क्रिक्रेट हमारा' धर्म '|
रियलिटी शो हमारा 'अर्थ'|
स्वछंदता हमारा 'काम'|
और भगवा हमारा" मोक्ष "
Sunday, November 16, 2008
Tuesday, November 04, 2008
ऐसा क्यो होता है
ऐसा क्यो होता है ?
जंहा' फूल तोड़ना मना है '
'लिखा है '
वही पर सबसे ज्यादा फूल तोड़ते है |
जहा' नो पार्किंग 'होती है ,
वंही "विशेष "गाडिया खड़ी होती है |
जहा' धुम्रपान 'वर्जित है ,
वही "सूटेड बूटेड "
धुएं के छल्ले उडाते देखे जाते है |
जहा कचरा फेकाना मना है ,
वही पर
पोलिथिनो में बांधकर कचरा फेकते है
"कैन में पेट्रोल ले जाना मना है ,
वही पेट्रोल पम्प पर धड़ल्ले से
कैन भरी देखि जा सकती है |
हम कौनसी भाषा समझते है ,या की
समझनाही नही चाहते
मन्दिर की शान्ति को सराहते है ,
परन्तु
जूतों कीगंदगी
वहा फैला ही आते है
आप ही बताये
ऐसा क्यों होता है |
जंहा' फूल तोड़ना मना है '
'लिखा है '
वही पर सबसे ज्यादा फूल तोड़ते है |
जहा' नो पार्किंग 'होती है ,
वंही "विशेष "गाडिया खड़ी होती है |
जहा' धुम्रपान 'वर्जित है ,
वही "सूटेड बूटेड "
धुएं के छल्ले उडाते देखे जाते है |
जहा कचरा फेकाना मना है ,
वही पर
पोलिथिनो में बांधकर कचरा फेकते है
"कैन में पेट्रोल ले जाना मना है ,
वही पेट्रोल पम्प पर धड़ल्ले से
कैन भरी देखि जा सकती है |
हम कौनसी भाषा समझते है ,या की
समझनाही नही चाहते
मन्दिर की शान्ति को सराहते है ,
परन्तु
जूतों कीगंदगी
वहा फैला ही आते है
आप ही बताये
ऐसा क्यों होता है |
Wednesday, October 15, 2008
रंग
रिश्तो के अहसास ,बताने से नही होते
उनकी महक महसूस की जाती है |
फूलो की खुशबूआनंद देती है
नाम उसको सार्थक करता है |
नाम उसके रंगों की खोज करता है ,
कोई रंग सुकून देता है ,कोई आभास भर देता है |
रंगों के नाम किसने दिए ?
शायद अहसासों ,आभासों और विश्वासों ने ?
और सचमुच ये अहसास ही जीवन को पूर्ण कर गये |
उनकी महक महसूस की जाती है |
फूलो की खुशबूआनंद देती है
नाम उसको सार्थक करता है |
नाम उसके रंगों की खोज करता है ,
कोई रंग सुकून देता है ,कोई आभास भर देता है |
रंगों के नाम किसने दिए ?
शायद अहसासों ,आभासों और विश्वासों ने ?
और सचमुच ये अहसास ही जीवन को पूर्ण कर गये |
Saturday, October 04, 2008
कैसी पूजा ?कैसी संस्क्रती ?कैसी श्रद्धा ?

मन्दिरों में बेहिसाब चढावा ,
तीस से .मी .की करोडो "चुननिया ?
