Monday, May 12, 2014
Thursday, March 27, 2014
कौन पिछड़ा कौन आधुनिक ?
चुनाव ,चुनाव ,और सिर्फ चुनाव कि बाते ही चारो ओर लोग ही लोग पक गये है किन्तु घूमफिरकर वही बाते होने लगती है जयपुर से इंदौर आते वक्त ट्रैन में आप कहाँ जायेगे ?आप कहाँ जायेगे ?और एक गहरी मुस्कुराहट के बाद चर्चा शुरू आमने सामने वाले महानुभाव अपने अपने प्रदेश के नेताओ कि अपने ढंग से व्याख्या में व्यस्त (हाँ ये बात और है कि आज के नेता कि बात करना कितना महत्व रखता है )एक बुजुर्ग और और एक ३५ से से ३८ साल के युवक कि बातचीत -सबसे बड़ी पार्टी का तो सफाया ही हो गया दीखता है हमारे प्रदेश में कितनी तरक्की हुई है सड़के ,पानी ,बिजली सब सुगमता से उपलब्ध हो रहे है किसी जमाने में जहाँ पाँच घंटे लगते थे अब दो घंटे में पहुँच जाते है -देखिये नेताजी कि अभी लालसा जाती नहीं है उनकी बेटी ने आत्महत्या कर ली ,बेटा आजीवन जेल में ,पांव से चल नहीं सकते अपने दल के साथ जाते हुए तिन किलोमीटर पहले ही हेलीकाप्टर मंगा कर वापिस आ गये और उसके बाद ही पुरे दल पर हमला हो गया सभी मारे गये मैंने अपनी किताब पढ़ते हुए उस युवक को देखा जो यह बात उन बुजुर्ग को बता रहा था स्वाभाविक स्वीकृति थी उसके इस कथन में ,और शांत भाव !और बुजुर्ग जो सब कुछ जानकर भी यह प्रकट कर रहे थे मानो वो यह पहली बार सुन रहे थे! अच्छा ?उसके पहले लगभग वो ,अपना सारा राजनितिक ज्ञान ,अपनी नौकरी में उन्होंने क्या किया ,कितने सेमिनार लिए कितनी समाज सेवा कि सब कुछ बता दिया था | इस बीच ऐ सी थोडा बढ़ गया था उन्होंने अपनी पत्नी ( जो चुपचाप बैठी थी ) को आदेश दिया जरा मफलर, टोपी, स्वेटर निकाल !दो कही गला नहीं पकड़ ले ?पत्नी ने भी यंत्रवत सभी चीजे निकाल दी फिर ऐ . सी नार्मल हुआ तो उन्होंने फिर सारा सामान निकालकार पत्नी के हाथ में दे दिया | यह क्रम दो बार चला |
इसी बीच युवक का छोटा बच्चा रोने लगा और बच्चे को पापा के पास ही आना था और बातचीत का सिलसिला भी रुक गया |
इतने चुनावी माहौल में गहरे राजनितिक विश्लेषण से अनभिज्ञ साइड कि बर्थ पर एक युवती अपने मोबाईल के साथ समय बिताती बिच में हमे बताती हुई कि गाड़ी कितनी लेट चल रही बताती जा रही थी जो कि उसका भाई दिल्ली से बताता जा रहा था, वः अपने मायके भोपाल जा रही और देवास में उसके माता पिता उसे लेने आये थे मायके जाने का असीम उत्साह उसके हाव भाव से झलक रहा था हो भी क्यों न ? एक स्त्री कितनी भी बूढी हो जाय उसके मायके का आकर्षण सदैव सर्वोपरि होता है फिर उसकी शादी को महज डेढ़ साल ही हुआ था ,इतनी दूर जोधपुर और भोपाल कि दुरी उसके लिए युगो के सामान बीत रही थी | ,
उसने मुझसे सहज ही पूछ लिया आंटी -आपको जयपुर कैसा लगा मैं तो जयपुर कि कायल हो गई थी |
मैंने उससे पूछा ?जोधपुर कहते है जयपुर से ज्यादा सुन्दर है | उसने जवाब दिया -सुन्दर तो है पर जयपुर से २० साल पीछे है और भोपाल से तो तीस साल |
मैंने उससे पूछा किस रूप में तुम पीछे मानती हो ?
