Sunday, May 01, 2011

मजदूर दिवस जो जीवन पर्यन्त ख़ुशी का साथ निभाता है मेरे .. ....

बैल गाडियाँ उबड खाबड़ रास्ते को पार करते हुए रात के करीब ९ बजे गाँव के भीतर प्रवेश कर चुकी थी गाँव में खबर फ़ैल चुकी थी बारात आ गई लाड़ी दुल्ल्व(दूल्हा दुल्हन ) भी आ गये |दुल्हन बड़ी मुश्किल से बैल गाड़ी से नीचे उतर पाई थी दूल्हें राजा तो गाँव में प्रवेश करते ही गाड़ी से कूद पड़े थे दुल्हन को तो घर तक बैलगाड़ी में ही जाना था (दुल्हन जो थी ) साथ में हम उम्र नन्द भी थी जो अभ्यस्त थी बैल गाड़ी में चढने उतरने की इसलिए कोई मुश्किल नहीं |दुल्हन को अपने कपडे जेवर भी सम्भालने थे (वैसे आजकल की तरह कोई डिजाइनर लहंगे नहीं थे )फिर भी बनारसी साड़ी तो भारी ही तो होती है न ?साथ में गाँव की बहुत सारी औरते और बच्चो की निगाहे दुल्हन पर ही लगी थी |
सर पर पल्ला सम्भालते सम्भालते दुल्हन बेहाल उस पर द्वार पर ही बहुत सारी रस्मे |मायके छोड़ने का दुःख अलग |
कोई दबे शब्दों में कह रहा था बिजली आ गई !बाद में दुल्हन को मालूम पड़ा की इसी साल गाँव में बिजली आई थी और दुल्हन को सब भाग्यशाली मान रहे थे की देखो लाड़ी के आने के पहले ही गाँव में बिजली आ गई इस लिए दुल्हन को सब बिजली कहने लगे |
बहुत सारी रस्मो के बाद हंसी मजाक के बाद मंडप में मुह मीठा कराने के बाद दुल्हन को जहाँ आंगन के पास में एक बैठक में बहुत सारी महिला रिश्तेदारों के साथ सुला दिया गया |
दुल्हन माँ, पिता ,दादी,दादा , भाई, बहन सबको याद कर सुबकती रही |
किन्तु सुबह की लालिमा ने, घर की बुजुर्ग महिलाओ ने ,दुल्हन को प्यार से उठाया ढेर सारे आशीर्वाद दिए बलाए ली तो दुल्हन जो बहू बन गई थी रात की बात को पीछे छोड़ सुबह के स्वागत में आतुर हो उठी थी |
सन १९७४ में देशव्यापी ट्रक बस रेल हड़ताल थी १ मई को और इसीलिए मेरी बारात को बैलगाड़ी से आना पड़ा और
उस समय मध्यमवर्गीय परिवारों में कार का प्रचलन बहुत कम था |आज ३८ साल बाद भी अपनी अनोखी बारात और दिवा लग्न (दिन का शादी का मुहूर्त )आज भी हुबहू आँखों में चित्रित है |
बड़ो के आशीर्वाद से और अपने प्रगतिवादी ,प्रयोगवादी सादगीपूर्ण ससुराल परिवार ने मेरे जीवन के ३८ सालो को खुशिया ही खुशिया दी है |
वैसे मजदूर दिवस और महाराष्ट्र दिवस 1st may को होता है और जब शादी के बाद मुंबई रहना हुआ तो हर साल शादी की सालगिरह की छुट्टी मिल ही जाती थी जिसमे बैलगाड़ी के धचके कम ही याद आते थे |गेटवे ऑफ़ इण्डिया और चौपाटी की भेल में बेचारी बैलगाड़ी की यात्रा ?
आइये कुछ गिने चुने छाया चित्र देख लिए जाय |




पाणिग्रहण संस्कार( माँ पिताजी )




वरमाला( पहचानिए )?
जो भी यह चित्र देखता है श ही लेता है की कम से कम दूल्हा कुरता तो पहन लेते ?




अब उस समय हमारे यहाँ रिसेप्शन का रिवाज नहीं था तो तो दीवाल पर जाजम लगा दी और खड़ा कर दिया
हम दोनों को |



दोनों परिवार ख़ुशी से बतियाते हुए न ही समधियो जैसी कोई अकड ,न ही !लडकी ब्याहने का तनाव




शादी के तीसरे दिन खेत बाड़ी की सैर



और फिर दो महीने बाद मुंबई (goreगाँव )का घर
उस समय मेरे काका ससुर अमेरिका से आये थे शादी में और उनके पास एक मात्र कलर फोटो का केमेरा था जिसमे स्लाइडमें फोटो होते थे |जिसे प्रोजेक्टर के सहारे देखते थे बाद में उन्होंने वही से ये कापिया भेजी थी |
अन्यथा कोई फोटो मिलना मुश्किल ही था क्योकि फोटोग्राफर का खर्चा बजट में नही था |
शादी के बाद एक स्टूडियो में लिया गया चित्र जरुरी है |




Thursday, April 21, 2011

"समझौता "

आज हर तरफ अन्ना हजारे जी की चर्चा है और उनकी तुलना गांधीजी से की जाने लगी है |हजारे जी में हम सब गांधीजी ढूंढने में लगे है |पता नही ?क्यों ?
कुछ सालो पहले मैंने एक कविता लिखी थी इन्ही भावो को लेकर |
कितनी प्रासंगिक है आज ?

