जैसे ही मै टेलर की दुकान पर गई देखा वहा चार पॉँच युवा कारीगरों के बीच एक वृध्ध महिला भी बड़ी तन्मयता से और फुर्ती से सिलाई मशीन पर अपना काम कर रही थी |मुझे थोडी हैरानी हुई क्योकि वृध्ध पुरूष टेलर को तो कई बार देखा ;है पर महिला वृद्ध टेलर पहली बार ही देखि; हो सकता है ? ? और जगहों पर काम करती हो, पर मैंने पहली बार देखा |मैंने टेलर मास्टर (महिला )जो की उस दुकान की मालिक भी लग रही थी और टेलर मास्टर भी है ;अपने कपडे दिए सिलने को और हिदायते भी दी बावजूद इसके की जैसे उनको सिलना है ? वैसे ही सीलेगी, और कभी भी समय पर नही देगी? जब तक दो या तीन बार उनकी दुकान के चक्कर न लगा ले |खैर मैंने उस वृध्ध महिला की तरफ देखा पार्वती !अम्मा जी हां यही नाम है उसका |उन्होंने भी जवाब में प्यारिसी मुस्कराहट दी |मै घर आकर सोचती रही? बिचारी पारवतीअम्मा को इस उमर में भी काम करना पड़ रहा है |देखने से तो कुछ समझ नही आता की उनकी आर्थिक स्थिति कैसी है ?क्योकि यहाँ बंगलौर में या चेन्नई में आप कपडो से अंदाजा नही लगा सकते की उनकी आर्थिक स्थिति कैसी है ?उत्तर भारत में आप आदमी ओरतो के कपड़े देखकर अंदाज लगा सकते है उनकी परिस्थिति का |हाँ अब ये बात अलग है की आजकल भले ही खाने को रुखा सुखा भी न हो पर कपड़ो की शान में कोई समझौता नही ?
बार बार पारवती अम्मा का ही ख्याल आता रहा की कैसे दिन भर वो काम करती है ,शायद उसके बहु बेटे उसकी कोई मदद नही करते ?या शायद उसका कोई भी अपना नही है ?इसी उधेड़बुन में रही और मन में पक्का कर लिया अगली बार जब सिले हुए कपड़े लेने जाउंगी तब उससे बात करुँगी और यथासंभव उसकी मदद करुँगी |मन में हमेशा समाज सेवा का कीडा कुलबुलाता रहता है |अचानक मुझे हमारे एक रिश्तेदार का वाकया याद आया गया |एक बार वो इंदौर से खंडवा जा रहे थे सुबह -सुबह निकले थे साथ मेंऔर चार पॉँच लोग भी थे| चकाचक सफेद कुरता पायजामा कलफ लगा हुआ नेताओ कीतरह |रास्ते में बडवाह या सनावद में नाश्ता करने के लिए पोहे , समोसे चाय की दुकान पर गाड़ी रोकी |मध्य प्रदेश में सुबह सुबह नाश्ते में पोहे जलेबी और समोसों का प्रचलन है हरेक दुकान पर मिल जावेगे दुकाने छोटी छोटी ही रहेगी |पर उन जलेबी पोहो का कोई जवाब नही !
तो भाई साहब ने नाश्ता किया और उनकी निगाह दुकान के बहार प्लास्टिक की कुर्सी पर बैठे एक बुजुर्ग पर गई |उन्होंने सोचा चलो सुबह सुबह पुण्य कमा ले? और एक प्लेट पोहा और जलेबी अलग से मंगवाई और दुकान में काम करे वाले लडके को कहा -जा बेटा वो बाबा बैठे है न ? उनको ये नाश्ता दे दे |
लड़का भाई साहब की तरफ अजीब निगाहों से देखने लगा ?