मुझे घूंघट निकलना पड़ता है ,पूरा चेहरा ढंका होना चाहिए मेरे मायके से विपरीत माहोल है
हाँ लेकिन हमारे पापाजी (ससुरजी )हमें बहुत प्यार करते है मेरा बहुत ध्यान रखते है किन्तु मेरी इच्छा होती है अपने पापा कि तरह मै उनसे बात करू ?जो भी बात करनी होती है मम्मीजी के द्वारा ही कर सकते है |
तो है न पिछड़ापन ?
मैंने कहा -परम्पराओ को निभाना पिछड़ापन तो नहीं है !
उसका कहना था -हाँ ये तो है और घर में मुझे कोई पाबंदी नहीं मेरे माता पिता सर्विस करते है मई भी शादी के पहले करती थी . ससुरजी ने कहा - बेटा अपनी पढ़ाई आगे बढ़ाओ तुम्हे अभी सर्विस कि जरुरत नहीं है मेरे पति भी यही चाहते है मै आगे पढू और मैंने उसे जारी रखा है . और घर में सब मेरे जेठ, जेठानी, सास सब बहुत ध्यान रखते है सास जरा उदास देखती है तो अपने बेटे से कहती है बहू को पिज़ा खिलाओ ,चाट खिलाओ
बाहर ले जाओ |
तब तो तुम्हारा परिवार बहुत प्रगतिशील है मैंने कहा -
अब वो भी अपना सामान संमहालने में लग गई क्योकि देवास आने वाला था और वो मुस्कुराते हुए उतर गई उसके उतरने के बाद डेढ़ घंटे का समय उस डिब्बे में ध्यान स्थल कि तरह बीता क्योकि उसकी बाते ,अपने घर का जीवंत वातावरण वर्णन कर हँसते हुए अपनी सोच को कुछ क्षणों में परिवर्तित कर परिवार के साथ सामंजस्य बिठाना उसके आत्मविश्वास कि महक दे गया था |
और चुनाव , नेता , बड़ी बड़ी बाते,आरोप प्रत्यारोप , देश को बनाते है ?या ऐसी फुलवरिया जो फूलती कही और है और खुशबू बिखेरती है वहाँ, वो जहाँ गूँथ दी जाती है -------
इसी बीच युवक का छोटा बच्चा रोने लगा और बच्चे को पापा के पास ही आना था और बातचीत का सिलसिला भी रुक गया |
इतने चुनावी माहौल में गहरे राजनितिक विश्लेषण से अनभिज्ञ साइड कि बर्थ पर एक युवती अपने मोबाईल के साथ समय बिताती बिच में हमे बताती हुई कि गाड़ी कितनी लेट चल रही बताती जा रही थी जो कि उसका भाई दिल्ली से बताता जा रहा था, वः अपने मायके भोपाल जा रही और देवास में उसके माता पिता उसे लेने आये थे मायके जाने का असीम उत्साह उसके हाव भाव से झलक रहा था हो भी क्यों न ? एक स्त्री कितनी भी बूढी हो जाय उसके मायके का आकर्षण सदैव सर्वोपरि होता है फिर उसकी शादी को महज डेढ़ साल ही हुआ था ,इतनी दूर जोधपुर और भोपाल कि दुरी उसके लिए युगो के सामान बीत रही थी | ,
उसने मुझसे सहज ही पूछ लिया आंटी -आपको जयपुर कैसा लगा मैं तो जयपुर कि कायल हो गई थी |
मैंने उससे पूछा ?जोधपुर कहते है जयपुर से ज्यादा सुन्दर है | उसने जवाब दिया -सुन्दर तो है पर जयपुर से २० साल पीछे है और भोपाल से तो तीस साल |
मैंने उससे पूछा किस रूप में तुम पीछे मानती हो ?
मुझे घूंघट निकलना पड़ता है ,पूरा चेहरा ढंका होना चाहिए मेरे मायके से विपरीत माहोल है
हाँ लेकिन हमारे पापाजी (ससुरजी )हमें बहुत प्यार करते है मेरा बहुत ध्यान रखते है किन्तु मेरी इच्छा होती है अपने पापा कि तरह मै उनसे बात करू ?जो भी बात करनी होती है मम्मीजी के द्वारा ही कर सकते है |
तो है न पिछड़ापन ?