"समझोता "

मेरे घर के आसपास
जंगली घास का घना जंगल बस गया है |
मै इंतजार में हुँ ,
कोई इस जंगल को छांट दे ,
मै अपने मिलने वालो से हमेशा,
इसी विषय पर बहस करता,
कभी नगर निगम को दोषी ठहराता,
कभी सुझाव पेटी में शिकायत डालता,
और लोगो को अपने,
जागरूक नागरिक होने का अहसास दिलाता|
इस दौरान जंगल और बढ़ता जाता,
उसके साथ ही जानवरों का डेरा भी भी जमता गया|
गंदगी और बढ़ती गई
फ़िर मै,
जानवरों को दोषी ठहराता
पत्र सम्पादक के नाम पत्र लिखकर
पडोसियों पर फब्तिया कसता
[आज मै इंतजार में हूँ ]
शायद 'बापू'फ़िर से जन्म ले ले
और ये जंगल काटने का काम अपने हाथ में ले ले|
ताकि मै उनपर एक किताब लिख सकू
किताब की रायल्टी से मै
मेरे " नौनिहालों " का घर 'बना दू
उस घर के आसपास फ़िर जंगल बस गया
किंतु
मेरे बच्चो ने कोई एक्शन नही लिया
उन्होंने उस जंगल को ,
तुंरत 'चिडिया घर 'में तब्दील कर दिया
और मै आज भी शाल ओढ़कर सुबह की सैर को ,
जाता हूँ,
'चिडिया घर 'को भावना शून्य निहारकर
पुनः किताब लिखने बैठ जाता हूँ
क्योकि मै एक लेखक हूँ|




Sunday, April 17, 2011

कुछ अनकही .....

१.

तुम
हमेशा से
कल्पनाओ में,
कल्पनाओ के दुर्ग बनाती रही
भावनाओ से ,सवेदनाओ से ,
अपनेपन के मेल से
तुम्हारे द्वारा निर्मित
इस दुर्ग को कोई जान पाया
तुमने इसे मूर्त रूप
देकर भी अभेध्य ही
रखा !
तुम जानती थी
इस दुर्ग के द्वार
खुलते ही
तुम्हारे हाथ क्या
आयेगा
सिर्फ और सिर्फ चिंगारी |


2.
जाने क्यों ?
सवेदनाये
कागजी होकर रह गई है

जाने क्यो?
सवेदनाये
पानी के बुलबुले
की तरह हो कर रह गई है
जाने क्यो ?
सवेदनाये
बंद पानी की बोतल की खाली बोतल की तरह
हलकी होकर रह गई है
जाने क्यों ?
सवेंदनाये
आभासी होकर रह गई है |
अट्टालिकाओ के सूनेपन में
सुनामी के गूंजते सतत से शोर में
शहरों के रूखेपन में
रिश्तो के बेगानेपन में
भीड़ के अकेलेपन में
कही गुम होकर रह गई है
क्या सवेदनाये ?





Monday, April 11, 2011

दीदी कन्या जिमा दो

पिछले साल अष्टमी पर मैंने यः पोस्ट लिखी थी | जो मेरा अनुभव था आज इसकी कितनी प्रासंगिकता है ?
कृपया अपने अमूल्य विचारो से जरुर अवगत कराये |