और जो लड़का जलेबी बना रहा था जो की उम्र में उससे बड़ा था उसकी और प्रश्न वाचक नजरो से देखने लगा |
भाई को कुछ समझ में नही आ रहा था उनका तो दिमाग चलने लगा एक तो भूखे को खाना खिलाओ और उनकी अकड तो देखो |
तब जलेबी बनाने वाला लड़का उठकर आया और भाई साहब को एक तरफ ले जाकर धीरे से उसने कहा-साहब वो बुजुर्ग ही इस दुकान के मालिक है |
अब भाई साहब को काटो तो खून नही |
ऐसा ही मुझे लगने लगा कही पारवती अम्मा भीतो दुकान की मालकिन न निकल जावे फ़िर भी मैंने पूछ ही लिया और अम्मा कैसी है आप ?उन्होंने उसी मुस्कराहट के साथ फ़िर जवाब दिया -ठीक हूँ माँ ,और फ़िर अपने सहकर्मियों के साथ कन्नड़ में हंस हंस कर बाते कर अपना काम निबटाने लगी |मेरा भी समाज सेवा का फितूर धीरे धीरे हवा हो गया |मेरी सोच का रुख पलट गया |शायद वो अपना समय बिताने के लिए ये काम कर रही हो ? या फ़िर उसकी ये हाबी हो ?पर मन में ये कही तो था की वो जरूरत के लिए कर रही है ?फ़िर मुझे किसी की कही बात याद आई
'" जब तक कोई सलाह न मांगे उसे सलाह मत दो "|इसी विचार की तर्ज पर मैंने भी अपने कंधे उचकाकर अपनी राह पकडी और मन ही मन कहा फटे में टांग अडाने की क्या जरूरत है |
usne
|
Thursday, September 24, 2009
Monday, September 21, 2009
माँ कभी बाजार नही गई
माँ की आराधना का पर्व है ," नव रात्रि "| नो दिनों तक उपवास रखकर ak नियम pal कर शक्ति की aradhna करते है |अलग अलग प्रान्तों में अलग अलग तरीके से माँ की पूजा अर्चना होती है |आजकल युवाओ को गरबा कर माँ की आराधना करने का सबसे सरल उपाय लगता है , तो ज्योतिशी भी अनेक उपाय बताने लगे है .माँ को खुश रखने के ,धन प्राप्ति के । कन्या को अच्छा वर मिलने के ,वर को अच्छी वधु मिलने के ,निसंतान दम्पति को संतान प्राप्ति के|मानो इन ९ दिनों में ही सबको अभीष्ट फल की प्राप्ति हो जायगी |दुकाने ज्योतिषियों के बताये सामान से भरी पडी है ,पाव मीटर से लेकर १०० मीटर तक की चुनरिया माँ के लिए मिल रही है |माँ के पास सिर्फ़ मांगने ही जा रहे है भले ही आरती में हम गाते है
नही मांगते धन और दौलत
न चांदी न सोना
हम तो मांगे माँ तेरे मन में
एक छोटे सा कोना .........
देवी माँ सबकी आशाये पूरी करे
नव रात्रि के भव्य आयोजनों माँ कही खो गई है |
आज मुझे इस अवसर पर माँ की याद आरही है उन
भव्य बजारों की चकाचौंध देखकर मन बरबस ही कह उठता है -
माँ ne कभी अपने जीवन में
छाते का उपयोग नही किया
क्योकि
उसने बारिश मे
कभी घर के बाहर कदम नही रखा
माँ ने कभी चप्पल नही खरीदी
क्योकि
दादी कि पुरानी चप्पल
फेक नही सकते थे
माँ ने कभी
ताजी रोटी नही खाई
क्योकि
घर में नौकर
नही थे
माँ ने कभी
नई साडी नही पहनी
क्योकि
बुआओ को
हर तीज त्योहारों पर
शगुन भेजना जरुरी होता था|
माँ कभी भी
पलंग पर नही सोई
क्योकि
पलंग सिर्फ
दादा बाबूजी और चाचाजी
के लिए था
माँ ने कभी
बाजार नही देखा
क्योकि उसकी
कभी कोई जरुरत
ही नही होती थी |
नही मांगते धन और दौलत
न चांदी न सोना
हम तो मांगे माँ तेरे मन में
एक छोटे सा कोना .........