मैंने कहा -परम्पराओ को निभाना पिछड़ापन तो नहीं है !
उसका कहना था -हाँ ये तो है और घर में मुझे कोई पाबंदी नहीं मेरे माता पिता सर्विस करते है मई भी शादी के पहले करती थी . ससुरजी ने कहा - बेटा अपनी पढ़ाई आगे बढ़ाओ तुम्हे अभी सर्विस कि जरुरत नहीं है मेरे पति भी यही चाहते है मै आगे पढू और मैंने उसे जारी रखा है . और घर में सब मेरे जेठ, जेठानी, सास सब बहुत ध्यान रखते है सास जरा उदास देखती है तो अपने बेटे से कहती है बहू को पिज़ा खिलाओ ,चाट खिलाओ
बाहर ले जाओ |
तब तो तुम्हारा परिवार बहुत प्रगतिशील है मैंने कहा -
अब वो भी अपना सामान संमहालने में लग गई क्योकि देवास आने वाला था और वो मुस्कुराते हुए उतर गई उसके उतरने के बाद डेढ़ घंटे का समय उस डिब्बे में ध्यान स्थल कि तरह बीता क्योकि उसकी बाते ,अपने घर का जीवंत वातावरण वर्णन कर हँसते हुए अपनी सोच को कुछ क्षणों में परिवर्तित कर परिवार के साथ सामंजस्य बिठाना उसके आत्मविश्वास कि महक दे गया था |
और चुनाव , नेता , बड़ी बड़ी बाते,आरोप प्रत्यारोप , देश को बनाते है ?या ऐसी फुलवरिया जो फूलती कही और है और खुशबू बिखेरती है वहाँ, वो जहाँ गूँथ दी जाती है -------
Friday, March 14, 2014
भरत कि आस्था
मुझे राजनीती में कोई रूचि नहीं है शुरू से ही, न ही कभी रूचि ली ,किन्तु आजकल टी वि पर, फेस बुक पर वही रंग बिखरा है तो कुछ छींटे हम पर भी पड़ गए अब थोड़े छीटे पड़े है तो लगता है कुछ समझ भी आने लगी है ?शायद सत्ता का इससे सीधा संबंध है । छोड़िये भी कहा? मैं और कहाँ भारत कि राजनीती? सूर्य को चिराग दिखाने जैसा ही होगा ?इधर कुछ खास काम नहीं होने से जब भी खाली रहती हूँ अपनी थोड़ी सी किताबो को झाड़ लिया करती हूँ झाड़ते झाड़ते उन्हें पढ़ते पढ़ते झाड़ पोंछ आधी ही रह जाती है, उसी क्रम में आज दादा कि किताब "धुंधले कांच कि दीवार "पढ़ना शुरू किया तो उनका यह ललित निबंध "भरत "मन को छू गया और लगा कि आज भी कितना प्रासंगिक है .यह किताब सन १९६६ में प्रकाशित हुई थी।
प्रश्न जब सर उठाते है -
इस शीर्षक में दादा ने राम ,सीता और भरत को अपनी भावनाओ में पिरोकर विषय को रेखंकित किया है -
" भरत "
राम के वन में चले जाने के पश्चात् शोकमग्न और हड़ताल ग्रस्त अयोध्या में आकर भरत सोचते है कि ,--"आखिर यह सब देखना भी मेरे भाग्य में बदा था . जिस व्यक्ति ने स्व्प्न में भी राज्य कि इच्छा नहीं कि ,जिस व्यक्ति ने पिता कि तरह अपने बड़े भाइयो का सम्मान किया ,जिस व्यक्ति ने अपनी माँ और सौतेली माँ में भेद नहीं जाना और जिस व्यक्ति को महलो में रहकर भी ऐश्वर्य कि भूख छू तक नहीं गई उसी के नाम पर यह सब नाटक खेला गया !