आज सुबह से जिससे भी फोन पर बात कि वो इस समय व्यस्त थी |हलवा, पूड़ी ,खीर चने बनाने में व्यस्त थी |आज अष्टमी है देवी के पूजन का अत्यंत पवित्र दिन और आज कन्या के के रूप में साक्षात् देवीका ही पूजन विधान बताते है ,हमारे ज्योतिषी या हमारे पारिवारिक पंडित |बहुत सालो पहले कही -कही ही कन्याओं को जिमाने का प्रचलन था पर जैसे जैसे एक प्रदेश से दुसरे प्रदेशो में जाना आना बढ़ा अपने समाज के आलावा दूसरे समाज से सम्पर्क बढ़ा हम दूसरो के रीती रिवाज अपनी सुविधा और रूचि के अनुसार पालने लगे |और आज प्राय हर घर में अष्टमी और नवमी को बड़ी श्रधा के साथ उपहार के साथ कन्याओं को भोजन कराया जाता है |अब हर कालोनी में इतनी लडकिया तो मिल नहीं पाती इसलिए घर में काम करने वाली बाई को कहकर पूरी कन्याये मिल पाती है |मेरी कालोनी में मुश्किल से सिर्फ दो कन्या है |मेरे अड़ोसी पड़ोसी महाराष्ट्र और उड़ीसा के है वो लोग तो कन्या नही जिमाते | और मै ठहरी थोड़ी आलसी और नास्तिक ?
तो सिर्फ शारदीय नवरात्री में ही कन्या जिमाती हूँ |वो भी बड़ी मुश्किल से कन्या जुटा पाती हूँ |
और जब आज सबके घर कन्या भोजन कि बात सुनी तो मुझे अपने आप पर थोड़ी खीज होने लगी और एक तरह से ग्लानि भी हुई ,टी.वि के कार्यक्रम जिनमे कन्याओ को जिमाने का महत्व बताया जा रहा था तो लगा मेरा जीवन व्यर्थ ही गया |
इस तरह सोचते सोचते खाना खा लिया अपने को कोसते कोसते ||बस खाना खाकर उठी ही थी कि दरवाजे कि घंटी बजी |अमूमन इस समय कोई नहीं आता कभी कभार पोस्ट मेन घटी बजा देता था जबसे उसे कहा है- भैया घंटी मत बजाया करो क्योकि सिर्फ क्रेडिट कार्ड के विवरण और बैंक के स्टेटमेंट ही होते है उसके लिए क्यों दोपहर कि नींद ख़राब कि जाय |तब से वो भी गेट में से डाक खिसकाकर चल देता है |खैर !जैसे ही दरवाजा खोला तो देखा सात कन्याये ,जिनके हाथ में छोटे छोटे पर्स ,भरी हुई प्लास्टिक कि थैलिया थी |माथे पर ताजा ताजा कुंकू लगा हुआ अपनी उम्र के हिसाब से सबके घुटनों से नीचे लटकते हुए कपडे थे किसी कि बाहं खिसक रही तो कोई अपने स्कर्ट को बार बार ऊपर खीच रही थी |
मुझे देखते ही बोली -कन्या को जिमा दो !मुझे ज्यादा कुछ समझ नहीं आया फिर दोबारा वही वाक्य उन्होंने दोहराया
तब मुझे समझ आया |कन्या जीमना चाहती है ?मै मन ही मन सोचने लगी इन्हें क्या खिलाऊ ?क्योकि खाना तो हम खा ही चुके थे और उतना ही बनाते है |और कितना ही महत्व हो आज कन्या जिमाने का ?मुझमे इतनी तत्परता नहीं थी कि
मै सबके लिए खाना बना पाऊ ?मुझे सोच में पड़ते देख फिर से सारी एक साथ बोल पड़ी -दीदी !कन्या जिमा दो ?मानो कह रही हो ये कैसा घर है ?यहाँ कन्या नहीं जिमाते ?अब घर आई कन्याओं को खाली हाथ जाने देने का भी मन नही हो रहा था |पैसे देना भी सिधान्त के खिलाफ |
अच्छा बैठो- कहकर कुछ लाने के इरादे से मै घर के अन्दर गई उन्हें आँगन में बैठाकर ,वो व्यवस्थित बैठ गई गोल घेरे में मानो उन्हें ट्रेनिग दी गई हो |मै संतरे लेकर आई क्योकि मेरे पास और ज्यादा मात्रा में कुछ खाने वाली वस्तु नहीं थी |
बिना टीका लगाये उन्हें दे दिए -वे मुझे आश्चर्य से देखने देखने लगी |मै भी उनसे पूछताछ करने लगी ?स्कूल जाती हो?
सबने सर हिलाकर हाँ में जवाब दिया |मैंने फिर पूछा ?
कितने घर भोजन किया ?
आठ घर |आपका नोवां घर है |फिर फटाफट उठकर ठन्डे संतरोंको गाल पर लगा कर अपनी बातो में मशगूल हो गई |
मै
पूछती ही रह गई आज क्या छुट्टी है स्कूल कि ?पर वो तो सब दरवाजे से बाहर |
अब
एक संतरे में कितना पूछा जा सकता है ?
शायद मै तुरंत फोटो ले लेती तो आप सबको यकीन दिला देती कि मैंने भी कन्या जिमा दी और अपने आपको तसल्ली भी |

Tuesday, April 05, 2011

गणगौर की बिदाई ,गणगौर गीत भाग 2

गणगौर की बिदाई परसों है अभी से बिदाई के क्षणों की कल्पना कर सभी लोग भावनाओ में बह रहे है किन्तु अगले साल फिर नै उमंगो के साथ गणगौर को घर लाने की आकांक्षा में गणगौर की विदाई की तैयारी शुरू हो गई है लापसी ,दही भात , मीठा इमली का पानी ,पूड़ी मेथी दाने का साग ,और पूरण पोली, पीली चुनरी , साफा
सब कुछ है तैयार |



रणुबाई
के श्रंगार का वर्णन और मायके से विदाई



|

अरघ देने के लिए कन्याओ द्वारा लाये गये पूल और पत्तिया पाती खेलना कहते है |
मौली राजा (जब सारी टोकरिया भर जाती है और जो कस्तूरी और गेहू बच  जाते है उन्हें एक स्थान पर रखकर सींचा जाता है )