देवी माँ सबकी आशाये पूरी करे
नव रात्रि के भव्य आयोजनों माँ कही खो गई है |
आज मुझे इस अवसर पर माँ की याद आरही है उन
भव्य बजारों की चकाचौंध देखकर मन बरबस ही कह उठता है -
माँ ne कभी अपने जीवन में
छाते का उपयोग नही किया
क्योकि
उसने बारिश मे
कभी घर के बाहर कदम नही रखा
माँ ने कभी चप्पल नही खरीदी
क्योकि
दादी कि पुरानी चप्पल
फेक नही सकते थे
माँ ने कभी
ताजी रोटी नही खाई
क्योकि
घर में नौकर
नही थे
माँ ने कभी
नई साडी नही पहनी
क्योकि
बुआओ को
हर तीज त्योहारों पर
शगुन भेजना जरुरी होता था|
माँ कभी भी
पलंग पर नही सोई
क्योकि
पलंग सिर्फ
दादा बाबूजी और चाचाजी
के लिए था
माँ ने कभी
बाजार नही देखा
क्योकि उसकी
कभी कोई जरुरत
ही नही होती थी |
नवरात्रि के शुभ अवसर पर मै अपने सभी ब्लागर भाई बहनो का ह्रदय से आभार मानती हूँ जिन्होने हमेशा अविलम्ब मेरी अभिव्यक्ति पर अपनी महत्वपूर्ण टिप्पणिया देकर मेरा होंसला बढ़ाया |
इतनी बड़ी दुनिया मे हमारे सभी के विचारो का ये परिवार खूब फले फूले इन्ही शुभकामनाओ के साथ माँ के आराधना के पर्व की अनेक बधाई |
Wednesday, September 16, 2009
अपनी बात
सुधा से मिले बहुत दिन हो गये थे सोचा चलो आज मिल लू |सुधा मेरी छोटी बहन है , वो अधिक्तर बीमार ही रहती है ,इसीलिये यो कहिये सबको उससे मिलने उसके घर ही जाना होता है |
दोपहर को ही उसके घर जा पहुंची थी उसकी बहू ने अच्छे से मेरा स्वागत किया बढिया चाय नाश्ता कराया |
हम दोनों बहनों को बाते करते करते बहुत देर हो गई|
मै आने के लिए उठी ही थी की उसकी बहू रीना आई फ़िर पूछा ?
मम्मीजी रात को कितनी भूख है /वैसे बता दीजिये उतना ही खाना बनाऊ ?
मै हैरत में थी रात को खाना है अभी से कैसे बता सकते है ?
सुधा मेरी ओर दयनीय नजरो से देखने लगी |
मै भी उनके घर की व्यवस्था के बारे में अपने विचार रखकर बात बढाना नही चाहती थी |
मै ये अनोखा प्रश्न लेकर सोच में पड़ गई |सुधा ने पहले भी कहा था रीना रोज रोज घर के सारे सदस्यों से पूछकर ही खाना बनाती |
तभी मुझे याद आया माँ की एक सहेली गीता मौसी हमेशा घर आती थी एक दिन मै भी बैठी थी तभी मैंने सुना ।
मौसी माँ से कह रही थी -देख सुधा की माँ -कभी भी रात के खाने के लिए मना मत करना -चाहे एक रोटी ही खाना |
माँ ने बडी मासूमियत से पूछा ?
क्यो?
मौसी ने इधर उधर देख और बडे रहस्यमय अंदाज में कहा -अगर तू एक दिन खाने का मना करेगी तो दोबारा कभी भी तेरी बहू रात को तुझे खाने को नही पूछेगी |
तो क्या सुधा की बहू भी इसी दिशा मे जा रही थी ????????/
क्या अगला सवाल यही होगा ?
मम्मीजी आज आप खाना खायेगी या नही ?
और अगर सुधा ने आज न कहा तो??????////
दोपहर को ही उसके घर जा पहुंची थी उसकी बहू ने अच्छे से मेरा स्वागत किया बढिया चाय नाश्ता कराया |
हम दोनों बहनों को बाते करते करते बहुत देर हो गई|
मै आने के लिए उठी ही थी की उसकी बहू रीना आई फ़िर पूछा ?
मम्मीजी रात को कितनी भूख है /वैसे बता दीजिये उतना ही खाना बनाऊ ?
मै हैरत में थी रात को खाना है अभी से कैसे बता सकते है ?
सुधा मेरी ओर दयनीय नजरो से देखने लगी |
मै भी उनके घर की व्यवस्था के बारे में अपने विचार रखकर बात बढाना नही चाहती थी |
मै ये अनोखा प्रश्न लेकर सोच में पड़ गई |सुधा ने पहले भी कहा था रीना रोज रोज घर के सारे सदस्यों से पूछकर ही खाना बनाती |
तभी मुझे याद आया माँ की एक सहेली गीता मौसी हमेशा घर आती थी एक दिन मै भी बैठी थी तभी मैंने सुना ।
मौसी माँ से कह रही थी -देख सुधा की माँ -कभी भी रात के खाने के लिए मना मत करना -चाहे एक रोटी ही खाना |
माँ ने बडी मासूमियत से पूछा ?