बहुत कुछ सोचने पर भी मैं समझ नहीं पाता ,कि जिस घर में सदा शांति रही ,जहाँ माता से भी बढ़कर पिता कि आज्ञा मानी गई ,जहाँ छोटे बड़ो का सम्मान करते आये जहाँ बड़ो से छोटो को स्नेह मिलता आया ,जहाँ किसी वस्तु तो दूर ,किसी विचार तक को लेकर किसी के चेहरे पर शिकन तक न आई वहाँ यह सब हुआ . कैसे ?किशोरावस्था में भी भाइयो के बीच कभी लड़ाई नहीं हुई उन्ही भाइयो के बीच" युवराज पद "के लिए विवाद होगा ,इस "विषाक्त अंकुर" का जन्म कहाँ से हुआ ?
कुछ लोगो का कथन है कि पिता के द्वारा दिए गये वचनो के कारण ही यह दिन देखने को मिला !लेकिन उन वचनो को दिए हुए तो एक अरसा हुआ ,जिस माँ के मन में उन्हें भुनाने के लिए ऐसा हल्का विचार आ सकता है ,उसमे उसे इतने दिनों तक छुपाने का गांभीर्य कहा से आया ?
कुछ लोगो का मत है कि दासी के कहने से माँ कि मति मारी गई !लेकिन जो एक संस्कार सम्पन्न घराने कि राजरानी रही ,जिसे एक आदर्श पति कि पत्नी आदर्श पुत्र कि माता और आदर्श परिवार कि गृहणी होने का गौरव प्राप्त हुआ हो ,उसका एक तुच्छ दासी के बहकावे में आना कहाँ तक न्याय संगत है ?
इसी बीच एक विचार उनके दिमाग में बिजली कि तरह कोंध जाता है और वे गुनगुनाते है --
"अरे मैं भी कैसा पागल हूँ ,एक साधारण सी बात मेरे समझ में नहीं आई ,जिस घर को आदर्श घर बनाने में परिवार ने कोई कसर न उठा रखी हो उसी घर में" सत्ता "का एक "विषवृक्ष" भी फलता फूलता आया है !उसकी छाया तले सभी सुख और संतोष अनुभव करते आये ,लेकिन उसके विषाक्त फलो कि और किसी ने ध्यान नहीं दिया ?कमजोर से कमजोर व्यक्ति भी अपनी भूख पर विजय प्राप्त कर सकता है" सत्ता कि भूख "पर विजय पाना मुश्किल है । सो अपने घर के आँगन मेंउसी खूबसूरत से दिखने वृक्ष में जब " युवराज पद "का फल लगा ,तो" राजमाता "खलने कि इस सर्वभक्षी भूख ने ही ममतामयी माँ कि मति को हर लिया | यदि इसका शीग्र इलाज नहीं किया तो समुचा परिवार छिन्न भिन्न हो जाने वाला है "|
और तभी उनकी आँखों में राजसिहांसन को ठुकराकर वन कि रह जाते हुए भगवान राम कि नंगी पगथलियों का चित्र छा जाता है और वे गीली आँखों उन्ही कि खोज करते हुए वन कि रह चले जाते है |
कहते है उन्ही पादुकाओं को लेकर उन्होंने भारतवर्ष की डूबती हुई परिवार व्यवस्था को बचा लिया था ।
-पंडित रामनारायण उपाध्याय
"धुंधले कांच कि दीवार "
Friday, February 14, 2014
स्नेह का कोई मापदंड नहीं .......