बह सामूहिक पूजा के बाद गाँव कि सारी महिलाये अपने दिन भर के खेती के काम निबटाती है क्योकि यह समय गेंहू कि कटाई का होता है |किसी के खेत में कटाई हो रही है तो किसी के गेहू खलिहान में रखे जा रहे है |कड़ी मेहनत के बावजूद
रात को बाड़ी जहाँ जवारे बोये जाते है पूरे गाँव कि एक ही बाड़ी होती है वहां आकार गणगौर के गीत ,सामूहिक नृत्य
बिना कोई खर्च के, बिना कोई तामझाम के देवी के गीत जिसमे श्रंगार ,दैनिक जीवन के कार्य का वर्णन होता है कुछ पारम्परिक गीत जो सदियों से गाये जाते है ,कुछ और मनोरंजन के लिए तुकबंदी कर के रचे जाते है और पीढ़ी दर पीढ़ी चलते रहते है |ऐसा ही ये एक श्रंगार गीत जिसमे रणुबाई चाँद तारो। सूरज से अपने श्रंगार के लिए उनके गुणों का वर्णन कर अपने धनियेर (पति ) से उनकी मांग करती है |
सिर्फ तालियों कि ताल और लय पर अपना सारी भक्ति और उत्साह देखते ही बनता है |



शुक्र को तारो रे ईश्वर उंगी रह्यो |
कि
तेकी मख टिकी घड़ाव ||
अर्थ
-एक दिन रनु अपने पति से हट पकड जाती और कहती है -हे पतिदेव !वः आकाश में सबसे तेजस्वी शुक्र का तारा चमक रहा है ?उसकी मुझे बिंदी घडवा दो |
ध्रुव कि बदलाई रे ईश्वर तुली रही
तेकी मख तबोल रंगाव \
अर्थ
-और यह जो ध्रुव कि ओर (उत्तर में )बरसने योग्य बदली छाई हुई है उसकी मुझे चुनर रंगवा दो |
सरग कि बिजलई रे ईश्वर चमकी रही
तेकी मख मगजी लगाव
अर्थ -और सुनो स्वर्ग में कडकने वाली बिजली कि उसमे मगजी लगवा देना |
नव लाख तारा ,रे ईश्वर चमकी रह्य
तेकी मख अंगिया सिलाओ
चाँद
और सूरज रे ईश्वर चमकी रह्या |
कि तेखी मख बदन घड़ाव
अर्थ -साथ ही आकाश में चमकने वाले लाखों तारो कि मुझे कंचुकी सिलवाओ जिसके अग्र भाग में चाँद और सूरज जड़े हो| बासुकी नाग रे ईश्वर देखि रह्यो
कि तेकी मख येणी गुन्थाव
बड़ी
हट वालाई रे गोरल -गोरड़ी
अर्थ
-हे पतिदेव !जो ,वो जो इठलाता हुआ काले वर्ण का वासुकी नाग दिख रहा है , उसकी मुझे वेणी गुथवा दो | इस पर ,मुस्कुराते हुए उसके पति कहते है कि - "हे गोरवर्णरनु !तू बड़ी हट वाली है |" इस तरह अनेक गीत गाये जाते है और महिलाये अपने समर्द्ध परिवार कि कामना करती हुई रनु बाई कि बिदाई कि तैयारी करती है |क़ल गणगौर कि बिदाई का दिन है |
गणगौर देवी कि आराधना का पर्व है बेटी को ही देवी रूप में पूजते है और बेटी जब ९ दिन मायके रहकर जाती है तो उसका ससुराल जाने का मन नही है|अपने पिता से हठ करती है पिताजी आपके बाग में आम और इमली है मै सखियों के संग खाना और बाग में खेलना चाहती हूँ अभी मुझे ससुराल मत भेजो |,पिताजी कहते है -बेटी तुम्हारे ससुर ,जेठ ,देवर काले सफेद और घोड़े पार लेने आये थे तब उन्हें मैंने आदरपूर्वक लौटा दिया है पर ये lजो कुवंर लाडला अपनी छैल बछेरी लेकर आया है वो तुम्हे साथ लिए बिना नहीं जायेगा |
समझा बुझाकर विदा देते है
और साथ ही उपदेश भी देते है |माँ का उपदेश जहन ममता से भीगा होता है ,वहां पिता का उपदेश भी प्यार और गांभीर्य से खाली नहीं होता है |गीत का भावार्थ इस तरह है -बेटी जब अपनी सखियों। के साथ खेलने कि जिद करती है तो पिता समझाते है |बेटी !तुम खेलने के लिए जरुर जाओ पार स्रष्टी रूपी लम्बा बाजार देखकर दौड़ कर नहीं चलना क्योकि उसमे उलझकर गिरने का भय रहता है |पराये पुरुष से कभी हंस कर बात मत करना |कही पानी देख कर ही वस्त्र धोने नहीं लगना , क्योकि इससे साध्य के लिए ही साधन का उपयोग करने कि द्रढ़ता का लोप हो जाता है |कर्ण वस्त्र धोने के लिए पानी है ,पानी के लिए वस्त्र धोना नहीं |
गीत
पिताजी कि गोद बठी रनुबाई बिनय |
कहो तो पिताजी हम रमवा हो जावा
जावो बेटी रनुबाई रमवा जाओ
लंबो बाजार देखि दौड़ी मत चलजो
उच्चो व्ट्लो देखि जाई मत बठ्जो
परायो
पुरुष देखि हंसी मत बोलजो
नीर देखि चीर मत धोवजो
पाठो देखि बेटी ,आड़ी मत घसजो
परायो बालो देखि हाय मत करजो
संपत
देखि बेटी चढ़ी मत चलजो
विपद देखि बेटी रडी मत बठ्जो
जाओ
बेटी राज करजो
इस तरह रणु बाई अपने लश्कर के साथ ९ दिन तक अपने मायके में रहती है और अपने भक्तो पर आशीष कि वर्षा कर विदा लेती है सारे गावं कि विपदाओं से रक्षा करती है और ढोल बाजे के साथ लहलहाते जवारो का बहती नदी में विसर्जन कर दिया जाता है और अगली चैत्र में फिर से आने का भावपूर्ण निमंत्रण दिया जाता है |
देवी गणगौर कि भावपूर्ण बिदाई |