क्यो?
मौसी ने इधर उधर देख और बडे रहस्यमय अंदाज में कहा -अगर तू एक दिन खाने का मना करेगी तो दोबारा कभी भी तेरी बहू रात को तुझे खाने को नही पूछेगी |
तो क्या सुधा की बहू भी इसी दिशा मे जा रही थी ????????/
क्या अगला सवाल यही होगा ?
मम्मीजी आज आप खाना खायेगी या नही ?
और अगर सुधा ने आज न कहा तो??????////
Thursday, September 10, 2009
खिलते हुए कमल
नानी ने कहा था -मेरी माँ को -बेटी !चूल्हे में दो लकडिया और छोटे छोटे लकडी के टुकड़े साथ जलाओ तब चूल्हा अच्छे से जलता है |और उस जलती हुई लकडियो से जो कोयले निकलते है उसे मिटटी की अँगीठी में डाल दो तो उस पर सब्जी पक जायगी और लकडी भी व्यर्थ ही नही जलेगी |
मेरी माँ ने मुझसे कहा -बेटी! लोहे की अँगीठी में बहुत सारे कोयले एक साथ नही जलाना , खाना बनाते बनाते सारी तैयारी पहले करके एक -एक कोयला जलती हुई अंगीठी में डालती रहना |व्यर्थ ही कोयले राख नही करना |
मैंने अपनी बेटी से कहा - बेटी ! गैस केचूल्हे को जलाते समय पहले चूल्हे पर पतीली रखना फ़िर गैस जलाना जिससे व्यर्थ ही गैस नही जलेगी |
मेरी बेटी ने अपनी बेटी को कहा -बेटी! कभी कभी तुम भी रसोई में देख लिया करो खाना कैसे ?बनता है |
Saturday, September 05, 2009
छाया

जो दूसरी दुनिया
में चले जाते है
उनका जीवन
पूजनीय और अनुकरणीय
हो जाता है
जो इस दुनिया में
रह जाते है
वो असहनीय
हो जाते है |
बहुत साल पहले एक कविता लिखी थी आज पितृ पक्ष के अवसर पर पोस्ट कर रही हूँ |
पितृ पक्ष में पुरखो को श्रधा सहित [सन १९८८ में जनधर्म में प्रकाशित ]
उन्होंने तो हमे दी थी
घने दरख्तों की छाया ,
जिसमे हम
भरपूर फले भी ,फूले भी
और जिन्होंने सदैव की हमारे
सुख की कामना
और हम है
अभी से आतंकित
अपने भविष्य के प्रति
आशंकित
हमेशा अपनों से शंकित
क्योकि हमने ही
तो दी है इन्हे,
बोगनबेलिया
और मनी प्लांट
की छाया|
Monday, August 24, 2009
गणपति बप्पा मोरया
स्कूल के दिनों में हिन्दी विषय के अंतर्गत बाबा भारती का घोड़ा की कहानी पढाई जाती थी कहानी का शीर्षक था हार जीत
के लेखक थे सुदर्शन |बाद में टिप्पणी लिखो :में पूछा जाता था इस कहानी से क्या शिक्षा मिली?क्या संदेस देती है ये कहानी ?तब तो रट रट कर बहुत कुछ लिख देते थे और नंबर भी पा लेते थे |कितु न तो कभी बाबा भारती ही बन पाए और न ही कभी ह्रदय परिवर्तन होने वाले डाकू खड्गसिँह को अपने जीवन में उतार पाए |
आज बाबा भारती(नकली ) बहुत है , सुलतान को बेचने वाले ,आलिशान कुटियों में रहने वाले और डाकुओ के साथ रहकर व्यापार करने वाले |
पिछले दिनों से लगातार समाचार आ रहे है नकली खून के बाजार के |
स्तब्ध हूँ, क्षुब्ध हूँ किंतु अब लगता है की सचमुच भारत भगवान के भरोसे ही चल रहा है |
ईमान तो
कब का बेच दिया !
थाली की
दाल रोटी भी चुराकर
बेच दी !
त्यौहार अभी आए नही ?
पकवानों की मिठास ही
बेच दी !
नकली घीं
नकली दूध
नकली मसाले
और अब
नकली खून ?
कौनसी ?
ख्वाहिश मे
तुमने पेट की आग
खरीद ली
तुम भूल रहे हो
आग हमेशा ही जलाती है
तुमने
दाल, चीनी गेहू और
खून
नही जमा किया है ?