खून के रिश्ते तो अपने ही होते है जिनके लिए पारिवारिक सामाजिक कार्यक्रम होते ही है और जो इस बहाने से निभाए ही जाते है कितु कोई सिर्फ पाँच या छ्ह मुलाकातो में इतनी आत्मीयता भर देता है कि मेरा अपना ये मिथक भी टूट जाता है कि सहेलियाँ ,दोस्त सिर्फ स्कूल कालेज में ही बन पाते है। मेरी उससे सिर्फ पाँच साल पहले एक अध्यात्मिक शिविर में मुलाकात हुई जहाँ हम दोनों को साथ में रहना था बस फिर क्या था हमनेअपनी सारी रात बातो में बाँट ली और सुबह के चार बज गये आश्रम में मंगला आरती का समय हो गया फिर पूरा दिन सारे सत्रों में हिस्सा लिया और साँझ को विदा हो लिए। उसके कई महीनो तक मिलना नहीं हुआ फिर एक बार फोन पर बात हुई उसको अपने घर कि नपती करवानी थी हमारे कोई परिचित थे उन्होंने उनकी मदद कर दी. अपने पति कि असामयिक म्रत्यु के बाद अपनी दो लड़कियो के साथ वो इंदौर में रह रही थी क्योकि आखिरी में यही पदस्थ हुए थे जिला चिकित्सालय में वरिष्ठ चिकित्सक के पद पर। अपनी ईमानदारी के कारण उनकी मौत संदिग्ध ही रही जिसके लिए उसने बहुत कोशिश कि बहुत दौड़ धुप कि सच सामने लाने ले लिए किन्तु दोनों बेटियो कि परवरिश और अपनी नौकरी उसकी व्यस्तता के चलते ज्यादा जानकारी जुटा नहीं पाई ,इस बीच बड़ी बेटी कि शादी की वो विदेश में बस गई छोटी बेटी कि नौकरि मुम्बई में लग गई वो खुद भी अपने स्त्री रोग विशेषज्ञ चिकित्सक के पद से रिटायर्ड हो गई। इस बीच मेरा रहना भी ज्यादातर बेंगलुरु में ही रहा मिलना भी नहीं हुआ और न ही कोई बातचीत। अभी पिछले साल अचानक आश्रम में मिलना हुआ न ही कोई शिकवा शिकायत बस स्नेह से मिले और विदा ले ली। एक दिन फोन पर बात कि दीदी!( हम उम्र होने के बाद भी मुझे वो दीदी ही कहती ) आपकी सिस्टर मुम्बई में है मई भी बेटी के साथ वाही रहूंगी मैंने उससे सम्पर्क करवा दिया दोनों भी अच्छी मित्र बन गई पिछले साल अगस्त में इंदौर आई थी बहन भी मैं भी तब उसने आग्रह कर हमे बुलाया और नाश्ते के साथ आलू के परांठे भी पैक कर दिए।
उसके बाद फोन पर ही बात हुई। निशुल्क सबका उपचार और स्नेह के बोल उसके मरीजो के लिए वरदान था।
इसी के तहत ,बहन ने उसके फोन पर बात करनी चाही तब दो दिन बाद उसकी बेटी ने फोन उठाया और कहा -
आंटी आपको मालूम नहीं ?मां तो नहीं रही। बहन ने फोन रख दिया तुरंत मुझे फोन किया अलका दीदी नहीं रही मैं भी कुछ बोल ही नहीं सकी । इतनी दूर यह खबर हम दोनों बहनो के लिए स्तब्ध करने वाली थी.
अपनी बेटी के साथ वो अपने पति के केस कि पेशी के लिए ४ तारीख को इंदौर आई और ५ तारीख को ह्रदयगति रुकने के कारण अपनी देह का त्याग कर दिया अपने उस घर में, जिसके लिए उन्होंने करीब १५ दिन पहलेमुझे फोन किया था ;दीदी आपकी पहचान का कोई वकील हो तो बताइयेगा मैं अपने दोनों फ्लैट अपनी बेटियो के नाम करवाना चाहती हूँ ,दीदी मैं आपसे बात करती हूँ तो मुझे लगता है आप मेरे अपने हो। और वही अपनी, जिसका कि हमारे साथ जयपुर के रामकृष्ण मंदिर उद्घाटन में जाने का टिकिट था हमे बीच में ही छोड़कर अपना टिकिट लेके चली गई।
मेरे पास उसका कोई छाया चित्र नहीं है कितु वो मेरे दिल दिमाग पर ऐसी छाई है कि मैं बार बार अपने आंसू नहीं रोक पा रही हूँ .....
उसके बाद फोन पर ही बात हुई। निशुल्क सबका उपचार और स्नेह के बोल उसके मरीजो के लिए वरदान था।
इसी के तहत ,बहन ने उसके फोन पर बात करनी चाही तब दो दिन बाद उसकी बेटी ने फोन उठाया और कहा -
आंटी आपको मालूम नहीं ?मां तो नहीं रही। बहन ने फोन रख दिया तुरंत मुझे फोन किया अलका दीदी नहीं रही मैं भी कुछ बोल ही नहीं सकी । इतनी दूर यह खबर हम दोनों बहनो के लिए स्तब्ध करने वाली थी.