 
बिदाई के पहले ज्वारो से गले मिलना हे देवी हमसे कुछ भूल हो तो क्षमा करे और और आपदाओ से रक्षा करे | 


 




Monday, March 28, 2011

"निमाड़ का गणगौर उत्सव "भाग 1

 लो जी फिर गणगौर फिर आ गई है ,सज गई है नई उमंग से साथ और अपनी परम्पराओं के साथ फिर जीवन का संचार कर आतुर है  चैत्र माह में रंग भरने को ....



ऋतू में परिवर्तन हो रहा है जो की प्रक्रति का अपना नियम है वासन्ती बयार अब विदा ले चुकी है होली का खुमार भी अपने रंग छोड़कर उतर चुका है दिन गर्म होना शुरू हो गये है |अभी अभी फूलो की बहार है चम्पा अपने शबाब पर है मोगरा खिलने को व्याकुल है जूही, रात की रानी अपनी खुशबू बिखेरने को बेताब है |वही नीम के पेड़ पर भी नै नै कोपले आने लगी है वातावरण में महुआ की खुशबू तैर गई है ऐसे मादक मोसम में "गणगौर का उत्सव "बरबस याद आ ही जाता है होठो पर गणगौर गीत अपने आप ही आ जाते है |तन मन थिरकने लगते है आज कितने भी आधुनिक उत्सव शहरी समाज ने अपना लिए हो किन्तु ग्रामीण उत्सवो का आज भी वही अंदाज है जो प्रकृति के साथ अपने को आत्मसात करके ग्रामीण लोग मनाते है निश्चय ही उन पर भी शहरी प्रभाव पड़ा है फिर भी उनकी इस संस्क्रति में ही उनकी ख़ुशी है |
पिछले वर्ष ही मैंने यह पोस्ट लिखी थी गणगौर पर इस साल नए पाठक और पढ़ सके अत: फिर से पोस्ट कर रही हूँ |
"निमाड़ का गणगौर उत्सव "

चैत्र की नवरात्री उत्तर भारत , के साथ सभी प्रेदेशो में कई रूप में मनाई जाती है |साथ ही राजस्थान कि गणगौर भी इसी समय मनाई जाती है जो कि सर्व विदित है |मध्य प्रदेश के ग्रामीण और अब शहरों में भी विशेषकर निमाड़ में गणगौर का उत्सव धूमधाम से मनाया जाता है कुछ कुछ बंगाल कि दुर्गा पूजा जैसा ही उत्साह होता है गाँवो में अपनी साल भर कि फसल कि कमाई से बचा कर रखा पैसा गणगौर पर्व पर श्रद्धा से खर्च करते है निमाड़ के किसान |चूँकि खेतिहर लोगो से जुड़ा है यह त्यौहार तो इसमें लोक संस्कृती कि प्रधानता है |

