स्कूल कालेज में लिखने का बहुत ही शौक था |आज कि तरह उन दिनों इतनी आसानी से स्टेशनरी नहीं उपलब्ध कराई जाती थी घर से |बड़ी मितव्ययता और सादगी भरा जीवन होता था |इतनी हिम्मत नहीं होती थी कि पिताजी से कह सके की
हमे एक डायरी खरीद कर ला दे |वैसे भी पिताजी से बहुत डरते थे
थोड़ी ही बोलचाल
थी | पिताजी आगे के कमरे में तो हम सब बहने अन्दर के कमरे में ही रहते |हमारी सारी आवश्यकताये हमारे दादाजी ही पूरी करते पर डायरी कि मांग तो लक्जरी ही थी! उस समय |टालते रहे दादाजी! भी ..भले ही मै कितनी भी लाडली थी? मैंने भी सोच रखा था लिखूंगी तो डायरी में ही !
छोटी बहन ने स्कूल में एन .सी .सी .ले रखा था उसे डायरी जरुरी थी तो उसे ला दी गई अब कविताओ कि क्या बिसात एन .सी सी के सामने ?उसने तो तो कुछ डायरी मेंटेन नहीं कि एक दो पेज भरे थे मैंने उसे
पटा पुटा कर डायरी ले ली |
और अपना पहला लेख लिखा जब बी .ए .प्रथम वर्ष में थी यानीकी सन 1971 में |
उसके बाद कुछ कविताये भी लिखी |


किन्तु किसी को बताने कि हिम्मत नहीं होती थी छपवाना तो दूर कि बात है |फिर डायरी कहाँ रखा गई पता ही न चला लिखने कि गति भी
कम हो गई पढाई और घर का काम फिर नया जीवन |शादी हो गई |ससुराल में लेखन कार्य सोच भी नहीं सकते कुछ कुछ "सारा आकाश "फिल्म जैसे हाल थे |
मुंबई का नया जीवन ?तब तो वहां हर चीज के लिए राशन ,मिटटी का तेल ,चावल आदि के लिए लाइन लगाना होता था |
ये सब कार्य
गृहणी के ही होते थे |
अभी कुछ महीने पहले भाई ने पैत्रक घर बदला और सारा पुराना सामान व्यवस्थित किया तो मेरी डायरी
मिली जिसे मै तो भूल ही चुकी थी हालत थोड़ी खराब है ,किन्तु
लेख सही सलामत है मेरी ख़ुशी का कोई ठिकाना नहीं ?
तो चलिए आज आपको भी अपना ऐतिहासिक प्रथम लेख पढवा ही देती हूँ |
मनुष्य वही है जो हर गम को ख़ुशी ख़ुशी गले लगा ले |जीवन में सुख दुःख तो ही है ,कई गमो के गुजरने के बाद ही सुख कि मंजिल प्राप्त होती है ,अतएव दुःख को भी जीवन कि सच्चाई मानकर चले तो उसका कोई बोझ महसूस नहीं होगा |मनुष्य को अपने लिए नहीं ?वरन दूसरो के लिए जीना चाहिए |
वह दुनिया में ऐसा कार्य करे इस प्रकार जिए कि उसके इस दुनिया से जाते समय हर कोई दो आंसू बहा सके \किसी ने कहा भी है -
"मै एक ही बार इस संसार से गुजर जाना चाहता हूँ "अर्थात मै इस दुनिया में आया हूँ तो अछे कर्म करके ही जाऊ ताकि बार बार नहीं आना पड़े \मनुष्य को अपने जीवन में वही कर्म करना चाहिए जिसमे दूसरो का भला हो ,समाज का भला हो देश का भला हो दुनिया का भला हो |जिन्दगी यही कहती है |
मानव अपने जीवन में प्रक्रति से कितना कुछ सीख सकता है
अगर स्वयम कष्ट सहकर किसी
दूसरे का भला किया जा सकता है तो इससे बढ़कर सुख कि बात और क्या हो सकती है |जिस प्रकार सूर्य स्वयम जलकर धरती को प्रकाशमान करता है ,
पृथ्वी सब कुछ सहकर हर चीज उपलब्ध कराती है ,उसी प्रकार मानव को अपने कर्मो के द्वारा हर किसी कि भलाई करनी चाहिए |
जब से मानव ने
पृथ्वी पर जन्म लिया है वह अपने आदर्शो के लिए संघर्ष कर रहा है ,वही मानव जीत सकता है जो विवेकरूपी कठोर वस्त्र धारण करे |विवेक के साथ संयम का सदुपयोग कर मानव जीवन के आदर्शो के प्रति सफल हुआ जा सकता है |जैसा कि महादेवी वर्मा के इस
संदेश में है -
"संसार के मानव समुदाय में वही व्यक्ति स्थान और सम्मान पा सकता है ,वही जीवित कहा सकता है जिसके ह्रदय और मस्तिष्क ने समुचित विकास पाया हो और जो अपने व्यक्तित्व द्वारा मनुष्य समाज से रागात्मक के अतिरिक्त बौद्धिक सम्बन्ध भी स्थापित कर सकने में समर्थ हो |"अर्थात मनुष्य कि ह्रदय कि भावना संकुचित न हो और वह अपने विचार हमेशा ऊंचे रखता हो और उसके प्रति उसे निभाने कि उसमे पूरी क्षमता हो |मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है वह समाज में ही जन्म लेता है और समाज में ही उसकी म्रत्यु होती है बिना समाज के मनुष्य स्थिर नहीं पाता |सुख दुःख ,मिलन वियोग सभी कुछ समाज में ही द्रष्टिगोचर होता है |लेकिन मनुष्य अपने स्वार्थ के लिए क्या नहीं करता ?मनुष्य
अगर जागरूक है तो समाज भी जागरूक होगा यदि वह अपने स्वार्थ में लिप्त रहेगा तो वह
कौनसा आदर्श कायम रख सकेगा |
क्यों न हम सामाजिक संघर्षो के साथ आगे बढे
वही सच्ची मानवता होगी |
मानवीय परिश्रम के द्वारा कुछ भी असम्भव नहीं ?वह एवरेस्ट कि
छोटी पर चढ़ सकता है |महात्मा गाँधी कि जिन्होंने कठिन तपस्या से देश को परतन्त्रता कि बेडियो मुक्त कराया और भी कई ऐसे इतिहास के प्रष्टो से प्रेरणा मिलती है |जिससे हम सुन्दर जीवन का प्रारम्भ कर सकते है |मानवीय श्रम के साथ साथ प्रबल मनोबल ही हर असम्भव कार्य को संभव कर सकता है |
जगत और जीवन का संघर्ष चलता रहता है |मनुष्य को अपना जीवन सघर्षमय बिताना पड़े तो निश्चय ही आनेवालासमय आनंदमय और मानवता का होगा |