अपनी बेटी के साथ वो अपने पति के केस कि पेशी के लिए ४ तारीख को इंदौर आई और ५ तारीख को ह्रदयगति रुकने के कारण अपनी देह का त्याग कर दिया अपने उस घर में, जिसके लिए उन्होंने करीब १५ दिन पहलेमुझे फोन किया था ;दीदी आपकी पहचान का कोई वकील हो तो बताइयेगा मैं अपने दोनों फ्लैट अपनी बेटियो के नाम करवाना चाहती हूँ ,दीदी मैं आपसे बात करती हूँ तो मुझे लगता है आप मेरे अपने हो। और वही अपनी, जिसका कि हमारे साथ जयपुर के रामकृष्ण मंदिर उद्घाटन में जाने का टिकिट था हमे बीच में ही छोड़कर अपना टिकिट लेके चली गई।
मेरे पास उसका कोई छाया चित्र नहीं है कितु वो मेरे दिल दिमाग पर ऐसी छाई है कि मैं बार बार अपने आंसू नहीं रोक पा रही हूँ .....
Tuesday, February 11, 2014
बस यू ही
एहसान का नाम मत दो
मै कोई प्रतिद्वंदी नहीं तुम्हारी
बस जरा सा सहयोग कर ले
ये आदत है हमारी .
मै कोई प्रतिद्वंदी नहीं तुम्हारी
बस जरा सा सहयोग कर ले
ये आदत है हमारी .
Wednesday, February 05, 2014
उजाले की ओर
अभी दो दिन पहले द्वितीया तिथि में चाँद एक बारीक़ लकीर सा अपना सोंदर्य बिखेर रहा था . तभी मन में ये विचार आये।
चाँद ने हसिये (दराती )का रूप धरा
सूरज ने बादलों में अपने को ढंका
प्रभात कि बेला में धुंध ने अपना राग छेड़ा
गोधूलि बेला में ,उड़ती रज से अंधकार हुआ
बता ऐ उजाले तुझे मैं कहाँ पाऊ ?
(चित्र गूगल से साभार )
चाँद ने हसिये (दराती )का रूप धरा
सूरज ने बादलों में अपने को ढंका
प्रभात कि बेला में धुंध ने अपना राग छेड़ा
गोधूलि बेला में ,उड़ती रज से अंधकार हुआ
बता ऐ उजाले तुझे मैं कहाँ पाऊ ?
(चित्र गूगल से साभार )
Wednesday, January 29, 2014
"भारत कि समृद्धि "
बहुत सी बाते दिमाग में चलती रहती है , सन 2008 में जब ब्लॉग लिखने की शुरुआत की थी तब ये विचार व्यक्त किये थे कविता के माध्यम से, उसमे से कितनी बाते आज भी उतनी ही प्रासंगिक लगती है और कितनी बातो के परिणाम भी देखने को मिल गये है जैसे -आसाराम का पाखंड उजागर होना। टेलीविजन का सच आदि अदि।अभी अभी हम गणतंत्र दिवस मना के बैठे है और लगा कि तंत्र के क्या हाल है ,क्या हाल हो गया है ?
गणतंत्र दिवस के बाद कुछ सकल्प ऐसे हो.......