तुमने जमा की है
अपने गोदाम मे
इनके बदले
ईमानदार की आहे
मेहनतकश की
बद्ददुआए
प्रक्रति की
समान वितरण प्रणाली को
असमानता मे तब्दील कर
तुमने अपनी भूख
बढ़ा ली है
व्यापार के सिद्धांतो
को तोड़कर
प्रक्रति से
दुश्मनी मोल ले ली है
बेवक्त की भूख
कभी शांत नही होती
के लेखक थे सुदर्शन |बाद में टिप्पणी लिखो :में पूछा जाता था इस कहानी से क्या शिक्षा मिली?क्या संदेस देती है ये कहानी ?तब तो रट रट कर बहुत कुछ लिख देते थे और नंबर भी पा लेते थे |कितु न तो कभी बाबा भारती ही बन पाए और न ही कभी ह्रदय परिवर्तन होने वाले डाकू खड्गसिँह को अपने जीवन में उतार पाए |
आज बाबा भारती(नकली ) बहुत है , सुलतान को बेचने वाले ,आलिशान कुटियों में रहने वाले और डाकुओ के साथ रहकर व्यापार करने वाले |
पिछले दिनों से लगातार समाचार आ रहे है नकली खून के बाजार के |
स्तब्ध हूँ, क्षुब्ध हूँ किंतु अब लगता है की सचमुच भारत भगवान के भरोसे ही चल रहा है |
ईमान तो
कब का बेच दिया !
थाली की
दाल रोटी भी चुराकर
बेच दी !
त्यौहार अभी आए नही ?
पकवानों की मिठास ही
बेच दी !
नकली घीं
नकली दूध
नकली मसाले
और अब
नकली खून ?
कौनसी ?
ख्वाहिश मे
तुमने पेट की आग
खरीद ली
तुम भूल रहे हो
आग हमेशा ही जलाती है
तुमने
दाल, चीनी गेहू और
खून
नही जमा किया है ?
तुमने जमा की है
अपने गोदाम मे
इनके बदले
ईमानदार की आहे
मेहनतकश की
बद्ददुआए
प्रक्रति की
समान वितरण प्रणाली को
असमानता मे तब्दील कर
तुमने अपनी भूख
बढ़ा ली है
व्यापार के सिद्धांतो
को तोड़कर
प्रक्रति से
दुश्मनी मोल ले ली है
बेवक्त की भूख
कभी शांत नही होती
Wednesday, August 19, 2009
वट वृक्ष की शोक सभा
नीम ने बुलाई एक आम सभावटवृक्ष को श्रधान्जली देने
देश विदेश के पेडो को
संदेश भेजा!
पवन के द्वारा
कुछ पेडो ने आने में
असमर्थता जताई
पवन के ही
द्वारा
कुछ इस अवसर का
इंतजार ही कर रहे थे
बबूल ,आम, इमली ,नारियल आदि -आदि
कई ख्याति प्राप्त पेड़ आये
अपने अपने भाषण
साथ में लेकर
कुछ छोटे छोटे पौधे
भी अपनी उपस्थिति
दर्ज करने आ पहुंचे
सबने वटवृक्ष कि मौत पर
सवेदना प्रकट की
नीम ने कहा -
बरसो मेरा साथ रहा
आज मै अकेला
महसूस कर रहा हूँ ....
पीपल ने कहा -
हम तीनो
ब्रह्मा विष्णु महेश थे
आज सिर्फ ब्रह्मा विष्णु रह गये
और सबने अपनी अपनी
अश्रुपूरित श्रधांजलि
अर्पित की
बूढे बरगद को
शोक सभा संपन्न हुई
बरगद कि जटा के
अंतिम छोरतक
पहुँचते ही सबके
धैर्य का
बांध टूट गया
नीम ने कहा -सदियों तक
इसकी तानाशाही सही
अब मै राजा हूँ !
सारी बीमारिया
दूर करता हूँ मै
और वाहवाही बटोरे ये ?
छोटे पौधे
बोल उठे -
आखिर कब तक?
इसके साये में पलते रहे ?
इसने कभी न
पनपने दिया हमे
चलो !