चैत्र वदी १० से चैत्र सुदी ३ तक के ९ दिनों के गणगौर उत्सव निमाड़ (मध्य प्रदेश )कि विशेषता है |इस अवसर पर सारा प्रदेश गीतमय हो जाता है और शिव -पारवती ,ब्रह्मा -सावित्री ,विष्णु -लक्ष्मी तथा चंद्रमा -रोहिणी कि वंदना के गीत गए जाते है |इनमे सबसे अधिक गीत रनुदेवी और उनके पति (धनियेर )सूर्य के के संवाद रूप में कहे गये है |
रणुबाई ही निमाड़ी लोकगीतों कि अधिष्टात्री देवी है |इसके एक गीत में सौराष्ट्र देश से आने का संकेत रनुदेवी कि पहिचान के लिए महत्वपूर्ण है |एक गीत में रनु बाई को रानी कहा गया है अन्यत्र रणुबाई के मंदिर का वर्णन है जिसमे रणुबाई बिराजती है और अपने भक्तो के लिए द्वार खोल देती है |
रनुदेवी सूर्य कि पत्नी राज्ञी का ही अपभ्रंश भाषा और लोकभाषा में घिसा हुआ रूप है |जैसे यग्य से जरान -जन्न जाना और उससे 'जन 'बनता है ;जैसा कि यज्ञोपवित शब्द से निकले हुए जनेऊ शब्द में पाया जाता है उसी प्रकार रण्नी -रानी
और अंत में" रनु "रूप बना |वस्तुतः राज्ञी देवी कि पूजा गुजरात -सौराष्ट्र में प्रचलित थी उसकी १४वि शताब्दी तक कि मुर्तिया पाई गई गई hai |
गणगौर को नारी जीवन का सुमधुर गीति काव्य कहा जाता है निमाड़ में |९ दिनों तक चलने वाले इस त्यौहार में एक भी ऐसा कार्य नहीं जो बिना गीत के हो, स्त्रियों द्वारा सामूहिक रूप से जब इस त्यौहार को मनाया जाता है तो कुछ ऐसा लगता है मानो ऋतुराज बसंत कि अगवानी कि जारही हो |
अमराइयो में कोयल कि कूक ,पलाश के फूलो कि लाली और होली कि उतरती खुमारी के साथ जब यह त्यौहार शुरू होता है ,तो गीतों कि गूँज से सारा गाँव सरोबर हो उठता है |
इसमें होली कि राख से चुने हुए कंकरों में गीतों के स्वर के साथ गौरी कि प्रतिष्ठा कर छोटी छोटी टोकनियो में मिटटी भरकर उनमे गेंहू बोने के रूप में मानो नारी के हाथो फसल कि प्राण प्रतिष्ठा कि जाती है और फिर उसे प्रतिदिन सींचते हुए नित्य आरती और उसकी उपासना कि जाती है -
अरघ सिंचन के समय गाने वाला निमाड़ी गीत -
म्हारा हरिया ज्वारा हो कि
गहुआ
लहलहे मोठा हीरा भाई वर बोया जाग
,
कि लाड़ी बहू सींच लिया

रानी सिंची जाण्य हो कि ज्वारा पेलापड्या |
उनकी सरस क्थोलाई हो ,हीरा भाई ढकी लिया
अर्थ -मेरे हरे जवारे के रूप में गेंहू लहलहा रहे है हीरा भाई के घर जाग बोया है और उनकी बहुए उन्हें सींच रही है वाह सींच कर निवर्त हुई है कि जवारे पीले पड़ने लगे है उनके सहस्त्रो अंकुरों को बहन ने स्नेह से ढँक लिया है |
मेरे हरे भरे ज्वारो के रूप में गेंहू लहलहा रहे है |
ये जवारे जीवन की सम्रद्धि के प्रतीक है |
हरे पीले जवारे ........
धनियेर राजा और रनु बाई कि इन बोलती मूर्तियों को रथ कहते है|
इन रथो में पीले जवारे रखकर नदी किनारे देवी को पानी पिलाने ले जाते है ,पूरा गाव एकत्र होकर सबकी मंगल कामना
हेतु देवी से लोकगीतों द्वारा विनती करते है |




आओ हम सब देवी का पूजन करे

इस गीत में देवी पूजा के लिए स्त्रियों के सामूहिक आव्हान के साथ ही साथ पूजन करने वाली कि भी महत्वाकांक्षाओ एवम देवी के संतानदाता स्वरूप का वर्णन है \इसमें धन ,धान्य एवम संतान से सम्पन्न आदर्श ग्रहस्थी का अत्यंत ही सजीव चित्रण है -
डूब का डंडला अकाव का फूल
रानी मोठी बहू अर्घ देवाय |
अर्घ दई वर पाविया
मोठा भाई सो भरतार
अतुलि पातुली लाओ रे गंगाजल पाणी ,|
नहावन कर रनु बाई राणी | रनु बाई रणुबाई खोलो किवाड़ |
पूजन
वळी उभी द्वार |
पूजन वाली काई मांग |
धूत
पूत अव्हात मांग |
हटियालो
बालों मांग |
जतिओयालो
भाई मांग |
बहू को रान्ध्यो मांग |
बेटी को परोस्यो मांग | तोंग्ल्या बुड्न्तो गोबर मांग |
पोय्च्या
बुड्न्तो गोरस मांग |
धणी
को राज मांग |
सोंना
सी सरवर गौर पूजा हो रना देव |