.नेता लोग भाषण देना छोड़ दे |
कवि लोग ताना देने वाली कविता करना छोड़ दे|
मौसम विभाग मौसम की भविष्य वाणी करना छोड़ दे |
धर्म गुरु उपदेश देना छोड़ दे |
इन्सान सपने देखना छोड़ दे|
टेलीविजन समाचार चैनल सनसनी फैलाना छोड़ दे |
टेलीविजन पर धार्मिक सीरियल दिखाना छोड़ दे |
अखबारों के संपादक सच लिखना छोड़ दे |
भारत के लाखो, करोडो श्रद्धालु प्रवचनों में जाना छोड़ दे |
गरीबी ,अशिक्षा और बेरोजगारी के नाम पर ,
राजनीती करने वालो,
क्रप्या राजनीती करना छोड़ दे |
माँ बाप अपनी बहू बेटियों को ,बच्चो को
टेलीविजन के रियलिटी शो में भेजना छोड़ दे
अर्थशास्त्री बाजार के उतर चढाव की ,
भविष्यवाणी करना छोड़ दे |
ज्योतिषी जीवित रहने के उपाय बताना छोड़ दे |
और अगर हो सके तो शिक्षक कोचिंग क्लास चलाना छोड़ दे |
शोभना चौरे
कवि लोग ताना देने वाली कविता करना छोड़ दे|
मौसम विभाग मौसम की भविष्य वाणी करना छोड़ दे |
धर्म गुरु उपदेश देना छोड़ दे |
इन्सान सपने देखना छोड़ दे|
टेलीविजन समाचार चैनल सनसनी फैलाना छोड़ दे |
टेलीविजन पर धार्मिक सीरियल दिखाना छोड़ दे |
अखबारों के संपादक सच लिखना छोड़ दे |
भारत के लाखो, करोडो श्रद्धालु प्रवचनों में जाना छोड़ दे |
गरीबी ,अशिक्षा और बेरोजगारी के नाम पर ,
राजनीती करने वालो,
क्रप्या राजनीती करना छोड़ दे |
माँ बाप अपनी बहू बेटियों को ,बच्चो को
टेलीविजन के रियलिटी शो में भेजना छोड़ दे
अर्थशास्त्री बाजार के उतर चढाव की ,
भविष्यवाणी करना छोड़ दे |
ज्योतिषी जीवित रहने के उपाय बताना छोड़ दे |
और अगर हो सके तो शिक्षक कोचिंग क्लास चलाना छोड़ दे |
शोभना चौरे
Friday, January 03, 2014
"बस अब"
ज़ुबान खामोश है
पर दिल बैचेन है
पर दिल बैचेन है
आँखे ढूँढती है,
समुंदर
डूबने के लिए
समुंदर
डूबने के लिए
अहसासो की चुभन
जीने नही देती
जीने नही देती
बस अब
एक कतरा
ज़िदगी की धूप दे दो |
चाँदनी अब
सोने नही देती
ज़िदगी की धूप दे दो |
चाँदनी अब
सोने नही देती
बारिश आँसू सूखने नही देती
बसंत सिर्फ़
दर्द दे जाता है
दर्द दे जाता है
बस अब
एक कतरा
जिंदगी की धूप दे दो |
जिंदगी की धूप दे दो |
मन के टूटे तारो को
छूटे हुए सहारों को
छूटे हुए सहारों को
बादल राग भी
जुड़ा नही पाता
बस अब
एक कतरा
जिन्दगी कि धूप दे दो |
ध्यान और जप के सारथि
आज रथहीन नज़र आते है
योगी भी अर्थ के साथ चलकर
अर्थहीन नज़र आते है
जुड़ा नही पाता
बस अब
एक कतरा
जिन्दगी कि धूप दे दो |
ध्यान और जप के सारथि
आज रथहीन नज़र आते है
योगी भी अर्थ के साथ चलकर
अर्थहीन नज़र आते है
बस अब
एक कतरा
जिंदगी की धूप दे दो |
शोभना चौरे
जिंदगी की धूप दे दो |
शोभना चौरे
Monday, December 30, 2013
पूजा और फल
ईश्वर को याद करने के,उसकी आराधना करने के हरेक व्यक्ति के अपने तरीके होते है। अपनी माँ को हमेशा पूजा के बजाय पाठ करते ही देखा क्योकि घर के देवी देवताओ कि पूजा सिर्फ दादाजी ही करते थे घर कि महिला का पूजा घर उसका रसोईघर था ,जब माँ अपने कर्त्तव्यों से निवृत हुई तो पठन पाठन को ही अपनी पूजा माना, जिसमे उनकी दैनिक प्रातः संस्कृत में गाई गई प्रार्थना घर के वातावरण को मंदिर बना देती।