सदियों का शोषण
ख़त्म हुआ
अपनी जटाओं से सारी
जमीन पर आधिपत्य जमा
रखा था
कुढ़ते कुढ़ते पीपल ने ,
अपनी व्यथा कह डाली
बरगद के पेड़ की
कुछ
कोंपलें फूट रही थी |
और बरगद उन कोपलों
के माध्यम से
अपनी शोक सभा में
दूर -दूर से आये
पेडो को देखकर
हर्षित हो रहा था
उसने अपना जीवन धन्य माना
अपनी कोंपलों को देखकर
फिर से वो लोगो के
दुःख समेटना चाहता था
सबको छांव देना चाहता था
हर राहगीर को
एक ठांव देना चाहता था
जंगल से निकलकर
गाँव में बसा था वो,
कितने ही?
बसंत देखे
उसने अपने चबूतरे के साथ,
कितने ही सच झूठो का
साक्षी बना
फिर न जाने इस गाँव को
क्या हुआ ?
चबूतरा तक उखड गया
और बरगद सूखता गया
कितु जाते हुए पेडो का
वार्तालाप सुनकर
उसका सदियों पुराना
भ्रम टूट गया
उसने अपनी यौगिक क्रिया से
अपने को साध लिया
धरती का पानी लेना बंद
कर दिया
पवन से माफ़ी मांग ली
सूरज कि रौशनी से
अपनी दिशा बदल ली
और अपने साथियों
के फलने फूलने के लिए
अपनी जटाओं
को समेट लिया
और
इस तरह
एक वटवृक्ष
की जिन्दगी
मौन हो गई
सदा के लिए .................
Saturday, August 15, 2009
स्वतन्त्रता दिवस पर विनती
पूरे बाजार में तिरंगे हर रूप में कपडे में, प्लास्टिक में उपलब्ध है |
बस नही है तो सिर्फ़ दिलो में |
बहुत कुछ लिखा जा चुका है १५ अगस्त पर |बहुत कुछ भाषणों में कहा जायगा एक रस्म की तरह |
बस एक अभियान हो ,१६ अगस्त को यहाँ वहा बिखरे प्लास्टिक के झंडो को समेट कर हम उन्हें पैरो में आने से बचा सके |
स्वतन्त्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाये |

क्या?
वेसा रोमांच
,वेसी सिहरन दे पायेगे कभी?
बस नही है तो सिर्फ़ दिलो में |
बहुत कुछ लिखा जा चुका है १५ अगस्त पर |बहुत कुछ भाषणों में कहा जायगा एक रस्म की तरह |
बस एक अभियान हो ,१६ अगस्त को यहाँ वहा बिखरे प्लास्टिक के झंडो को समेट कर हम उन्हें पैरो में आने से बचा सके |
स्वतन्त्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाये |
झंडे की खुशबु

बचपन में जब
केले का आधा टुकडा मिलता ,
सेब की एक फांक मिलती
तो उसका स्वाद अमृत था
आज के दर्जनों केलो में ,
किलो से स्टीकर लगे सेबों में,
वो मिठास नही
एक फहराते हुऐ झंडे को निहारने में
जो धड़कन थी ,
जो रोम रोम की सिहरन थी
वो गली में बिकते हुऐ
तीन रंग की
प्लास्टिक की पन्नी
चोकोर आकार लेते हुऐ
जो कभी कार में सजते है
जो कभी गमले में खोंस दिए जाते है
जो कभी एक सालके बच्चे के हाथ में
दे दिया जाता है
उसका मन बहलाने के लिए ,
वो तीन रंग
केले का आधा टुकडा मिलता ,
सेब की एक फांक मिलती
तो उसका स्वाद अमृत था
आज के दर्जनों केलो में ,
किलो से स्टीकर लगे सेबों में,
वो मिठास नही
एक फहराते हुऐ झंडे को निहारने में
जो धड़कन थी ,
जो रोम रोम की सिहरन थी
वो गली में बिकते हुऐ
तीन रंग की
प्लास्टिक की पन्नी
चोकोर आकार लेते हुऐ
जो कभी कार में सजते है
जो कभी गमले में खोंस दिए जाते है
जो कभी एक सालके बच्चे के हाथ में
दे दिया जाता है
उसका मन बहलाने के लिए ,
वो तीन रंग
क्या?
वेसा रोमांच
,वेसी सिहरन दे पायेगे कभी?