माय बेटी गौर पूजा हो रना देव |
ननद भोजाई गौर पूजा हो रना देव |
देरानीजेठानी गौर पूजा हो रना देव |
सासु
बहू गौर पूजा ही रना देव |
अडोसन पड़ोसन गौर पूजा हो रना देव |
पड़ोसन पर तुट्यो गरबो भान हो रना देव | कसी पट तुट्यो गरबो भान हो रना देव |
दूध
केरी दवनी मझ्घेर हो रना देव |
पूत
करो पालनों प्टसल हो रना देव |

स्वामी सुत सुख लड़ी सेज हो रना देव |
असी पट तुट्यो गरबो भान हो रना देव |

आरती - करंड कस्तूरी भरिया ,छाबा फूलडा जी
तुम
भेजो हो धनियेर रनूबाई ,
जो
हम करसा आरतीजी
थारी
आरती आदर दिसां देव दमोदर भेटंसा जी |
अर्थ
-

इस करंड भर कस्तूरी और छाबड़ी भर फूल लेकर हम देवी कि आरती कर रहे है
हे भाई तुम अपनी पत्नी को इस आरती में सम्मिलित होने को भेज दो |
हम रनु कि आरती को सम्मान देगे और दामोदर -स्वरूप भगवान से भेंट करेगे|
क्रमशः

Friday, March 25, 2011

"यादो की पोटली "

आज एक पुरानी कविता ही पोस्ट कर रही हूँ |
शायद आप सब भी मेरे साथ यादो में खो जाये |





मेरे सिरहाने रखी
यादो की पोटली में
बंधी यादों ने

विनती कर मुझसे कहा -
अब
तो मुझे खोल दो
कितने बार ही
खुश होती हूँ
जब तुम ये पोटली खोलती हो?
अब मेरी आजाद होने की बारी है
लेकिन ,तुम मुझे?
तह करके फिर से लगा देती हो
करीने से
और बांध देतो हो फिर पोटली में
मै तुम्हारी
इस करीने वाली आदत से
परेशान हो गई हूँ
यादो ने बड़ी मासूमियत
से कहा-
मुझे बिखरे रहना ही अच्छा लगताहै|
और यादो ने
बाहर निकलने के लिए
अपने लिए अपने कोना निकाल ही लिया
और मुझे मुंह चिढ़ाकर
बिखरने लगी

तुम्हारी मीठी याद
जब तुमने अपनी माँ की
आँखों में
अपने लिए प्यार का सागर देखा
तो तुमने महसूस किया
ईश्वर तुम्हारे पास है
जब तुमसे
सबंधित ,असंबंधित,और आभासी लोग भी
भी तुमसे अपार स्नेह रखते है
तब भी ईश्वर को तुमने
महसूस किया है
जब जब ,तुममे इर्ष्या द्वेष
के भाव जगे है
तब भी तो तुम्हारे अन्दर
बसे ईश्वर ने ही
तुम्हे उससे उबारा है |
तुम्हारी इन डबडबाई
आँखों को देखकर मै
तुम्हारे इन आंसुओ को
लेकर मै
वापिस पोटली में चली जाती हूँ
क्योकि
ये ही तो तुम्हारी पूँजी है |