उनके इस नियम में शुचिता का कोई खास महत्व नहीं था,और जब विदा ली हम सबसे तो नर्मदा किनारे अपना बचपन बिताने वाली माँ ने बस में नर्मदाष्टक बोलकर खंडवा- इदौर के रास्ते में माँ नर्मदा के दर्शन कर अपने को माँ को समर्पित कर दिया फूलो कि तरह। आज एक पारिवारिक कार्यक्रम में इसी तरह से चर्चाये चल रही थी सबकी अपनी अपनी पूजा के बारे में और उसके फल के बारे में, हम मध्यमवर्गीय लोगो कितनी भी गीता पढ़ ले पर अपने कर्म, फल के साथ ही जोड़ते है, मेरी दादी चाय पीती थी उसके छीटे भी भगवान को अर्पण करती थी ,इतने में एक भाभी बोल उठी मेरी माँ सुबह से घूमने निकलती और ढेर सारे फूल तोड़ कर लाती है बरसो से ,हम सब कहते- इतने फूल क्यों चढ़ाती हो ?वो कहती -फूलो कि तरह जाउंगी खुशबु बिखेरती बिना किसी को तकलीफ दिए। ईश्वर ने उनके फूल भी स्वीकार कर लिए।
Monday, December 16, 2013
"आ अब लौट चले "
एक वैवाहिक समारोह में मेरी एक चचेरी भतीजी मिली बहुत दिनों बाद ,पारिवारिक कुशल क्षेम पूछने के बाद वह मेरा हाथ पकड़ कर एक तरफ ले गई भीड़ से दूर लेकिन बड़ी स्थिर और शांत चिंत लग रही थी मेरे मन में बड़ी उथल पुथल मच गई थी एक उस मिनट में। वहाँ पड़ी कुर्सी पर बैठकर उसने मुझे कहा- आपने देखा बुआ !उस लाल शर्ट वाले भाई साहब को जो कि मेरी भतीजी के मौसी के लड़के थे ,मैंने कहा उसमे देखना क्या वो तो हर कार्यक्रम में आते है हमेशा मिलते है समाज में बड़ा नाम है उनका , बहुत सारी सामाजिक जिम्मेवारिया निभाई है उन्होंने ,सबसे हंसकर मिलते है और फिर तुम्हारे तो भाई ही है न ?उसमे नया क्या है ?
वही तो आपको बताने जा रही हूँ आज तक वो जब सबसे गले लगाकर मिलते रहते थे आज तो सबको नमस्कार कहकर सबसे मिल रहे है और आज मुझे, मेरे मन में शांति मिल रही है कि जब वो मुझे गले लगाकर मिलते थे तो मुझे उस लिजलिजे अहसास से मुक्ति मिली -आज उन्होंने नमस्कार कहकर मुझसे पूछा और छोटी कैसी हो ?
ओह तो ये बात है,तूने तो पहले कभी बताया नहीं ?
कैसे बताती बुआ वो मेरे भाई जो थे ?
भाई ऐसे होते है क्या ?मैंने कहा
बुआ ;वो कभी कभार ही मिलते थे न ?
लेकिन बुआ कोई बात नहीं आप ज्यादा सोचो नहीं? शायद उन्होंने आमिर खान का प्रोग्राम देखकर ,या कि आज कल जितने तथाकथित बड़े लोगोका जो हश्र हो रहा है ,या कि अपनी हिटलर बीबी कि डांट खाकर अपनी हरकतो को सुधार लिया हो ? देर आये दुरुस्त आये। इतना कहकर भतीजी मुझे हाथ पकड़कर भीड़ में वापिस ले आई फिर भी मैंने पूछा ?तूने मुझे ये सब क्यों बताया जब तेरे पास ही समाधान है या फिर तूने उन्हें उनकी हरकतो के लिए माफ़ कर दिया ?
उसने खाने कि प्लेट हाथ में लेते हुए कहा -बुआ आप ब्लॉग शलाग लिखते हो तो लोगो को बता सको कि अब लोग सम्भलने ,लगे है और न न न आप चिंता न करो अब ऐसी हरकतो पर सबक सिखाना भी हम जान गई है
और मैं प्लेट पकडे -पकडे सोचती और सोचती रह गई इस परिवर्तन के अहसास को।
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