फुटपाथ पर
चाय और सिगरेट
बेचती
असमय ही
बूढी होती
बुढिया
मानो ,
अकर्मण्य सरकार का
लम्बा खोखला जीवन



Wednesday, November 16, 2011

ये सब यू ही नहीं ?

मेरा ये भ्रम
मुझे जीवन देता है
की चाँद ,
तुम मेरे साथ-साथ
चलते हो |
ये भ्रम ,ये आभास
ये कल्पना भी
तभी है
जब मै
तुम्हे चाँद
ही रहने देती हूँ |



तुम्हे पाऊं
तुमहारे कांधे प़र
सर रखू
ऐसी मेरी
कोई तमन्ना नहीं
तुम्हारी तरह
अपनों के काँधे
प़र बन्दूक रखू
ऐसी मेरी फितरत नहीं

तुम्हारे शब्दों के
तीर सहू
तुम्हारी अंकशायिनी बन
इतराऊं
सिर्फ
ये ही तो
मेरी किस्मत नहीं ?




Monday, September 05, 2011

बस कुछ यू ही .....

दो सामानांतर
रेखाओ को
काटती है
है एक
खड़ी लकीर |
ऐसा तुम !
कई बार कह चुके हो|

मै खोज में हूँ ?
वो अद्रश्य
खड़ी लकीर कहाँ से आई ?

तुम्हारी ख़ामोशी
मेरी ख़ामोशी
समानांतर
रेखा
तो नहीं ?

बहुत कुछ छिपाने की
तुम्हारी
ख़ामोशी

मेरे खालीपन की
ख़ामोशी को
समानांतर

कैसे मान लिया ?




Thursday, August 11, 2011

कभी कभी ......





बहुत सारे आहार है
फिर भी
निराहार
महसूस होती
जिन्दगी|

बहुत सारे आधार है
फिर भी
निराधार
महसूस होती
जिन्दगी |


जब अटे पड़े है
बाजार
कपड़ो से
फिर भी
जार जार
महसूस होती
जिन्दगी |

समुन्दर के किनारे
शिद्दत से
प्यास को
महसूस
करती है ज़िदगी |



Saturday, August 06, 2011

"सोच और सपने "

सपनो के आकाश में
चिर परिचित
मेहमान
आशाओ के ,
आकाक्षाओ के |

मन के समुंदर में
ढेर सारे मोती
खुशियों के ,
आंसुओ के |

तन के ठिकाने में
एक नई सुबह ,
एक उनींदी शाम
जागती हुई रात |

सपने
मन
तन
जिन्दगी से जुड़े
या कि ?
जिन्दगी
सपनों से
मन से
तन से
जुडी ?

Wednesday, July 06, 2011

"बस यू ही "

दुकानों की,
लम्बी कतार के बीच
मेरा मकान
कहीं खो गया है |
जाना पहचाना था
सबका
आज अजनबी हो गया है |

गगन चुम्बी इमारतों
की नीरवता
के समक्ष
खंडहर भी वाचाल
हो गया है |

सुना है ?
आलीशान फ़्लैट के
मालिक होकर भी
दो गज
"ज़मीन" की
तमन्ना रखते हो ?