करोडो के पंडालों में ,थिरकते ,लाखो लोग |
विदेशो में पूजा में ,
पारम्परिक भारतीय पहनावा ,
भारत में 'आरतियों 'में
वेदेशी पहनावा |
शर्धा ऐसी की
बुढे माँ= बाप
तरसते है सहारे को ,
और मन्दिरों मे ,जुता स्टेंड पर ,
"सेवा "देकर धार्मिक" शर्धा ",से
ओतप्रोत है श्रद्धालु |
'बेठे ठाले '
व्यस्तताओ का बहाना बनाकर ,
अपनों से दूर होते जा रहे है हम लोग |
समय न होने पर भी ,
"बिग बॉस "के निठ्लो को देखकर ,निठ्ले
होते जा रहे है हम लोग |
अपनों से दूर होते जा रहे है हम लोग |
समय न होने पर भी ,
"बिग बॉस "के निठ्लो को देखकर ,निठ्ले
होते जा रहे है हम लोग |
Friday, October 03, 2008
Sunday, September 21, 2008
जाग्रत
जीवन के नेराश्य को
जिसने मुझे मुखरित किया
उन क्षणों को ,जिसने मुझे वाणी दी
आत्मप्रशंसा के अभिमान से निवर्त होकर
आत्म विश्वास दीर्घजीवी हो
परिभाषित जिन्दगी की आकांक्षा नही,
ब्व्न्द्रोमे झुझ्ती भावनाए
शोषित होती कल्पनाये ,
गिरकर उठने का साहस ,
एक अहसास दे गया |
जिसने मुझे मुखरित किया
उन क्षणों को ,जिसने मुझे वाणी दी
आत्मप्रशंसा के अभिमान से निवर्त होकर
आत्म विश्वास दीर्घजीवी हो
परिभाषित जिन्दगी की आकांक्षा नही,
ब्व्न्द्रोमे झुझ्ती भावनाए
शोषित होती कल्पनाये ,
गिरकर उठने का साहस ,
एक अहसास दे गया |
Friday, September 19, 2008
कुछ क्षनिकाए

आकाश की उचाईयो छूने के बाद
सारा जहा मेरा अपना हो गया है
और जमीन से जुड़े रहने की चाह में
मुझसे मेरे अपने जुदा हो गये है
"नीड"
पराये आशियाने में अपना नीड कहा
पराये दर्दो में अपनी पीर कहा
अब तक तो जिए बेखोफ जिन्दगी ,
अब मरने को दो गज जमीन कहा
मंजिल
जिन्दगी से निराश कुछ नवयुवको को देखकर सन२००० मेंयह कविता लिखी थी
तुझे पाने की चाह में ,
अपनी मासूमियत खो बैठे हम |
तेरे नजदीक पहुंचते पहुंचते ,
अपनी इंसानियत खो बैठे हम |
हम भी थे स्कूल के अच्छे बच्चे ,
माँ के सानिध्य में सुस्न्स्कारो में,
प्ले दुलारे |
पिता की आशाओ के तारे
तेरी पथरीली ने प्गदंदियो ने
लहुलुहान कर दिया
तेरी राह के कटीले तारो ने ,
हमे छलनी कर दिया |
निकले थे तुझे खोजने सुंदर से
शहर में,
किंतु
तेरी दम तोड़ती व्यवस्थाओ और
हमरी म्ह्त्वाकंक्षाओ ने
हमे बियाबान दे दिया |
तुझे पाने की चाह में ,
अपनी मासूमियत खो बैठे हम |
तेरे नजदीक पहुंचते पहुंचते ,
अपनी इंसानियत खो बैठे हम |
हम भी थे स्कूल के अच्छे बच्चे ,
माँ के सानिध्य में सुस्न्स्कारो में,
प्ले दुलारे |
पिता की आशाओ के तारे
तेरी पथरीली ने प्गदंदियो ने
लहुलुहान कर दिया
तेरी राह के कटीले तारो ने ,
हमे छलनी कर दिया |
निकले थे तुझे खोजने सुंदर से
शहर में,
किंतु
तेरी दम तोड़ती व्यवस्थाओ और
हमरी म्ह्त्वाकंक्षाओ ने
हमे बियाबान दे दिया |
Tuesday, September 16, 2008
विश्वास
मेरे जेहन में चोकोर पत्थर ,
धागे से बंधा हुआ
मानो मेरे अनगिनत प्रश्नों का उत्तर
रिक्तता और शून्य में खोजता अन्तर
उनींदी आँखों की सोच
खुली आँखों का यथार्थ
ढूंढ़ता एक मकसद ,
एक आयाम
ये मेले ये त्यौहार
न रहे तुम्हारे ,
न रहे मेरे पास
ओपचारिकता के बंधन
टूटते से नज़र आते आज
और उस पत्थर के चोकोरपंन में
दबते से मेरे अहसास
अपनों से दूर होने की सिर्फ़ ,
खुशबु है पास
नजदीकियों ने विश्वासों को तोडा है
अपनों ने फ़िर
ओप्चारिक्ताओ को ओढा है
धागे से बंधा हुआ
मानो मेरे अनगिनत प्रश्नों का उत्तर
रिक्तता और शून्य में खोजता अन्तर
उनींदी आँखों की सोच
खुली आँखों का यथार्थ
ढूंढ़ता एक मकसद ,
एक आयाम
ये मेले ये त्यौहार
न रहे तुम्हारे ,
न रहे मेरे पास
ओपचारिकता के बंधन
टूटते से नज़र आते आज
और उस पत्थर के चोकोरपंन में
दबते से मेरे अहसास
अपनों से दूर होने की सिर्फ़ ,
खुशबु है पास
नजदीकियों ने विश्वासों को तोडा है
अपनों ने फ़िर
ओप्चारिक्ताओ को ओढा है
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