Thursday, August 13, 2009
विनती
श्री कृष्ण शरणम् ममः "जन्माष्टमी की शुभकामनाये "
आज एक पुरानी पोस्ट फ़िर से दे रही हूँ |
लताओं में ,कुंजो में .गलियों में ,
,.यमुना की लहरों में
मुरली की मोहक तान छोड़ गये तुम
राधा को गोपियों को ,ग्वालो को
नन्द बाबा ,माता यशोदा को
कैसी टीस दे गये तुम
संहारक .रक्षक राजा ओर गीता के उपदेशक बनकर
संसार में महान बन गये तुम
माखन की स्निग्धता ,कोमलता तुम बिन नही
मिश्री की मिठास तुम बिन नही
आओ कृष्ण एक बार फ़िर आओ
पुनः स्रष्टि को जीवंत बना जाओ
प्रीत की पुकार सुन लो ,
कठोर न बनो श्याम ,ये तुम्हारा स्वभाव नही ,
तुम पर कोई आक्षेप करे
ये मुझे मंजूर नही
आओ कान्हा पुनः
इस जग को सुंदर बना जाओ
,.यमुना की लहरों में
मुरली की मोहक तान छोड़ गये तुम
राधा को गोपियों को ,ग्वालो को
नन्द बाबा ,माता यशोदा को
कैसी टीस दे गये तुम
संहारक .रक्षक राजा ओर गीता के उपदेशक बनकर
संसार में महान बन गये तुम
माखन की स्निग्धता ,कोमलता तुम बिन नही
मिश्री की मिठास तुम बिन नही
आओ कृष्ण एक बार फ़िर आओ
पुनः स्रष्टि को जीवंत बना जाओ
प्रीत की पुकार सुन लो ,
कठोर न बनो श्याम ,ये तुम्हारा स्वभाव नही ,
तुम पर कोई आक्षेप करे
ये मुझे मंजूर नही
आओ कान्हा पुनः
इस जग को सुंदर बना जाओ
(-इमेज सोर्स -कृष्ण . कॉम )
यमुना जी
Wednesday, August 12, 2009
मेरा सच
मेरा सच !
तुम्हारे तोहफों से मुझे
बहला न सका ?
मेरा सच!
तुम्हारे त्यागो से
तप न सका ?
मेरा सच !
तुम्हारी ममताओ को
समझ न सका ?
मेरा सच!
तुम्हारे विश्वासों को
अखंड रख न सका ?
मेरा सच !
मेरे ही झूठे वादों से
तुम्हे लुभा न सका ?
मेरा सच !
अद्वैत के आवरण से भी मुझे
ढँक न सका ?
मेरा सच!
मेरे ही मित भाषणों से
मिट न सका ?
मेरा सच !
मेरे लौकिक कि खातिर
तुम्हारी अलौकिक को परख न सका?
मेरा सच!
बीज डालने कि प्रक्रिया में
तुम्हारी उर्वरा शक्ति को पहचान न सका?
मेरा बौना सच!
लील गया
वटवृक्ष कि जटाओं को
झुक न सका ?
और
ढूंढ़ता रहा
कन्दराओ में
गुफाओ में
मेरे सच को!
किन्तु मै वन्य जीवन का
आदी
वन्य जगत का
प्राणी ही रहा
छुपा न पाया
मनुष्य जीवन के
आवरण में
अपने भीतर के सच को .................
तुम्हारे तोहफों से मुझे
बहला न सका ?
मेरा सच!
तुम्हारे त्यागो से
तप न सका ?
मेरा सच !
तुम्हारी ममताओ को
समझ न सका ?
मेरा सच!
तुम्हारे विश्वासों को
अखंड रख न सका ?
मेरा सच !
मेरे ही झूठे वादों से
तुम्हे लुभा न सका ?
मेरा सच !
अद्वैत के आवरण से भी मुझे
ढँक न सका ?
मेरा सच!
मेरे ही मित भाषणों से
मिट न सका ?
मेरा सच !
मेरे लौकिक कि खातिर
तुम्हारी अलौकिक को परख न सका?
मेरा सच!
बीज डालने कि प्रक्रिया में
तुम्हारी उर्वरा शक्ति को पहचान न सका?
मेरा बौना सच!
लील गया
वटवृक्ष कि जटाओं को
झुक न सका ?
और
ढूंढ़ता रहा
कन्दराओ में
गुफाओ में
मेरे सच को!
किन्तु मै वन्य जीवन का
आदी
वन्य जगत का
प्राणी ही रहा
छुपा न पाया
मनुष्य जीवन के
आवरण में
अपने भीतर के सच को .................
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