Sunday, March 13, 2011

झूठी बिल्ली और भ्रष्टाचार

एक जंगल था उसमे सारे जानवर और पक्षी मिलकर रहते थे जैसे भालू ,बकरी, तोता ,कुत्ता ,बिल्ली आदि आदि |
एक दिन
सबने सोचा आज खीर बनाई जाय रोज रोज दाना ,घास खाते खाते उब गये सभी लोगो की राय से तय हुआ खीर बनाने का काम |कोई लकड़ी लाया ,कोई दूध लाया कोई चीनी लाया ,कोई बड़ा पतीला लाया जिसका जैसा सामर्थ्य उस हिसाब से हर कोई सामान लाया |खीर बनाई गई सबने खूब पेट भरकर खीर खाई थोड़ी बच गई उसे रख दी यः कहकर की शाम को आपस में बांटकर खा लेंगे और सब अपने काम पर जाने लगे |बिल्ली अपने सर पर कपडा बांधकर सो गई से सबने पूछा ?चलो बिल्ली मौसी तुम भी चलो |
मेरे सर में दर्द है मै यही रहकर आज आराम करुँगी |
सब अपने काम पर चले गये |
बिल्ली मौसी की निगाह तो बची हुई खीर पर थी जैसे ही सब लोग गये झट से उठी और सारी खीर चट की और वापिस अपनी जगह पर आकार सो गई |एक - एक कर सारे पक्षी और जानवर वापिस गये |
उन्होंने देखा बिल्ली अभी भी सोई है सभी उसके हाल पूछने लगे |
बिल्ली टस से मस नहीं हुई |
सबको भूख लग रही थी खी बची है यः सोचकर किसी ने बाहर कुछ भी नहीं खाया |
जब बची हुई खीर का बर्तन खोला तो देखा बर्तन खाली था सब लोग आपस में एक दूसरे से पूछने लगे की खीर किसने खाई |खरगोश ने कहा -बिल्ली मौसी से पूछो शायद उसने किसी को खाते देखा हो ?
तब बिल्ली मौसी अलसाई सी उनीदी आँखों का नाटक करके बोली -मै तो सुबह से ही सोई हूँ मै ने तो किसी को नहीं देखा |
अब सब जानवरों और पक्षियों ने तय किया की एक सूखे कुए में कच्चे धागे से झूला बांधा जाय और बारी बारी से सब बैठते जाय जिसने खीर खाई होगी झूला टूट जायगा और उसे अपने आप चोरी की सजा मिल जायगी |
तुरंत झूला बांधा गया |
बारी बारी से सब बैठते गये जैसे तोता बैठा तो उसने कहा - मिठू -मिठू मैंने खीर खाई हो तो झूला टूट जाय |
चिड़िया बैठी -बोली ची -ची मैंने खीर खाई हो तो झूला टूट जाय |झूला नहीं टूटा |
बकरी बैठी -बोली -में -में मैंने खीर खाई होतो झूला टूट जाय झूला नहीं टूटा \
अब बिल्ली मौसी की बारी आई (उसने मन ही मन सोचा ऐसे कोई झूला टूटता है क्या ?झूले को क्या मालूम की मैंने खीर खाई है )
म्याऊं -म्याऊं मैंने खीर खाई हो तो झूला टूट जाय ऐसा कहना था; बिल्ली का, कि झूला टूट गया और बिल्ली सूखे कुए में गिर गई और लहूलुहान हो गई |
ऐसा था जंगल का न्याय और उस न्याय पर सबका विश्वास |
अब इस कहानी को उल्टा ले |बची हुई खीर को रखने के बाद जब सब बाहर चले गये तब सबके मन में विचार आया की शाम को तो बिलकुल थोड़ी ही खीर मिलेगी चलो अभी ही थोड़ी खा ली जाय |एक -एक कर सारे आये और खीर खाकर चले गये |शाम को वापिस आने पर देखते है की खीर का कटोरा तो खाली था |सभी एक दूसरे पर आरोप लगाने लगे खीर खत्म करने के लिए | ही किसी ने सुझाव दिया की सभा बैठाई जाय ,या पता लगाया जाय की खीर की चोरी किसने की ?ठीक इसी तरह हम भष्टाचार का आरोप एक दूसरे पर लगाते रहते है |

बड़े से बड़ा मंत्री कहते है! देश में भ्रष्टाचार हो रहा है |
बड़ी से बड़े संत ?कहते है! देश में भ्रष्टाचार हो रहा है |
बड़े से बड़े उद्योगपति कहते है !देश में भ्रष्टाचार हो रहा है |
सत्ता में बैठे लोग कहते है ! देश में भ्रष्टाचार हो रहा है |
विपक्ष में बैठे लोग कहते है !देश में भ्रष्टाचार हो रहा है |
सरकारी कर्मचारी अपनी पहचान निकालकर जनगणना में अपनी ड्युटी रद्द करवाते है वो भ्रष्टाचार नहीं है ?
निजी कम्पनियों के "विभाग "अपनी कंपनियों के कार्य सरकारी लोगो को" दीपावली 'देकर करवाते है क्या वो भ्रष्टाचार नहीं है ?
क्या सरकार में हमारे लोग नहीं है ?दूसरे देश के है ?
क्या हम कभी संतो के प्रवचन नहीं सुनते ?
क्या हममे से ही उद्योग पति नहीं है ?
सत्ता में हो या विपक्ष में क्या हम नहीं है वहाँ ?
एक बिल्ली के लालच ने सबकी लालसा के दरवाजे खोल दिए |
कितु दिन भर भूखे रहकर इमानदार रहते हुए सिधान्तों पर चलने वाले पक्षियों और जानवरों का सबक क्यों नहीं ले पाए ....

Thursday, March 10, 2011

आभार आप सबका

"शब्द भाव "के प्रकाशित होने पर और आप सबकी बधाइयाँ पाकर खुशियाँ द्विगुणित हो गई |
Blogger
देवेन्द्रजी ,वंदनाजी ,शिखाजी ,ज्योतिजी मोनिकाजी ,रश्मि रविजा जी ,प्रवीणजी , वंदनाजी ,वाणीजी ,निमिष नेहा
patliji ,दिव्याजी ,संगीताजी ,रश्मि प्रभाजी ,मनोजजी ,अमिताभजी ,नास्वाजी आप सभी ने जो अपने स्नेहसिक्तशब्दों से बधाई दी है और हमेशा उत्साह वर्धन किया है उसके लिए ह्रदय से आप सबकी आभारी हूँ |
@
प्रवीणजी आप बंगलौर में घर के पते पर पुस्तक प्राप्त कर सकते है मैंने पता मेल में लिख दिया है काफी दिन पहले ही |शायद स्पैम में चला गया हो ?
@
अमिताभजी ,आपकी नाराजी से भरी बधाई का बहुत अच्छी लगी |
पुस्तक भेजने के लिए मैंने मेल किया है |
पुनह सबका आभार |